
20 जुलाई की सुबह संसद का मानसून सत्र शुरू होना था. हर बार की तरह मेरी सुबह भी विजय चौक से हुई. सुबह करीब आठ बजे मैं संसद सत्र के पहले दिन की तैयारियों, संभावित हंगामे और सरकार-विपक्ष की रणनीति पर लाइव रिपोर्टिंग कर रहा था.
विजय चौक पर सामान्य दिनों की तुलना में सुरक्षा कहीं ज्यादा कड़ी थी. दिल्ली पुलिस, सीआरपीएफ और अन्य अर्धसैनिक बलों के जवान अपनी-अपनी ड्यूटी पर तैनात थे. संसद सत्र के पहले दिन ऐसी चौकसी कोई नई बात नहीं होती, लेकिन उस समय किसी को अंदाजा नहीं था कि कुछ ही घंटों बाद यही इलाका देश के सबसे बड़े छात्र प्रदर्शनों में से एक का गवाह बनने वाला है.
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करीब 11 बजे विजय चौक पर अचानक तेज आवाजें सुनाई देने लगीं. पहले लगा कि शायद आसपास किसी दूसरे कार्यक्रम का शोर है, लेकिन कुछ ही मिनटों में नारे लगातार तेज होने लगे. वहां मौजूद सुरक्षा अधिकारियों के बीच भी चर्चा शुरू हो गई कि आखिर इतनी आवाज आ कहां से रही है.
इसी बीच एक साथी रिपोर्टर तेजी से दौड़ते हुए विजय चौक पहुंचा. उसने बताया कि जंतर-मंतर से सीजेपी के नेतृत्व में छात्रों का विशाल मार्च संसद की ओर बढ़ चुका है.

उसी समय संसद के भीतर विपक्ष के हंगामे की खबरें भी आने लगी थीं. लेकिन संसद के अंदर की राजनीतिक हलचल से कहीं बड़ा घटनाक्रम बाहर सड़कों पर आकार ले रहा था.
मैं तुरंत संसद परिसर से निकलकर रेल भवन की ओर बढ़ा. वहां पहुंचते ही पूरा दृश्य बदल चुका था. सैकड़ों प्रदर्शनकारी रेल भवन, कृषि भवन, संसद के प्रवेश द्वार, रफी मार्ग और रायसीना रोड के चौराहे तक पहुंच चुके थे. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सुरक्षा एजेंसियों ने कुछ ही मिनटों में रेल भवन और कृषि भवन के मुख्य प्रवेश द्वार बंद करा दिए. नई संसद के आसपास सुरक्षा घेरा और मजबूत कर दिया गया.
छात्र लगातार नारे लगा रहे थे, "धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दो", "पेपर लीक बंद करो", "छात्रों को न्याय दो" और "आत्महत्या करने वाले छात्रों को मुआवजा दो".
भीड़ में बड़ी संख्या ऐसे युवाओं की थी जिनके चेहरे पर गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था. वहीं बड़ी संख्या ऐसे छात्रों की भी थी जो शांतिपूर्वक मार्च करते हुए सिर्फ अपनी बात सरकार तक पहुंचाना चाहते थे.
इसी दौरान एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मौके पर पहुंचे और सुरक्षा व्यवस्था की कमान संभाली. हम लगातार वीडियो रिकॉर्ड कर रहे थे और लाइव अपडेट भेजने की कोशिश कर रहे थे. तभी जानकारी मिली कि पूरे इलाके में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गई हैं.
शुरुआत में लगा कि शायद नेटवर्क की कोई तकनीकी समस्या होगी, लेकिन जल्द ही साफ हो गया कि सुरक्षा कारणों से इंटरनेट सेवाएं अस्थायी रूप से निलंबित कर दी गई हैं.
पत्रकार के तौर पर यह हमारे लिए भी बड़ी चुनौती थी. रिपोर्ट तैयार थी, लेकिन उसे भेजने का कोई माध्यम नहीं था. मजबूरन हम रेल भवन के आसपास ऐसी जगह तलाशने लगे, जहां किसी तरह इंटरनेट का कमजोर सिग्नल मिल सके. काफी कोशिश के बाद एक स्थान पर नेटवर्क मिला और वहीं से हमने सबसे पहले कैमरे में रिकॉर्ड किए गए वीडियो, तस्वीरें और शुरुआती जानकारी दफ्तर भेजी.

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इंटरनेट बंद होने का असर सिर्फ मीडिया पर नहीं था. सबसे ज्यादा परेशानी प्रदर्शनकारियों को हो रही थी. लोग एक-दूसरे से संपर्क नहीं कर पा रहे थे. किसी को यह पता नहीं था कि नेतृत्वकर्ता कहां हैं और अगला कदम क्या होगा.
