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फ्री टाइम में रील्स, लूप या हॉबी? Doomscrolling कैसे छीन रही है टाइम

डूम्स्क्रॉलिंग यानी सोशल मीडिया पर लगातार कंटेंट देखते रहना, आज लोगों की हमारे डेली लाइफ की आदत बनती जा रही है. देर रात तक रील्स स्क्रॉल करने से नींद, फोकस और प्रोडक्टिविटी पर काफी अफेक्ट पड़ता है. लेकिन डूम्स्क्रॉलिंग के इस लूप में फंसे जेन जी इससे बाहर निकले कैसे?

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रील्स के जाल में फंसता जेन जी लूप से कैसे निकले बाहर?
रील्स के जाल में फंसता जेन जी लूप से कैसे निकले बाहर?

आज से अगर 5 से 6 साल पहले की बात करें तो जब एक आदमी ऑफिस से काम करके आता था तो घर पर आने के बाद अपने दिन को बेहतर करने के लिए अपने पसंद की चीजें करता थी. अपनी किसी हॉबी जैसे डांसिंग, सिंगिंग या कुकिंग करता थी. लेकिन पिछले कुछ वक्त से और जेन जी कल्चर ने ये ट्रेंड भी बदल गया है. अब घर से ऑफिस आने के बाद अपनी हॉबी और पैशन को फॉलो करने वाले लोग कम और डूम्स्क्रॉलिंग करने वाले लोग ज्यादा हो गए है. 

डूम्स्क्रॉलिंग क्या है?

डूम्स्क्रॉलिंग यानि नेगेटिव कॉन्टेंट की एंडलेस स्क्रॉलिंग. Doomscrolling का मतलब है लगातार सोशल मीडिया या न्यूज फीड पर ऐसी नेगेटिव, परेशान करने वाली या टेंशन बढ़ाने वाली खबरें/कंटेंट स्क्रॉल करते रहना, जबकि आपको पता होता है कि इससे आपका मूड खराब हो रहा है.

हम जाने अनजाने इतनी नेगेटिव खबर कन्ज्यूम करने लगते कि बाद में उसका असर हमारे डेली लाइफ में पड़ने लगता है. और इसका सबसे बड़ा रीजन लगातार रील्स स्क्रॉल करना है. इंस्टाग्राम हमारे फीड पर जो कुछ दे रहा है हम उसे देखकर कन्ज्यूम करते जा रहे है. 

कब स्क्रॉल करते करते हम पूरी रात निकाल देते है हमें पता भी नहीं चलता पता तब चलता है जब 100% डाटा यूसेज का मैसेज आता है और उसके बाद भी हमें नींद नहीं आती पर डाटा खत्म होने का रिगरेट होता है. रील्स स्क्रॉल करना तब तक ठीक है जब तक हम टाइम पास कर ने के लिए कर रहे है. लेकिन जैसे ही हम जरूरी कामों के बीच रील्स स्क्रॉल करने लगते है वहीं से हमारा काम बिगड़ने लगता है.

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जरूरत से ज्यादा स्क्रॉलिंग हमारे प्रोडक्टिविटी को अफेक्ट करने लगता है. ना हम किसी कम में अच्छे से मन लगा पाते है ना ही अपने किसी पैशन या हॉबी को फॉलो करने के लिए टाइम निकाल पाते है.  लेकिन सवाल ये है कि डूम्सक्रॉलिंग की जिस लूप में हम फंसे है वहां से निकला कैसे जाएं.

डूम्स्क्रॉलिंग इतना प्रॉबलेमैटिक क्यों?

1. नींद पर असर- रील्स स्क्रॉल करना तब तक जायज था जब तक हम बस उसे सिर्फ काम के बीच थोड़ा से ब्रेक लेने के लिए कन्ज्यूम कर रहे थे लेकिन अब लोगों को रील्स देखने की इतनी आदत हो गई है वो अपनी नींद को देखकर इंस्टाग्राम, फेसबुक स्क्रॉल करते है. जिसकी वजह से हमारी नींद पर बहुत असर पड़ता है. लगातार स्क्रीन देखने से मेलाटोनिन (नींद का हार्मोन) कम होता है और तनाव बढ़ाने वाला कोर्टिसोल हार्मोन बढ़ता है.

2. समय की बर्बादी- "सिर्फ एक और रील" का चक्कर अनजाने में आपके घंटों बर्बाद कर देता है. हम रील देखते जाते है और टाइम वेस्ट करते जाते है. 

3. मेंटल एक्जॉशन- लगातार रील स्क्रॉल करने से  हम चीजों पर ज्यादा देर तक फोकस नहीं कर पाते क्योंकि हमारा टाइम स्पैन घट कर कुछ सेंकेंड्स का रह गया है. इसके साथ हमारा चिड़चिड़ापन भी बढ़ता जाता है. 

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इस आदत को तोड़ने के इफैक्टिव लाइफ हैक

1. Bed से Phone को दूर रखें

फोन को तकिए के पास रखने के बजाय Bed से दूर charge पर लगाना इज द फर्सट स्टेप. इससे हर कुछ मिनट में फोन उठाकर रील्स स्क्रॉल करने की आदत टूटती है. Alarm के लिए भी फोन पास रखने की जरूरत नहीं-अलग अलार्म क्लॉक या दूसरे device का यूज करना बेहतर रहेगा.

2. “बस 10 मिनट” वाला Rule

Reels पूरी तरह बंद करना बहुत मुश्किल लगता है. इससे अच्छा है कि हम अपनी रील्स स्क्रॉल करने की टाइम लिमिटेशन सेट करें. एग्जाम्पल के लिए 10 मिनट का टाइमर लगाकर फोन चलाएं और फिर टाइम खत्म होते ही रील स्क्रॉल करने बंद कर दें. 
 

3. फ्री टाइम में बुक रीडिंग या हॉबी कल्चर अपनाना

हमें जैसे ही फ्री टाइम मिलता है हम तुरंत फोन हाथ में लेते है और रील स्क्रॉल करने लगते है. और ये हमारे लिए आसान भी होता है लेकिन लॉन्ग टर्म में ये हमारे लिए बहुत प्रॉबलमैटिक है. इससे बेतर हम फ्री टाइम में अपनी हॉबीज को प्रायरटाइज कर के उसपर काम करें.

डूम्स्क्रॉलिंग से बाहर निकलने के लिए फोन को पूरी तरह छोड़ना जरूरी नहीं है, बस उसकी जगह अपनी जिंदगी में दूसरी चीजों को भी थोड़ी जगह देनी होगी. 

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