देश में राजनीतिक पार्टी बनाना और उसे चुनाव आयोग में रजिस्टर कराना एक संवैधानिक प्रक्रिया है. लेकिन क्या कुछ राजनीतिक दलों का इस्तेमाल सिर्फ चंदा जुटाने और टैक्स में छूट का फायदा लेने के लिए तो नहीं हो रहा? आजतक की विशेष पड़ताल में बेहद चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं. गुजरात से लेकर दिल्ली, हरियाणा, बिहार और मध्य प्रदेश तक ऐसी कई रजिस्टर्ड गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टियों (RUPP) के दफ्तरों का ग्राउंड रियलिटी चेक किया गया.
इस दौरान यह बात सामने आई कि कागजों पर बनी कई ऐसी पार्टियां हैं, जिनका न तो कोई सांसद है और न ही कोई विधायक, लेकिन 2019 से 2024 के बीच इन्हें सैकड़ों करोड़ रुपये का भारी-भरकम चंदा मिला है. ताज्जुब की बात यह है कि जब आजतक की टीम ने इन राजनीतिक दलों के आधिकारिक पतों पर जाकर रियलिटी चेक किया, तो कहीं ताले लटके मिले तो कहीं डांस क्लास और मकान मालिक चलते पाए गए.
620 करोड़ का चंदा पाने वाली पार्टी का ऑफिस बंद
अहमदाबाद के नवा नरोड़ा स्थित रघुवीर अपार्टमेंट में एक ऐसा ही पता मिला, जो आम जनमत पार्टी के कार्यालय के तौर पर दर्ज है. पहली नजर में यह किसी आम राजनीतिक पार्टी के दफ्तर जैसा बिल्कुल नहीं दिखता. आजतक की टीम जब बताए गए पते पर पहुंची तो वहां शटर बंद मिला.
आसपास के लोगों से बातचीत में पता चला कि यह ऑफिस करीब एक साल से बंद है. स्थानीय दुकानदार हितेश गोस्वामी ने बताया कि यहां पहले पार्टी से जुड़े लोग आते-जाते थे, लेकिन करीब एक साल पहले दुकान बंद करके चले गए. उनके मुताबिक, इस जगह पर पुलिस की रेड भी हुई थी.
हितेश ने बताया कि पहले यहां गौरव मिश्रा और धर्मेंद्र नाम के लोग समेत तीन-चार लोग आते थे और पार्टी का बोर्ड भी लगा था. यानी जिस पार्टी का दफ्तर आज बंद पड़ा है, उसके नाम पर करोड़ों रुपये के चंदे का रिकॉर्ड मौजूद है.
वेबसाइट चल रही, अध्यक्ष का नाम भी मौजूद
ऑफिस भले ही बंद मिला, लेकिन आम जनमत पार्टी की वेबसाइट अब भी चल रही है. वेबसाइट पर गौरव मिश्रा को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष और धर्मेंद्र वैष्णव को नेशनल ट्रेजरर बताया गया है. वेबसाइट पर गौरव मिश्रा के बारे में लिखा गया है कि करीब 10 साल सामाजिक कार्यों में लगाने के बाद उन्होंने आम जनमत पार्टी बनाई.
पार्टी की वेबसाइट पर डोनेशन के लिए बैंक खातों की जानकारी भी दी गई है. यानी जमीन पर ऑफिस बंद है, नेताओं से संपर्क नहीं हो पा रहा, लेकिन वेबसाइट के जरिए पार्टी अब भी मौजूदगी दर्ज करा रही है और चंदे के लिए बैंक खातों की जानकारी उपलब्ध है.
पार्टी के आंकड़ों के मुताबिक 2019 से 2024 के बीच आम जनमत पार्टी को करीब 220 करोड़ रुपये का चंदा मिला. वहीं उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक 2022-23 में पार्टी को मिलने वाला चंदा अचानक बढ़कर करीब 216 करोड़ रुपये हो गया. सवाल यही है कि इतनी बड़ी रकम देने वाले लोग कौन हैं और पार्टी ने इस रकम का इस्तेमाल किस तरह किया?
न्यू इंडिया यूनाइटेड पार्टी: 608 करोड़ की आय, ऑफिस पर ताला
अहमदाबाद में ही आजतक की पड़ताल एक और राजनीतिक पार्टी तक पहुंची. न्यू इंडिया यूनाइटेड पार्टी का आधिकारिक पता नरोड़ा के उर्वी कॉम्प्लेक्स का दिया गया है. पार्टी को 2023-24 में करीब 200 करोड़ रुपये का चंदा मिलने की बात सामने आई है. वहीं 2019 से 2024 के बीच पार्टी की कुल आय करीब 608 करोड़ रुपये बताई गई है.
