इनफॉर्मल, गर्मजोशी और पर्सनल टच PM मोदी की डिप्लोमेसी का ट्रेडमार्क बन चुके हैं. प्रोटोकॉल की औपचारिक सीमाओं से आगे बढ़कर वे वर्ल्ड लीडर्स के साथ ऐसा व्यक्तिगत कनेक्ट बनाने की कोशिश करते हैं, जो मुश्किल दौर में भी संवाद के रास्ते खुले रखे. यही वजह है कि ट्रंप हों, पुतिन हों या जिनपिंग मोदी के रिश्तों में निजी केमिस्ट्री की झलक अक्सर दिखाई देती है.
2024 में एक इंटरव्यू में PM मोदी ने कहा था, "If our diplomacy is stuck in the protocol, then we will not be able to perform. The power of diplomacy is also there in the informal." यानी कि अगर हमारी कूटनीति सिर्फ प्रोटोकॉल में ही उलझी रहेगी, तो हम बेहतर नतीजे नहीं दे पाएंगे. कूटनीति की ताकत अनौपचारिक बातचीत में भी होती है.
साफ है कि PM मोदी खुद मानते हैं कि कूटनीति सिर्फ प्रोटोकॉल और औपचारिक बैठकों तक सीमित नहीं हो सकती; अनौपचारिक संपर्क भी उसका हिस्सा है.
17 सितंबर को जब मोदी अपना 76वां जन्मदिन मना रहे हैं, तब उनके राजनीतिक सफर की इस उपलब्धि को सिर्फ चुनावी जीतों या घरेलू राजनीति के आईने से देखने के बजाय दुनिया के बदलते शक्ति-संतुलन के संदर्भ में भी देखा जा सकता है. पिछले कुछ वर्षों में भारत की विदेश नीति का एक प्रमुख तत्व यह रहा है कि हम किसी एक शक्ति खेमे में पूरी तरह बंधने के बजाय अलग-अलग देशों के साथ अपने हितों के मुताबिक रिश्ते बनाए रखे.
अब देखिए, एक तरफ अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हैं, दूसरी तरफ रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और तीसरी तरफ चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग. तीनों नेताओं की भारत से अपेक्षाएं अलग हैं, ये अपक्षाएं कई बार आपस में टकराती भी हैं. मसलन पुतिन और ट्रंप दोनों भारत से क्रूड खरीदारी को लेकर अलग अलग अपेक्षाएं रखते हैं, इन तीनों की आपसी दोस्ती नहीं है और तीनों के साथ भारत के रिश्तों अपने डायनामिक्स हैं. फिर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन तीनों पावर सेंटर के साथ लगातार संवाद बनाए हुए हैं.
यही मोदी की विदेश नीति की सबसे दिलचस्प तस्वीर है. एक ही वक्त में अमेरिका से साझेदारी, दबाव के बावजूद रूस से रणनीतिक रिश्ता और चीन से प्रतिस्पर्धा के बीच बातचीत.
पुतिन के साथ भरोसे की पुरानी धुरी
अगर मोदी के वर्ल्ड कनेक्ट में कोई रिश्ता सबसे लंबे समय से रणनीतिक निरंतरता दिखाता है तो वह रूस के साथ संबंध है. रूस भारत को सिविलाइजेशनल स्टेट कहता है. रक्षा से लेकर परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष तक भारत-रूस रिश्ते दशकों पुराने हैं.
पुतिन के लिए पीएम मोदी के संबोधनों में माय फ्रेंड, डियर फ्रेंड और ऑल वेदर फ्रेंड जैसे शब्द होते हैं.
जुलाई 2024 में मॉस्को दौरे पर गए पीएम मोदी ने भारत-रूस संबंधों पर कहा था, "तापमान चाहे कितना भी नीचे क्यों न चला जाए. भारत-रूस की दोस्ती हमेशा ‘प्लस’ में रही है, यह गर्मजोशी से भरी है."
यूक्रेन युद्ध ने दौरान प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पुतिन दोनों की दोस्ती का इम्तिहान लिया. भारत पर जबरदस्त दबाव था कि वो रूस से कच्चा तेल न खरीदे. अमेरिका ने तो आरोप लगाया कि भारत रूस की वॉर मशीन को फंड कर रहा है.
लेकिन पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत ने पश्चिमी दबाव के बावजूद रूस से ऊर्जा संबंध पूरी तरह खत्म नहीं किए और अपनी जरूरतों के आधार पर रूसी तेल खरीदना जारी रखा. इस महत्वपूर्ण समय में भारत और रूस ने सघन डिप्लोमेसी की. कभी विदेश मंत्री एस जयशंकर मॉस्को गए तो कभी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल.
हालांकि प्रधानमंत्री मोदी ने एक जिम्मेदार ताकत की तरह रूस को जंग से निकलने का भी संदेश दिया और अंतहीन युद्ध से युद्ध के अंत की बात की. यही नहीं युद्ध को खत्म करने में भारत के मदद की पेशकश भी की. संतुलन साधना पीएम मोदी के विदेश नीति की पहचान है.
