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भारत ने जब अमेरिकी दूतावास से हटा दी थी सिक्योरिटी वॉल, 2026 में क्यों याद आया 2013

2013 में जब डिप्टी कॉन्सुल देवयानी खोबरागड़े की गिरफ्तारी हुई थी तो भारत ने अमेरिका के खिलाफ सख्त एक्शन लिया था. लेकिन जून 2026 में ओमान की खाड़ी में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में तीन भारतीय नाविकों की मौत हुई, तो भारत विरोध तक ही सिमट गया. हालांकि इस घटना ने दोनों देशों के राजनयिक और राजनीतिक रिश्तों को प्रभावित किया है.

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ओमान की खाड़ी में तीन नाविकों के मौत को लेकर सवाल उठ रहे हैं. (File Photo- ITGD)
ओमान की खाड़ी में तीन नाविकों के मौत को लेकर सवाल उठ रहे हैं. (File Photo- ITGD)

दिसंबर 2013 में भारत और अमेरिका के बीच एक ऐसा टकराव हुआ, जिसे हाल के इतिहास में सबसे बड़ा विवाद माना जाता है. उस समय न्यूयॉर्क में भारत की डिप्टी कॉन्सुल जनरल देवयानी खोबरागड़े को अमेरिकी फेडरल एजेंटों ने उनकी घरेलू सहायिका से जुड़े वीजा धोखाधड़ी के आरोपों में गिरफ्तार कर लिया था.

ये मामला सिर्फ एक कानूनी विवाद नहीं था. कूटनीतिक रिश्तों में दरार आने की असली वजह वो तरीका था, जिससे ये गिरफ्तारी की गई थी. खोबरागड़े को उनकी बेटी के स्कूल के बाहर हथकड़ी लगाई गई. 

अमेरिकी मार्शल्स सर्विस ने उनकी पट्टी उतारकर तलाशी ली और कैविटी सर्च भी की. इसके बाद उन्हें आम अपराधियों और ड्रग तस्करों के साथ एक ही सेल में बंद कर दिया गया. जब अमेरिकी अधिकारियों ने बाद में इसे एक सामान्य गिरफ्तारी बताया तो भारत का गुस्सा और भड़क गया. 

2013 में हटा दिए गए थे अमेरिकी दूतावास के बैरिकेड

भारत ने तब बेहद सख्त एक्शन लिया था. तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) शिवशंकर मेनन ने अमेरिकी अधिकारियों के इस व्यवहार को 'घिनौना और बर्बर' करार दिया था. भारत सरकार ने तुरंत कदम उठाते हुए अमेरिकी कॉन्सुलर स्टाफ के एयरपोर्ट पास और राजनयिक विशेषाधिकार वापस ले लिए. 

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चेन्नई, हैदराबाद, मुंबई और कोलकाता में अमेरिकी दूतावास के कर्मचारियों को जारी पहचान पत्र रद्द कर दिए गए. नई दिल्ली में स्थित अमेरिकन एंबेसी स्कूल के कर्मचारियों के वीजा इंतजामों की भी जांच शुरू कर दी गई.

इस टकराव का सबसे बड़ा असर देश की राजधानी में देखने को मिला. भारतीय अधिकारियों ने नई दिल्ली में अमेरिकी दूतावास के मेन गेट के बाहर लगे कंक्रीट के सुरक्षा बैरिकेड्स को क्रेन से हटा दिया. इस कदम को दुनिया भर में एक संप्रभु राष्ट्र के कड़े जवाब और बराबरी के अधिकार के रूप में देखा गया. ये अमेरिका को एक सीधा संदेश था कि कूटनीतिक सम्मान एकतरफा नहीं हो सकता. 

उस समय देश के तमाम राजनीतिक दल एक सुर में थे. गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई बड़े नेताओं ने भारत दौरे पर आए अमेरिकी संसदीय प्रतिनिधिमंडल से मिलने से साफ मना कर दिया था. साल 2013 का संदेश बिल्कुल साफ था कि अगर देश के सम्मान और राजनयिक नियमों का उल्लंघन हुआ, तो भारत उसकी बड़ी कीमत वसूलने के लिए तैयार है.

2026 की घटना: ओमान की खाड़ी में 3 भारतीयों की मौत

इस ऐतिहासिक घटना के 12 साल से ज्यादा समय बाद, जून 2026 में एक और बड़ा संकट खड़ा हो गया है. इस नए संकट ने ये सवाल उठा दिया है कि क्या भारत में आज भी वही आक्रामकता बची है?