आजतक की टीम जब उर्वी कॉम्प्लेक्स पहुंची तो बताए गए पते पर ताला लगा मिला. कॉम्प्लेक्स की तीसरी मंजिल पर पार्टी से जुड़ा स्थान बताया गया, लेकिन पूरे कॉम्प्लेक्स में पार्टी का कोई बोर्ड नजर नहीं आया.
आसपास के दुकानदारों के मुताबिक पार्टी के अध्यक्ष अमित चतुर्वेदी की आवाजाही कभी-कभार होती है, लेकिन वह नियमित तौर पर वहां नजर नहीं आते. एक तरफ रिकॉर्ड में सैकड़ों करोड़ रुपये की आय और दूसरी तरफ पार्टी के कार्यालय की यह स्थिति कई सवाल खड़े करती है.
957 करोड़ का चंदा और फिर भी सिर्फ दो कर्मचारी
गांधीनगर में आजतक की टीम को एक ऐसा मामला मिला, जहां तस्वीर थोड़ी अलग थी. भारतीय नेशनल जनता दल का रजिस्टर्ड ऑफिस मेघमलहार कॉम्प्लेक्स की सातवीं मंजिल पर मिला. यहां पार्टी का बोर्ड लगा था और दो कर्मचारी भी मौजूद थे.
पार्टी साल 2009 में रजिस्टर्ड हुई थी. इसके पास न कोई विधायक है और न कोई सांसद. इसके बावजूद 2019 से 2024 के बीच पार्टी को करीब 957.44 करोड़ रुपये का चंदा मिलने का रिकॉर्ड है.
ऑफिस में मौजूद कर्मचारियों ने बताया कि पार्टी का काम एसवी गजेरा देखते हैं. आजतक ने जब उनसे संपर्क कर 957 करोड़ रुपये से ज्यादा के चंदे के बारे में सवाल किया तो उन्होंने इस पर स्पष्ट जवाब देने से इनकार कर दिया. यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि इतनी बड़ी रकम का चंदा पाने वाली पार्टी का राजनीतिक प्रभाव जमीन पर नजर नहीं आता.
330 करोड़ का चंदा, ऑफिस पर ताला और...
गुजरात के आणंद में सत्यवादी रक्षक पार्टी का मामला और भी ज्यादा चौंकाने वाला है. चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक पार्टी को 2023-24 में करीब 330 करोड़ रुपये का चंदा मिला. 2019 से 2024 के बीच पार्टी की कुल चंदे की रकम करीब 426 करोड़ रुपये बताई गई है.
आजतक की टीम जब पार्टी के रजिस्टर्ड पते पर पहुंची तो वहां एक फ्लैट मिला, लेकिन उस पर ताला लगा था. इसके बाद टीम पार्टी की अध्यक्ष स्वातीबेन तक पहुंची. कैमरे पर उन्होंने दावा किया कि पार्टी बंद हो चुकी है और वह सिर्फ नाम की अध्यक्ष थीं.
उन्होंने कहा कि पार्टी से कई लोग जुड़े हुए थे और चंदे के तौर पर आया पैसा आगे दान के रूप में दिया गया होगा. उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी अब बंद है और उन्हें आगे की गतिविधियों की जानकारी नहीं है.
लेकिन सवाल फिर वही है अगर पार्टी बंद हो चुकी थी या निष्क्रिय थी, तो इतने बड़े पैमाने पर चंदा कैसे आया और उसका इस्तेमाल कहां हुआ? सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में इस पार्टी ने पूरे देश में सिर्फ एक उम्मीदवार उतारा था.
200 करोड़ की आय वाली सौराष्ट्र जनता पार्टी भी नहीं मिली
अहमदाबाद से करीब 145 किलोमीटर दूर सुरेंद्रनगर में आजतक की टीम सौराष्ट्र जनता पार्टी के रजिस्टर्ड पते पर पहुंची. यहां भी पार्टी का कोई सक्रिय कार्यालय नहीं मिला और ताला लटका हुआ था. पार्टी की ओर से जारी आय के आंकड़ों के मुताबिक 2019-20 से 2023-24 के बीच उसे करीब 200 करोड़ रुपये की आय हुई. लेकिन जमीन पर पार्टी का कोई जिम्मेदार व्यक्ति यह बताने के लिए मौजूद नहीं था कि इतना पैसा किसने दिया और इसका इस्तेमाल कहां किया गया.
