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लाश जैसे बिस्तर पर गुजरे 13 साल, इच्छामृत्यु के बाद भी जिंदा हैं हरीश राणा की आंखें और दिल

13 साल तक परसिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट में रहने वाले हरीश राणा को सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बाद इच्छामृत्यु दी गई. निधन के बाद उनकी आंखें और दिल दान कर दिए गए, जिससे कई लोगों को नई जिंदगी मिली है. पढ़ें पूरी कहानी.

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हरीश राणा मरकर भी कई लोगों को जिंदगी दे गए (फोटो-ITG)
हरीश राणा मरकर भी कई लोगों को जिंदगी दे गए (फोटो-ITG)

देश की सबसे बड़ी अदालत ने उसे इज्जत की मौत देने का हुक्म सुनाया था. देश के सबसे बड़े अस्पताल ने धीरे धीरे उसकी सांसों की रफ्तार थामी. फिर 24 मार्च को हरीण राणा की आंखें और दिल की धड़कने दोनों हमेशा के लिए बंद हो गई, लेकिन महज कुछ वक्त के लिए. क्योंकि हरीश की आंखें अब किसी और की अंधेरी दुनिया में रोशनी ला चुकी हैं और हरीश का दिल अब किसी और के सीने में धड़क रहा है. जानिए हरीश राणा कैसे मर कर भी जिंदा है. 

भूले तो नहीं ना. याद तो अब भी होगा आपको. वैसे भी हरीश राणा को भूलना, वो भी इतनी जल्दी मुमकिन भी नहीं है. जो नौजवान अपनी मौत का रास्ता खोल कर खुद जैसे ना जाने कितनी ही जिंदा लाशों के लिए इज़्ज़त की मौत का रास्ता खोल गया हो उसे भुलाया नहीं जा सकता. 13 सालों तक हरीश एक लाश बनकर बिस्तर पर पड़ा रहा. पर इसके बावजूद उसकी आंखें अपने आसपास की हर चीज़ देख रही थी. लाश बनकर भी ज़िंदा यूं था क्योंकि उसके दिल की धड़कनें तब भी धड़क रही थी. 

देश की सबसे बड़ी अदालत के हुक्म पर देश के सबसे बड़े अस्पताल में पूरे 11 दिन तक हरीश की मौत का इलाज हुआ. इलाज कामयाब रहा और 24 मार्च को हरीश की ये आंखें और दिल की धड़कन दोनों बंद हो गईं. लेकिन हरीश की इन्हीं बोलती आंखों से हमारे इसी देश के किसी कोने में कोई है जो अब दुनिया देख रहा है. कोई है जिसकी अंधेरी दुनिया में जाते जाते हरीश रौशनी से भर गया. हरीश की इन्हीं आंखों से जिस शख्स की अंधेरी दुनिया रौशन हुई है वो कौन है? क्या नाम है? किस धर्म या ज़ात का है? कहां रहता है? क्या करता है? ये ख़ुद हरीश के मां-बाप और छोटे भाई को भी नहीं पता. फिर भी उन्हें सुकून है कि उनके बेटे और भाई कि आंखें अब भी किसी की आंखें बनी हुई हैं.

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चूंकि हरीश के दिल की धड़कन क़ानून और मेडिकल सांइस की रज़ामंदी से बंद की गई थी. डॉक्टर जानते थे कि हरीश की धड़कने कब रुकेंगी. लिहाजा, ये भी साफ़ था कि अगर हरीश के घरवालों की मर्जी हो तो धड़कन रुकने के बाद भी हरीश का दिल किसी और को अपनी धड़कनें दे सकता है. हरीश के परिवार ने आंखों के साथ-साथ किसी और किसी और के दिल में जगह बनाने के लिए उसका दिल भी उसे दे दिया.

हरीश की मौत के बाद पहली बार हरीश के मां-बाप और छोटे भाई ने आजतक से बातचीत की. पहली बार हरीश के परिवार ने बताया कि क्यों हरीश के लिए मौत मांगने परिवार कोर्ट क्यों पहुंचा? कैसे हरीश की ज़िंदगी के आखिरी 13 साल और एम्स में वो 11 दिन बीते. हरीश की आखिरी घड़ी में क्या हुआ, कैसे धीरे-धीरे आख़िरी वक्त में हरीशा का खाना और पानी बंद किया गया, कैसे हरीश के छोटे भाई के सामने हरीश ने आख़िरी सांस ली, कैसे हरीश को पूरी इज्जत के साथ इच्छामृत्यु देने के बाद देश भर से अब उन्हें फ़ोन आते हैं. 

