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SIR के बीच चुनाव आयुक्तों में मतभेद? रिपोर्ट्स पर अब EC ने दिया जवाब

चुनाव आयोग के सूत्रों ने कहा है कि एसआईआर पर चर्चा के दौरान सवाल, टिप्पणियां और स्पष्टीकरण जरूर आए, लेकिन किसी चुनाव आयुक्त ने अंतिम फैसले के खिलाफ औपचारिक असहमति दर्ज नहीं की. आयोग ने यह भी कहा कि संबंधित आदेशों पर तीनों सदस्यों के हस्ताक्षर हैं, और उसका तीन सदस्यीय ढांचा मतभेद की स्थिति में बहुमत के सिद्धांत के तहत काम करता है.

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सीईसी ज्ञानेश कुमार के साथ ईसी डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी. (Photo- @ECISVEEP)
सीईसी ज्ञानेश कुमार के साथ ईसी डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी. (Photo- @ECISVEEP)

मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग के अंदर कथित मतभेद की रिपोर्ट सामने आने के बाद अब आयोग के सूत्रों ने सफाई दी है. ECI सूत्रों के मुताबिक, चुनाव आयुक्त किसी मुद्दे पर विचार के दौरान सवाल उठा सकते हैं, स्पष्टीकरण मांग सकते हैं या अपनी टिप्पणी दे सकते हैं. लेकिन ऐसी टिप्पणी को औपचारिक असहमति यानी डिसेंट नहीं माना जा सकता.

सूत्रों ने कहा कि SIR से जुड़े मुद्दों पर दोनों चुनाव आयुक्तों ने टिप्पणियां की थीं. इन पर फैसले से पहले विचार भी किया गया. लेकिन किसी भी चुनाव आयुक्त ने अंतिम फैसले के खिलाफ औपचारिक डिसेंट दर्ज नहीं कराया. आयोग के मुताबिक, जिन आदेशों को लेकर सवाल उठ रहे हैं, उन पर तीनों सदस्यों के हस्ताक्षर हैं.

यह भी पढ़ें: वोटर आईडी में गलती सुधारना अब हुआ बेहद आसान! चुनाव आयोग ने लॉन्च किया ECINet, 40 से ज्यादा ऐप्स की सुविधाएं अब एक ही जगह

क्या है ऑब्जर्वेशन और डिसेंट में फर्क?

चुनाव आयोग के मुताबिक, किसी मामले पर चर्चा के दौरान आयुक्त का सवाल उठाना या अपनी राय रखना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है. तीन सदस्यीय आयोग में सभी चुनाव आयुक्तों की बराबर भूमिका होती है. अगर किसी मुद्दे पर मतभेद हो तो बहुमत की राय के आधार पर फैसला होता है.

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हालांकि, इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में SIR से जुड़े फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्ति जताई. रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों ने कुछ कदमों को बिना उनकी जानकारी के उठाए जाने पर सवाल भी उठाए थे.

पहले भी चुनाव आयोग में दर्ज हो चुका है डिसेंट

चुनाव आयोग के इतिहास में ऐसा पहली बार नहीं है जब किसी आयुक्त ने बहुमत की राय से अलग रुख अपनाया हो. 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों समेत आचार संहिता से जुड़ी कुछ शिकायतों पर अपने सहयोगियों से अलग राय रखी थी.

2009 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने सोनिया गांधी की कथित अयोग्यता से जुड़े मामले में चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी और नवीन चावला से अलग राय रखी थी. इन मामलों में आयोग के भीतर अलग राय दर्ज करने की व्यवस्था का इस्तेमाल हुआ था.

पहले सिर्फ एक ही चुनाव आयुक्त होता था

आज तीन सदस्यीय चुनाव आयोग है, लेकिन शुरुआत में ऐसा नहीं था. 1950 में चुनाव आयोग के गठन के समय यह सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त वाला एक सदस्यीय निकाय था. 1950 से 1989 तक आयोग इसी व्यवस्था के तहत काम करता रहा.