कुछ छात्र बार-बार पूछ रहे थे, "मार्च निकल गया क्या?", "अब संसद किस रास्ते से जाना है?", "लीडर कहां हैं?"
बाद में पता चला कि प्रदर्शनकारियों का एक बड़ा समूह नेतृत्वकर्ताओं से पहले ही संसद की ओर निकल चुका था. अभिजीत दिपके समेत आंदोलन के कई प्रमुख चेहरे उस समय उस समूह के साथ मौजूद नहीं थे. इंटरनेट बंद होने की वजह से यह सूचना बाकी प्रदर्शनकारियों तक भी नहीं पहुंच सकी.
नतीजा यह हुआ कि भीड़ कई हिस्सों में बंट गई. कुछ लोग अभी भी जंतर-मंतर के आसपास अगली घोषणा का इंतजार कर रहे थे, जबकि हजारों प्रदर्शनकारी संसद की ओर बढ़ चुके थे.
हमने भी संसद मार्ग की ओर बढ़ने का फैसला किया. लेकिन उस समय दिल्ली की सड़कें किसी सुरक्षा कवच जैसी नजर आ रही थीं. जगह-जगह बैरिकेड, पुलिस की अतिरिक्त टुकड़ियां और बंद रास्ते थे. कई बार हमें खुद समझ नहीं आया कि संसद तक पहुंचने का सही रास्ता कौन-सा है. भीड़ और सुरक्षा घेरों के बीच कई बार दिशा बदलनी पड़ी.
भटकते-भटकते हम उस स्थान तक पहुंचे, जहां हजारों प्रदर्शनकारी पहले से मौजूद थे. सामने बड़े-बड़े लोहे के बैरिकेड लगे थे और दूसरी तरफ दिल्ली पुलिस तथा अर्धसैनिक बल पूरी तैयारी के साथ खड़े थे.
प्रदर्शनकारी लगातार आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे थे. कुछ लोग बैरिकेड हटाकर संसद की ओर बढ़ना चाहते थे. तनाव हर मिनट बढ़ता जा रहा था.
इसके बाद पुलिस ने लाउडस्पीकर से घोषणा शुरू की. बताया गया कि पूरे क्षेत्र में बीएनएस की धारा 163 लागू है और किसी भी व्यक्ति को यहां एकत्र होने की अनुमति नहीं है. प्रदर्शनकारियों से बार-बार अपील की गई कि वे पीछे हट जाएं. लेकिन नारेबाजी थमने का नाम नहीं ले रही थी.

भीड़ का एक हिस्सा शांत था. वे वहीं बैठकर अपना विरोध दर्ज कराना चाहते थे. लेकिन कुछ युवा बेहद आक्रामक थे. वे बैरिकेड हटाने की कोशिश कर रहे थे और पुलिस से लगातार बहस कर रहे थे.
कुछ देर बाद पुलिस ने भीड़ को पीछे धकेलने की कार्रवाई शुरू की. कई जगह ऐसा स्प्रे किया गया, जिससे लोगों की आंखों में तेज जलन होने लगी. कई प्रदर्शनकारी आंखें मलते हुए पीछे हटे. इसके बाद सीमित स्तर पर बल प्रयोग भी हुआ. कुछ स्थानों पर लाठियां भी चलीं. लेकिन इसके बावजूद भीड़ पीछे हटने को तैयार नहीं थी.
कुछ ही मिनटों में प्रदर्शनकारियों ने मिलकर एक बैरिकेड को जोरदार धक्का दिया और आखिरकार वह टूट गया. बैरिकेड टूटते ही हजारों लोग तेजी से आगे बढ़ गए. पुलिस भी उनके साथ-साथ आगे बढ़ती रही, ताकि स्थिति पूरी तरह नियंत्रण से बाहर न चली जाए.
रेल भवन से लेकर रफी मार्ग, रायसीना रोड, कर्तव्य पथ, वायु सेवा भवन और सेवा तीर्थ मेट्रो स्टेशन तक कई घंटों तक यही स्थिति बनी रही. पुलिस लगातार भीड़ को पीछे धकेलती रही और प्रदर्शनकारी आगे बढ़ने की कोशिश करते रहे.
इसी दौरान कई मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश द्वार भी बंद कर दिए गए, ताकि अतिरिक्त भीड़ इस इलाके तक न पहुंच सके. सुरक्षा एजेंसियों का साफ उद्देश्य था कि संसद भवन के सुरक्षा घेरे तक किसी भी कीमत पर प्रदर्शनकारी न पहुंचें.