दिल्ली में 207 करोड़ वाली पार्टी के पते पर डांस क्लास
यह कहानी सिर्फ गुजरात तक सीमित नहीं है. दिल्ली की राष्ट्रीय विकास पार्टी के मामले में आजतक की टीम साउथ दिल्ली की विश्वकर्मा कॉलोनी पहुंची. ADR की रिपोर्ट में E-86/A को पार्टी का रजिस्टर्ड पता बताया गया है. लेकिन मौके पर राजनीतिक पार्टी का कोई कार्यालय नहीं मिला. यहां एक डांस क्लास चलती मिली, जबकि इमारत के बाकी हिस्सों में लोग रहते हैं.
मकान मालिक शैलव अग्रवाल ने बताया कि वह करीब 15 साल से इस मकान में रह रहे हैं. उनके मुताबिक इस दौरान कई किरायेदार आए और गए, लेकिन उनकी जानकारी में यहां कभी राष्ट्रीय विकास पार्टी का कार्यालय नहीं था.
स्थानीय लोगों ने भी पार्टी का कार्यालय होने से इनकार किया. इस पार्टी को 2019 से 2024 के बीच करीब 207.63 करोड़ रुपये का चंदा मिलने की बात सामने आई है. सवाल है कि जिस पते पर पार्टी का कार्यालय होना चाहिए, वहां राजनीतिक पार्टी का कोई नामोनिशान क्यों नहीं है?
फरीदाबाद में भी नहीं मिला पार्टी का कार्यालय
राष्ट्रीय विकास पार्टी का एक और पता फरीदाबाद का दिया गया था. आजतक की टीम जब वहां पहुंची तो मकान मालिक ने किसी राजनीतिक दल के कार्यालय से इनकार किया.मकान मालिक के मुताबिक वह करीब 15 साल से वहां रह रहे हैं और इस दौरान उनकी जानकारी में इस जगह पर राष्ट्रीय विकास पार्टी का कार्यालय नहीं चला. पार्टी के अध्यक्ष महेश प्रताप शर्मा बताए जाते हैं. उनसे संपर्क करने पर उन्होंने मामले को अदालत में विचाराधीन बताया.
सीतामढ़ी में 103 करोड़ की आय, गांव में पार्टी का पता नहीं
बिहार के सीतामढ़ी में भी इसी तरह का मामला सामने आया. प्रबल भारत पार्टी का रजिस्टर्ड कार्यालय परसौनी प्रखंड के इजहार गांव में बताया गया है. पार्टी ने 2019 से 2024 के बीच करीब 103.84 करोड़ रुपये की आय दर्ज की. आजतक की टीम जब गांव में इस पते की पड़ताल करने पहुंची तो पार्टी का कोई कार्यालय नहीं मिला. आसपास के लोगों से पार्टी के बारे में पूछा गया, लेकिन किसी को भी इसके बारे में जानकारी नहीं थी और लोग कैमरे पर बोलने से भी बचते नजर आए.
जबलपुर में दस्तावेजों में ऑफिस, जमीन पर कुछ नहीं
मध्य प्रदेश के जबलपुर में भारतीय जन क्रांति दल (डेमोक्रेटिक) का पता शक्ति नगर सैनिक सोसायटी का दिया गया है. आजतक की टीम जब इस इलाके में पहुंची तो वहां पार्टी का कोई कार्यालय नहीं मिला. स्थानीय लोगों से बातचीत में भी पार्टी की कोई सक्रियता सामने नहीं आई. दस्तावेजों में कार्यालय का पता मौजूद है, लेकिन जमीन पर पार्टी का कोई अस्तित्व नजर नहीं आया.
दिल्ली में इसी पार्टी के एक अन्य पते का भी आजतक ने रियलिटी चेक किया. वहां भी पार्टी का कार्यालय नहीं मिला. यह इलाका पूरी तरह रिहायशी है और स्थानीय लोगों के मुताबिक कुछ महीने पहले पुलिस की टीम भी यहां पहुंची थी और नोटिस लगाया था.
सिर्फ कागजों पर चल रही हैं पार्टियां?