2025 के SCO शिखर सम्मेलन में मोदी और पुतिन हाथ पकड़कर चलते दिखे. दोनों नेताओं की कार की तस्वीर प्रधानमंत्री के विदेश यात्राओं की सिग्नेचर फोटो बन गई है.
सितंबर 2026 में BRICS सम्मेलन से पहले मोदी और पुतिन की दिल्ली में मुलाकात हुई. दोनों नेताओं ने रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष, व्यापार और औद्योगिक सहयोग समेत कई क्षेत्रों की समीक्षा की. दोनों देशों ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक ले जाने के लक्ष्य पर भी जोर दिया.
ब्रिक्स में कई मौके आए जब पीएम मोदी और पुतिन की बॉन्डिंग देखने को मिली.
पुतिन मोदी को 'डियर फ्रेंड; कहते हैं और भारत को मास्को के लिए महत्वपूर्ण विकल्प बताते हैं. यूरेशिया ग्रुप के एक्सपर्ट प्रमित पाल चौधरी ने एक रिपोर्ट में कहा है, "भारत रूस को चीन पर पूरी तरह निर्भर नहीं होने देता. यह केमिस्ट्री भारत को ऊर्जा सुरक्षा और रक्षा उपकरणों की आपूर्ति सुनिश्चित करती है."
मोदी-पुतिन के रिश्ते की खासियत व्यक्तिगत गर्मजोशी के साथ-साथ वर्षों पुराने रिश्ते हैं. रूस भारत के लिए सिर्फ एक पुराना दोस्त नहीं, बल्कि रक्षा, ऊर्जा और रणनीतिक सुरक्षा से जुड़ा महत्वपूर्ण साझेदार बना हुआ है.
ट्रंप के साथ रिश्ते
अमेरिकी विदेश नीति के विशेषज्ञ Ashley J. Tellis ने PM मोदी की पहली अमेरिका यात्रा से पहले लिखा था कि उन्हें प्रमुख वैश्विक नेताओं के साथ व्यक्तिगत रिश्ते बनाने चाहिए.
उनकी लाइन थी, "Modi must build personal relationships with key interlocutors." उन्होंने बताया कि भले ही देश आखिरकार अपने राष्ट्रीय हितों के हिसाब से काम करते हैं, लेकिन व्यवहार में नेताओं के बीच निजी संबंध उस नीति के संचालन को प्रभावित करते हैं.
ट्रंप के साथ मोदी का रिश्ता शुरू से ही व्यक्तिगत रहा."मेरे दोस्त" कहकर संबोधित करना दोनों तरफ से आम हो गया. पहले कार्यकाल में “हाउडी मोदी” और “नमस्ते ट्रंप” जैसे आयोजनों ने इसे मजबूत किया.
लेकिन इस दोस्ती की परीक्षा ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में हुई जब अमेरिकी राष्ट्रपति एकदम से बदले बदले नजर आए. पहले भारत पर टैरिफ थोपना, रूस को लेकर दबाव, फिर ऑपरेशन सिंदूर के दौरान बयानबाजी.
2025 में अमेरिका ने भारत पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगाए, रूसी तेल खरीद को लेकर आरोप लगाए और भारत-पाक संघर्ष में मध्यस्थता का दावा किया. कई नेता ऐसे में प्रतिक्रिया देते, लेकिन पीएम मोदी ने रणनीतिक चुप्पी अपनाई. मोदी ने सार्वजनिक रूप से ट्रंप पर व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं की, न नोबेल शांति पुरस्कार का समर्थन किया और न ही आरोपों का जवाब दिया.
जून 2025 की फोन बातचीत के बाद उन्होंने कई कॉल भी टाले. लेकिन पीएम मोदी की चुप्पी एक कूटनीतिक हथियार थी, इसका मतलब निष्क्रियता नहीं था. भारत ने चुपचाप अन्य देशों ब्रिटेन, यूरोपीय संघ, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया से व्यापार समझौते बढ़ाए, विकल्प मजबूत किए और घरेलू बाजार पर ध्यान केंद्रित रखा.
यह धैर्य कामयाब रहा. 2026 की शुरुआत में ट्रंप ने टैरिफ घटाकर 18 प्रतिशत कर दिए और अतिरिक्त जुर्माना हटा लिया. PM की चुप्पी ने ट्रंप को नाटकीयता का मौका नहीं दिया और भारत को दबाव में झुकने से बचाया. ये एक सच्चे स्टेट्समैन का परिचय था.
पीएम मोदी कभी भी उकसावे में नहीं आए. साथ ही ट्रंप के साथ संवाद का पर्सनल चैनल कभी बंद नहीं किया. यही वजह रही कि दोनों नेताओं के बीच समय-समय पर फोन पर बातें होती रहीं. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी दोनों नेता मिलते रहे.
भारत-अमेरिका संबंधों में कड़वाहट के बावजूद ट्रंप PM मोदी तारीफ करते रहे. फरवरी 2025 में व्हाइट हाउस में मोदी का स्वागत करते हुए ट्रंप ने उन्हें 'a great friend' कहा. अक्तूबर में उन्होंने PM मोदी ग्रेट मैन और फ्रेंड कहा.
