बजट सत्र 2026 के पहले चरण में राहुल गांधी विपक्ष के सबसे बड़े चेहरे के रूप में उभरे. उन्होंने सदन में करीब 50 मिनट तक प्रधानमंत्री मोदी और सरकार की नीतियों पर बिना रुके हमला बोला. राहुल की इस नई और आक्रामक शैली ने न केवल कांग्रेस सांसदों में जोश भर दिया है, बल्कि विपक्षी खेमे (I.N.D.I.A. ब्लॉक) को भी एकजुट करने का काम किया.
उनके आक्रामक रुख और सरकार को असहज करने की क्षमता से कांग्रेस सांसद उत्साहित नजर आए. वे अपने नेता के पीछे एकजुट दिखे, निलंबन झेला, धरने दिए, नारे लगाए और विपक्षी दलों से तालमेल बढ़ाया- ताकि पार्टी नेतृत्व के लिए ‘फोर्स मल्टीप्लायर’ की भूमिका निभा सकें.
एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता के शब्दों में, “अगर राहुल गांधी संसद के बाहर भी इसी फॉर्म में रहे तो कांग्रेस पार्टी की स्थिति संभल सकती है, लेकिन दुर्भाग्य से अतीत में ऐसा नहीं हुआ. देखते हैं इस बार क्या होता है.”
'अन्नदाता', इंडो-यूएस डील और 'ट्रंप कार्ड'
राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप लगाया कि उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दबाव में आकर इंडो-यूएस समझौते पर घुटने टेक दिए हैं. उन्होंने इसे "देश के हितों का सौदा" करार दिया. राहुल ने विरोध स्वरूप सांसदों को सुझाव दिया कि प्रदर्शन के दौरान गौतम अडानी, डोनाल्ड ट्रंप और नरेंद्र मोदी की तस्वीरों वाले पोस्टर लगाए जाएं, ताकि यह स्थापित किया जा सके कि सरकार की कॉर्पोरेट के साथ सांठगांठ है.
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शुक्रवार को राहुल गांधी ने किसान नेताओं के साथ एक अहम बैठक की. हालांकि इनमें से कई कांग्रेस के किसान विंग से जुड़े थे, लेकिन इसका संदेश साफ था-राहुल खुद को 'किसान समर्थक' और सरकार को 'किसान विरोधी' के रूप में मजबूती से स्थापित करना चाहते हैं. उनका लक्ष्य कृषि संकट को एक बड़े चुनावी मुद्दे में तब्दील करना है.
'एप्स्टीन फाइल्स' और राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा
कांग्रेस ने एप्स्टीन फाइल्स विवाद को भी एक राजनीतिक हथियार बनाने की तैयारी कर ली है. भले ही यह आम जनता के लिए जटिल मुद्दा हो, लेकिन कांग्रेस का मानना है कि इससे सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया जा सकता है.
इसके अलावा, पूर्व सेना प्रमुख जनरल नरवणे की किताब के संदर्भों को उठाकर राहुल गांधी राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर पीएम की "56 इंच की छाती" वाली छवि को चुनौती दे रहे हैं और उन्हें एक अहम मौके पर फैसला न कर पाने वाला दिखाना चाहते हैं.
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राहुल गांधी की असली परीक्षा संसद के भाषणों में नहीं, बल्कि जमीन पर है. कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी बाधा उनके संगठनात्मक ढांचे की कमजोरी है. वोटर अधिकार यात्रा और MGNREGA के विरोध में किए गए प्रदर्शन अब तक व्यापक जन-आंदोलन का रूप नहीं ले पाए हैं.
असल चुनौती
पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु और केरल में होने वाले चुनावों को देखते हुए राहुल गांधी अपने तीखे तेवर ढीले करने के मूड में नहीं हैं. उनका स्लोगन "जो उचित समझो वही करो" सीधे तौर पर सरकार की निर्णय लेने की क्षमता पर कटाक्ष है, जिसे वे चुनावी रैलियों में प्रमुखता से इस्तेमाल करेंगे.
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बजट सत्र के पहले चरण में राहुल गांधी की बॉडी लैंग्वेज और आक्रामक शैली से संकेत मिलता है कि वे राजनीतिक रूप से उत्साहित हैं और मोदी सरकार पर दबाव बनाए रखने के इरादे में हैं. आने वाले हफ्ते तय करेंगे कि यह संसदीय प्रदर्शन व्यापक राजनीतिक आंदोलन का रूप लेता है या फिर सदन की बहसों तक ही सीमित रह जाता है.अब असली परीक्षा संसद नहीं, सड़क है.