कैसे हरीश के बाद देश के अलग अलग हिस्सों में बरसों से लाश बनकर जी रहे लोगों के हिस्से ठीक वैसी ही इज्जत की मौत आई जैसे हरीश के हिस्से आई थी. और हरीश के जाने के बाद अब इनकी ज़िंदगी में क्या बदलाव आया है? हरीश का परिवार कहता है कि उसके जाने के बाद एक खालीपन है. लेकिन उसकी यादें हमेशा उनके साथ हैं. 

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हरीश के परिवार का कहना है कि जिसे भी हरीश की आंखें लगाई गई हैं, वो उस शख्स को नहीं जानते. ना ही उस व्यक्ति के बारे में उन्हें पता है, जिसके सीने में अब हरीश का दिल धड़क रहा है. लेकिन वो इस बात से खुश नजर आते हैं कि हरीश की वजह से उन लोगों की जिंदगी में कुछ खास हुआ है. एक शख्स की अंधेरी दुनिया उसकी आंखों से रोशन हो गई, तो दूसरे शख्स जान बच गई.

क्या हुआ था हरीश राणा के साथ?

साल 2013 में पंजाब यूनिवर्सिटी में बीटेक की पढ़ाई कर रहे हरीश राणा की जिंदगी एक हादसे ने पूरी तरह बदल दी थी. एक दिन वह अपने हॉस्टल की चौथी मंजिल की बालकनी से नीचे गिर गए. इस दुर्घटना में उनके सिर पर इतनी गंभीर चोट लगी कि उनका मस्तिष्क सामान्य रूप से काम करना बंद कर गया. इलाज के बावजूद उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ और वे 'परसिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट' (PVS) यानी गहरे कोमा जैसी स्थिति में पहुंच गए.

हादसे के बाद हरीश का जीवन बिस्तर तक सीमित हो गया. पिछले 13 वर्षों से वह गाजियाबाद स्थित अपने घर में परिवार की देखरेख में रह रहे थे. उन्हें जीवित रखने के लिए नली के जरिए पोषण दिया जाता था और जरूरत पड़ने पर ऑक्सीजन सपोर्ट भी उपलब्ध कराया जाता था. परिवार ने लंबे समय तक उनकी हालत में सुधार की उम्मीद की, लेकिन जब कोई सकारात्मक बदलाव नहीं दिखा तो उन्होंने कानूनी रास्ता अपनाने का फैसला किया.

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इसी सिलसिले में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. परिवार की दलीलों और मेडिकल स्थिति का अध्ययन करने के बाद अदालत ने 11 मार्च को मानवीय आधार पर हरीश के लिए पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दे दी. कोर्ट ने माना कि इतने लंबे समय से जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे मरीज के मामले में सम्मानजनक मृत्यु के अधिकार पर भी विचार किया जाना चाहिए.

अदालत के आदेश के बाद 14 मार्च को हरीश को उनके घर से एम्स के डॉ. बी.आर. अंबेडकर कैंसर अस्पताल की पैलिएटिव केयर यूनिट में भर्ती कराया गया. यहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की एक टीम ने उनकी देखभाल की जिम्मेदारी संभाली. तय प्रक्रिया के तहत उन्हें दिए जा रहे कृत्रिम पोषण को धीरे-धीरे बंद किया गया, ताकि उनकी अंतिम यात्रा बिना दर्द और पूरी गरिमा के साथ पूरी हो सके.

यह मामला देश में एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जा रहा है. विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने यह सुनिश्चित किया कि हरीश को अंतिम समय में किसी तरह की तकलीफ न हो. उनके निधन के साथ ही परिवार का 13 वर्षों से चला आ रहा संघर्ष समाप्त हो गया. साथ ही यह मामला भविष्य में पैसिव यूथेनेशिया से जुड़े कानूनी और चिकित्सकीय मानकों को तय करने में भी अहम भूमिका निभा सकता है.

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