आजतक की पड़ताल में सामने आए इन मामलों में एक पैटर्न नजर आता है. कई पार्टियों के पास चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में पता है, वेबसाइट है, पदाधिकारियों के नाम हैं और बैंक खातों के जरिए चंदा लेने की व्यवस्था भी है. लेकिन जब इनका ग्राउंड रियलिटी चेक किया गया तो कई जगह कार्यालय बंद मिले. कुछ जगह पार्टी का बोर्ड तक नहीं मिला और कुछ पते पर दूसरी गतिविधियां चलती मिलीं. इनमें से कई पार्टियों ने पांच साल में सैकड़ों करोड़ रुपये की आय या चंदे का रिकॉर्ड दर्ज कराया है, लेकिन उनकी जमीनी राजनीतिक सक्रियता बेहद सीमित नजर आई.
10 हजार करोड़ से ज्यादा के चंदे का सवाल
राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे के आंकड़े भी इस पूरे मामले को गंभीर बनाते हैं. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 2015-16 में जहां ऐसी पार्टियों को करीब 4.37 करोड़ रुपये का चंदा मिला था, वहीं 2022 से 2024 के बीच यह रकम बढ़कर 10 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा हो गई. सवाल यह है कि इतनी बड़ी रकम इन पार्टियों तक पहुंच क्यों रही है? क्या ये वास्तव में राजनीतिक गतिविधियों के लिए मिलने वाला चंदा है या फिर राजनीतिक दल का दर्जा हासिल करने का इस्तेमाल किसी दूसरे वित्तीय फायदे के लिए किया जा रहा है?
टैक्स में छूट का भी सवाल
जानकारों के मुताबिक राजनीतिक दल के तौर पर रजिस्ट्रेशन के साथ कुछ टैक्स संबंधी फायदे भी जुड़े होते हैं. यही वजह है कि निष्क्रिय या बेहद कम राजनीतिक गतिविधि वाली पार्टियों को मिलने वाली बड़ी रकम पर सवाल उठते रहे हैं. ADR की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया था कि 2019-20 में 219 RUPP ने करीब 608 करोड़ रुपये की टैक्स छूट का दावा किया था. इनमें से 66 पार्टियों ने जरूरी रिपोर्ट जमा नहीं की थी.
रिपोर्ट में चुनाव आयोग के आंकड़ों के हवाले से यह भी कहा गया था कि 2013 से 2016 के बीच केवल करीब 5 फीसदी RUPP ने ही दान की रिपोर्ट जमा की थी.
क्या हो सकता है मनी लॉन्ड्रिंग का खेल?
चार्टर्ड अकाउंटेंट और विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी पार्टियों के जरिए वित्तीय गड़बड़ी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष वेद जैन के मुताबिक, कई अनजान राजनीतिक पार्टियां समय पर रिटर्न और जरूरी रिपोर्ट दाखिल नहीं करतीं. उनका कहना है कि राजनीतिक पार्टियों के रजिस्ट्रेशन का गलत इस्तेमाल रोकना जरूरी है.
उनके मुताबिक यह मामला मनी लॉन्ड्रिंग तक पहुंच सकता है और इसमें शेल कंपनियों के इस्तेमाल की संभावना की भी जांच होनी चाहिए. हालांकि, किसी पार्टी को सिर्फ इसलिए अवैध या फर्जी नहीं कहा जा सकता क्योंकि उसका कार्यालय बंद मिला या वह चुनाव में सक्रिय नहीं दिखी. चंदे के स्रोत और उसके इस्तेमाल को लेकर अंतिम निष्कर्ष संबंधित दस्तावेजों और जांच के आधार पर ही निकाला जा सकता है.
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी के मुताबिक RUPP का कॉन्सेप्ट कई सालों से मौजूद है. उनका कहना है कि इन पार्टियों को अपने रिटर्न जमा करने होते हैं, लेकिन अगर वे ऐसा नहीं करतीं तो चुनाव आयोग के पास उन्हें डी-रजिस्टर करने की शक्ति सीमित है. पिछले साल चुनाव आयोग ने 800 से ज्यादा RUPP को अपनी सूची से हटाया था. आयोग की ओर से बताई गई वजहों में यह शामिल था कि इन पार्टियों ने पिछले छह साल में किसी भी चुनाव में एक भी उम्मीदवार नहीं उतारा था.
लेकिन आजतक की पड़ताल एक बड़ा सवाल सामने रखती है अगर कोई पार्टी लंबे समय तक जमीन पर सक्रिय नहीं है, उसके कार्यालय का पता संदिग्ध है और फिर भी उसके नाम पर करोड़ों रुपये का चंदा आ रहा है, तो उसकी फंडिंग की निगरानी और जांच का सिस्टम कितना मजबूत है?