जून 2026 में G7 के दौरान एवियां में मोदी और ट्रंप की मुलाकात हुई तो दोनों ने व्यापार, रक्षा, ऊर्जा और टेक्नोलॉजी सहयोग की समीक्षा की. दोनों नेताओं ने भारत-अमेरिका व्यापक वैश्विक रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई.
इस दौरान ट्रंप ने PM मोदी की negotiating skills की तारीफ की और उन्हें 'टफ वार्ताकार' और एंजेल कहा.
अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने भी जून में मोदी और ट्रंप के रिश्ते में व्यक्तिगत केमिस्ट्री को अहम बताया था.
जिनपिंग के साथ कहानी सबसे मुश्किल
अब आता है चीन. यही वह रिश्ता है जिसमें दोस्ती से ज्यादा प्रतिस्पर्धा, भरोसे से ज्यादा सावधानी और गर्मजोशी से ज्यादा रणनीतिक गणित है.
पीएम बनते ही प्रधानमंत्री ने जिनपिंग को भारत आने का न्योता देकर इतिहास की घटनाओं में फंसे भारत-चीन के रिश्तों को एक फ्रेश स्टार्ट देने की कोशिश की. 2015 में पीएम मोदी चीन गए. इसके बाद दोनों नेताओं के बीच अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कई मुलाकातें हुईं.
लेकिन 2020 के गलवान संघर्ष के बाद भारत-चीन संबंध बेहद तनावपूर्ण दौर में चले गए. पीएम मोदी के लिए ये चुनौतीपूर्ण समय था.
भारत-चीन संबंधों का डायनामिक्स प्रतिस्पर्धा और जरूरत दोनों का मिला जुला रूप है. करीब 3,800 किमी लंबी विवादित सीमा, एशिया में शक्ति-संतुलन और हिंद-प्रशांत की रणनीति भारत के लिए चीन को लगातार महत्वपूर्ण बनाती है. 2025 में दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार रिकॉर्ड 155 अरब डॉलर तक है. चीन से मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, रसायन जैसे महत्वपूर्ण औद्योगिक सामानों पर भारत की निर्भरता बनी हुई है.
इसलिए भारत की रणनीति न दोस्ती, न दुश्मनी बल्कि मैनेजमेंट की है. सीमा पर शांति बनाए रखना, आर्थिक जोखिम कम करना, विकल्प खोजना और साथ ही चीन के साथ संवाद जारी रखना. इसी प्रक्रिया में सीमा पर सैन्य तनाव कम करने की प्रक्रिया शुरू हुई. 2025 में तियानजिन SCO में PM मोदी का चीन दौरा रिश्तों में जमी बर्फ को पिघलाने में कामयाब हुआ.
अगस्त 2025 में जिनपिंग ने कहा कि ड्रैगन और एलिफेंट एक साथ डांस कर सकते हैं, इसके बाद PM मोदी ने कहा 'पार्टनर, नॉट राइवल'. ये बदलाव का रुख था. बॉर्डर पर गश्त फिर शुरू हुई, उड़ानें बहाल हुईं, व्यापार बढ़ा.
सितंबर 2026 में दिल्ली में BRICS सम्मेलन के दौरान दोनों नेताओं की फिर आमने-सामने बातचीत हुई. इससे पहले किर्गिस्तान में दोनों नेताओं की भेंट हुई थी.
PM मोदी ने शी से साफ कहा कि दोनों देशों के रिश्तों को तीन ‘म्यूचुअल्स’ आपसी सम्मान, आपसी संवेदनशीलता और आपसी हित के आधार पर आगे बढ़ाना चाहिए.
PM मोदी की तीनों के साथ एक साथ केमिस्ट्री कैसे बनी? इसका जवाब है, मल्टी अलाइनमेंट. विदेश मंत्री एस. जयशंकर बार-बार कहते हैं कि भारत कई विकल्प रखता है. ट्रंप के टैरिफ प्रेशर ने भारत को चीन और रूस के करीब ले जाने में मदद की, लेकिन मोदी ने कभी किसी एक खेमे में नहीं बंधे. 2025 के SCO में तीनों के साथ हाथ मिलाने और 2026 के ब्रिक्स में दिल्ली में मेजबानी करने की तस्वीरें दुनिया को संदेश देती हैं कि भारत किसी का पक्ष नहीं लेता, अपने हितों का पक्ष लेता है.
PM मोदी की व्यक्तिगत कूटनीति फोन कॉल, साइडलाइन मुलाकात, प्रतीकात्मक जेस्चर भारत को बड़े खिलाड़ियों के बीच जगह दिलाती है. PM मोदी के जन्मदिन पर जब ट्रंप फोन पर बधाई देते हैं, पुतिन संदेश भेजते हैं तो साफ है कि मोदी का वर्ल्ड कनेक्ट सिर्फ औपचारिक नहीं, व्यक्तिगत और रणनीतिक दोनों है. यह केमिस्ट्री भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका का प्रमाण है.