इसके बावजूद यह किसी सामान्य विरोध प्रदर्शन जैसा नहीं था. पुलिस की हर कार्रवाई के बाद प्रदर्शनकारी फिर से संगठित हो जाते थे. कुछ लोग इंडिया गेट के आसपास बने पार्कों तक पहुंच गए. वहां भी भीड़ लगातार बढ़ती रही. पुलिस ने उन्हें हटाने की कोशिश की और इस दौरान कई जगह धक्का-मुक्की और झड़पें भी हुईं. कुछ प्रदर्शनकारियों और पुलिसकर्मियों को मामूली चोटें भी आईं.
पूरे घटनाक्रम के दौरान रेल भवन और उसके आसपास काम करने वाले कर्मचारी भी सबसे ज्यादा प्रभावित नजर आए. कई कर्मचारी अपनी इमारतों के भीतर से पूरा घटनाक्रम देख रहे थे. प्रशासन लगातार सभी को सुरक्षा कारणों से भवनों की सीमा से दूर रहने की सलाह देता रहा.
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करीब साढ़े तीन बजे के बाद हालात धीरे-धीरे सामान्य होने लगे. पुलिस ने चरणबद्ध तरीके से प्रदर्शनकारियों को रफी मार्ग और रायसीना रोड से हटाना शुरू किया. इसके बाद भीड़ कनॉट प्लेस, जनपथ और आसपास के अन्य इलाकों की ओर बढ़ गई. वहां भी पुलिस को देर तक व्यवस्था संभालनी पड़ी.

पूरे दिन की रिपोर्टिंग के दौरान एक बात लगातार महसूस हुई. यह आंदोलन अब सिर्फ एक परीक्षा या एक मंत्री के इस्तीफे की मांग तक सीमित नहीं रह गया था. जिन छात्रों से बातचीत हुई, उनमें कोई भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी से परेशान था, कोई बेरोजगारी से, तो कोई वर्षों की मेहनत के बावजूद व्यवस्था में पारदर्शिता न मिलने से नाराज था. उनके लिए शिक्षा सिर्फ डिग्री का सवाल नहीं थी, बल्कि भविष्य, रोजगार और सम्मान का सवाल बन चुकी थी.
संसद के पहले दिन सुरक्षा एजेंसियों ने व्यापक तैयारी की थी. करीब पांच हजार दिल्ली पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवान पूरे इलाके में तैनात किए गए थे. इसके बावजूद प्रदर्शनकारियों का संसद और रेल भवन के प्रवेश क्षेत्र तक पहुंच जाना सुरक्षा व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती माना गया. बाद के दिनों में सरकार ने भी पूरे घटनाक्रम की समीक्षा की और सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत किया.
जब शाम ढलने लगी और मैं पूरे दिन की रिकॉर्डिंग देखते हुए दफ्तर लौट रहा था, तब मेरे मन में एक ही सवाल बार-बार उठ रहा था—क्या यह सिर्फ एक दिन का विरोध था, या आने वाले समय की किसी बड़ी राजनीतिक और सामाजिक चेतावनी की शुरुआत?
उस दिन संसद के बाहर सिर्फ नारे नहीं गूंज रहे थे. वहां हजारों युवाओं की बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी. किसी के हाथ में तख्ती थी, किसी के चेहरे पर आंसू गैस का असर था, किसी की आंखों में अपने भविष्य की चिंता थी और किसी के मन में व्यवस्था के प्रति गहरा अविश्वास.
पत्रकार के तौर पर मैंने उस दिन सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं देखा. मैंने देखा कि जब संवाद कमजोर पड़ता है, तो सड़कें आवाज बन जाती हैं. संसद के पहले दिन सत्ता के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले इलाके में छात्रों का यह मार्च सिर्फ सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती नहीं था, बल्कि देश की शिक्षा व्यवस्था, भर्ती प्रणाली और युवाओं के बढ़ते असंतोष का सबसे बड़ा संकेत भी था.
20 जुलाई की वह दोपहर अब मेरे लिए सिर्फ एक तारीख नहीं रही. वह मेरी रिपोर्टिंग के उन दिनों में दर्ज हो चुकी है, जब संसद भवन के बाहर लोकतंत्र की सबसे तेज आवाज सड़कों से उठ रही थी. रेल भवन से लेकर सेवा तीर्थ मेट्रो स्टेशन तक हर कदम पर ऐसा लग रहा था कि देश का युवा सिर्फ विरोध नहीं कर रहा, बल्कि व्यवस्था से जवाब मांग रहा है. उस दिन मैंने महसूस किया कि जब संवाद की जगह टकराव ले लेता है, तो लोकतंत्र की सबसे बुलंद आवाज संसद के भीतर नहीं, बल्कि सड़कों पर सुनाई देती है.