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1989 में पहली बार दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्त नियुक्त किए गए, लेकिन उनकी नियुक्ति थोड़े समय के लिए रही. 1990 में आयोग फिर एक सदस्यीय हो गया. इसके बाद 1993 में दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के साथ तीन सदस्यीय व्यवस्था स्थायी हो गई.

इसलिए मौजूदा विवाद में अहम सवाल यही है कि चुनाव आयुक्तों की आंतरिक टिप्पणियों को किस तरह समझा जाए. ECI सूत्र इन्हें सामान्य डेलिबरेशन का हिस्सा बता रहे हैं, जबकि प्रकाशित रिपोर्ट में इन्हें रिकॉर्ड पर दर्ज आपत्तियों के रूप में पेश किया गया है.

आयोग के सूत्रों ने सिस्टम में किसी तरह के केंद्रीय हस्तक्षेप के आरोपों से इनकार किया है. उनका कहना है कि पूरे देश के लिए एक ही सिस्टम है और सभी ईआरओ उसी सिस्टम में डेटा फीड करते हैं. अब तक किसी ने इसको लेकर शिकायत नहीं की है. आयोग के सूत्रों का यह भी कहना है कि अधिकारी भी अलग-अलग विचारधाराओं से प्रभावित हो सकते हैं.

आयोग के सूत्रों के मुताबिक, मतभेद लोकतंत्र का आधार हैं और यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. उनका कहना है कि पिछले 14 महीनों में ऐसे सैकड़ों मौके आए, जब शुरुआत में मतभेद होने के बावजूद आखिर में सर्वसम्मति से राय बनी. इस दौरान सुधार के लिए सैकड़ों कदम भी उठाए गए.

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चुनाव आयुक्तों पर दावों को लेकर विपक्ष की प्रतिक्रिया

चुनाव आयुक्तों को लेकर सामने आई रिपोर्ट पर विपक्षी नेताओं ने भी सवाल उठाए हैं. टीएमसी सांसद डेरेक ओ'ब्रायन ने कहा कि अगर दो चुनाव आयुक्तों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर कई बार आपत्ति जताई है तो राज्यसभा में पहले से लंबित प्रस्ताव को अब सामने लाना चाहिए. उन्होंने ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग भी की.

यह भी पढ़ें: पश्चिम बंगाल SIR: SC में चुनाव आयोग का जवाब, 37 लाख से अधिक अपीलों के निपटारे के लिए मांगे 42 ट्रिब्यूनल

वहीं, सपा प्रमुख अखिलेश यादव और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल समेत विपक्ष के कई नेताओं ने चुनाव आयोग के कामकाज और एसआईआर को लेकर सवाल उठाए हैं. सिब्बल ने आरोप लगाया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने फॉर्म-6 में बदलाव और वोटर लिस्ट से जुड़े फैसलों पर आपत्ति जताई थी.

उन्होंने एसआईआर को रोकने और चुनाव आयोग के कामकाज की जांच की मांग की. विपक्ष के अन्य नेताओं, जिनमें कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी और जयराम रमेश, आप नेता सौरभ भारद्वाज और शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत शामिल हैं, ने भी रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है.

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पूर्व चुनाव आयुक्त दावों पर क्या बोले?

पूर्व चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने कहा, "मतभेद कहीं भी हो सकते हैं, लेकिन इलेक्शन कमिशन की मीटिंग के दौरान इन मतभेदों को एक-दूसरे को समझकर और समझाकर दूर किया जाता है. इसी तरह सर्वसम्मति से फैसले लिए जाते रहे हैं. लेकिन यह पहली बार हुआ है कि पिछले दस महीनों में 14 बार दो इलेक्शन कमिशनरों ने विरोध किया, फिर भी फैसले होते गए. कानूनन देखा जाए तो किसी भी एक इलेक्शन कमिशनर के पास अपने स्तर पर कोई पावर नहीं है. इलेक्शन कमिशन में तीनों लोग बैठते हैं, मीटिंग करते हैं और मिलकर फैसले लेते हैं. यही व्यवस्था शक्तिशाली है. किसी एक व्यक्ति को एडमिनिस्ट्रेटिव पावर के नाम पर कोई अतिरिक्त अधिकार नहीं दिया गया है."

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