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मामला जून 2026 का है, जब ओमान की खाड़ी में अमेरिकी सैन्य बलों ने उन कमर्शियल जहाजों पर हमला कर दिया, जो वाशिंगटन की नौसैनिक नाकेबंदी के बीच ईरानी तेल ले जा रहे थे. इस अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में तीन भारतीय मर्चेंट नाविक- आदित्य शर्मा, शिवानंद चौरसिया और पटनाला सुरेश की मौत हो गई. इन मौतों ने पूरे भारत में शोक और भारी आक्रोश पैदा कर दिया. 

आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम में रहने वाले एक नाविक के परिजनों ने रोते हुए मीडिया को अपने बेटे की तस्वीर दिखाई. मृतक नाविक आदित्य शर्मा के दादा ने कहा कि उनके परिवार का दिल पूरी तरह टूट चुका है और वो इस पूरी घटना का पूरा सच जानना चाहते हैं.

भारत का विरोध और अमेरिका का अड़ियल रुख

इस घटना के बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी कार्यवाहक राजदूत जेसन मीक्स को तलब किया. भारत ने नागरिक जहाजों पर इस घातक बल प्रयोग को 'दुखद और टालने योग्य' बताया. विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 12 जून को अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन  तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री) मार्को रुबियो से सीधे फोन पर बात की और भारत का विरोध किया. 

वहीं, जयशंकर ने साफ कहा कि कमर्शियल जहाजों पर ऐसी जानलेवा कार्रवाई को किसी भी तरह सही नहीं ठहराया जा सकता. लेकिन, इस बातचीत के बाद अमेरिकी विदेश विभाग का जो आधिकारिक बयान आया, उसका लहजा बिल्कुल अलग था. 

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जयशंकर के बयान के करीब 18 घंटे बाद जारी हुए अमेरिकी बयान में भारत के विरोध या तीन भारतीय नाविकों की मौत का कोई जिक्र तक नहीं था. अमेरिकी पक्ष ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में चलने वाले सभी कमर्शियल जहाजों को अमेरिकी सेना के निर्देशों का पालन करना ही होगा और नाकेबंदी का उल्लंघन किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

घरेलू राजनीति में उठे सवाल

अमेरिका के इस रुख की भारत में तीखी आलोचना हो रही है. कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने अमेरिकी बयान को 'बेहद चौंकाने वाला' बताया. उन्होंने सवाल उठाया कि जो देश खुद को भारत का दोस्त और रणनीतिक साझेदार कहता है, वो इतना संवेदनहीन कैसे हो सकता है? 

थरूर ने याद दिलाया कि इन समुद्री रास्तों से गुजरने वाले जहाजों के क्रू में बहुत बड़ी संख्या भारतीय नागरिकों की होती है, ऐसे में ये स्थिति बेहद चिंताजनक है. पूर्व विदेश सचिव निरुपमा राव ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि आज की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में प्रतिबंधों, नाकेबंदी और जबरदस्ती की भाषा हावी हो गई है और कूटनीति का काम सिर्फ मलबे को साफ करने जैसा रह गया है.

बदलते दौर की कूटनीति

इस पूरे घटनाक्रम में एक दिलचस्प संयोग भी है. साल 2013 में जब देवयानी खोबरागड़े संकट खड़ा हुआ था, तब एस. जयशंकर ही अमेरिका में भारत के राजदूत बनकर वाशिंगटन पहुंचे थे ताकि दोनों देशों के बिगड़ते रिश्तों को संभाला जा सके. आज, एक दशक बाद वह देश के विदेश मंत्री हैं और विदेश में मारे गए भारतीय नागरिकों के हक के लिए राजनयिक मोर्चे की अगुवाई कर रहे हैं.

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यह भी पढ़ें: ओमान के पास हुए ताजा हमले में 4 भारतीयों की मौत का सच क्या? आ गया MEA का बयान

साल 2013 में भारत ने अमेरिकी दूतावास के बाहर से बैरिकेड्स हटा दिए थे, और अमेरिका उस कड़े संदेश को समझ गया था. लेकिन साल 2026 में सवाल यह पूछा जा रहा है कि क्या आज के दौर में, जो पूरी तरह से ताकत और रणनीतिक नफा-नुकसान से चलता है, वहां सिर्फ एक राजनयिक विरोध पत्र दर्ज करा देना ही काफी है, या भारत को अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए इससे कहीं कड़ा रुख अपनाना होगा?

(इंडिया टुडे पर प्रकाशित ज्योति शुक्ला के लेख से)

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