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पहले 15 करोड़ वाला वार, और अब नंबर गेम पर सवाल..क्या उद्धव के चाणक्य ने पलट दिया गेम

टीएमसी के बाद शिवेसना (यूबीटी) में टूट का खतरा मंडराने लगा है तो उद्धव ठाकरे के नेता संजय राउत ने दिल्ली में डेरा जमा दिया है. पार्टी को डैमेज कन्ट्रोल करने में जुट गए हैं. पहले 15 करोड़ रुपये का आरोप लगाया और अब नंबर गेम में उलझा दिया है. ऐसे में क्या उद्धव ने पलट दिया गेम?

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उद्धव ठाकरे के 'चाणाक्य' संजय राउत कर पाएंगे डैमेज कन्ट्रोल (Photo-PTI)
उद्धव ठाकरे के 'चाणाक्य' संजय राउत कर पाएंगे डैमेज कन्ट्रोल (Photo-PTI)

महाराष्ट्र की राजनीति में जब भी कोई बड़ा सियासी तूफान आता है, तो मातोश्री (उद्धव ठाकरे का निवास स्थान) के सबसे भरोसेमंद सिपहसालार और 'चाणक्य' कहे जाने वाले संजय राउत और अनिल देसाई फ्रंटफुट पर नजर आते हैं. शिवसेना (यूबीटी) में फिर से टूट का खतरा मंडरा रहा है और 'ऑपरेशन टाइगर' को अमलीजामा पहनाने का काम शुरू हो गया है. 

शिवसेना (यूबीटी) के कुल 9 लोकसभा सांसदों में से 6 सांसद पार्टी छोड़कर एकनाथ शिंदे का दामन थाम सकते हैं, जिसके लिए महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली तक सियासी बिसात बिछ चुकी है. ऐसे में पार्टी के अस्तित्व को बचाने और डैमेज कन्ट्रोल करने के लिए संजय राउत और अनिल देसाई मैदान में उतर गए हैं और उन्होंने पूरे गेम को पलट दिया है. 

उद्धव ठाकरे को एक बाद एक बड़ा जख्म एकनाथ शिंदे दिए जा रहे हैं. पहले सत्ता और पार्टी दोनों ही छीन लिया और उसके बाद उद्धव ने किसी तरह से मजबूत किया तो अब फिर से लोकसभा सांसदों के टूट का संकट गहरा गया है. ऐसे में उद्धव के चाणक्य इस बार फिर से पार्टी को टूटने से बचाने की जद्दोजहद में जुट गए हैं. 

संकट गहराया, दिल्ली में बिछी बिसात
मुंबई से लेकर दिल्ली तक की सियासी हलचल इस बात का संकेत है कि उद्धव ठाकरे गुट के सामने एक बार फिर अपनी लोकसभा सांसद को पाले में बनाए रखने की बड़ी चुनौती है.उद्धव ठाकरे के 9 से 6 लोकसभा सांसदों को टूटने का खतरा मंडराने लगा है. माना जा रहा है कि उद्धव गुट के ये सांसद अब एकनाथ शिंद की पार्टी का दामन थाम सकते हैं. 

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 इतिहास गवाह है कि जब-जब शिवसेना पर संकट आया है, संजय राउत अपनी तीखी बयानबाजी और आक्रामक रणनीति से विरोधियों पर हावी होने की कोशिश करते हैं, जबकि अनिल देसाई पर्दे के पीछे रहकर कानूनी और सांगठनिक दांव-पेच बुनते हैं. ऐसे में जैसे ही बगावत की आहट सुनाई दी, दोनों ही नेता तुरंत मुंबई से दिल्ली के लिए रवाना हो गए.

दिल्ली पहुंचने का मकसद साफ है कि शिवसेना (यूबीटी) को टूट से बचाने और डैमेज कन्ट्रोल के लिए जुट गए हैं. कानूनी विशेषज्ञों से विचार-विमर्श और संभावित सहयोगियों से मुलाकात कर विरोधियों के चक्रव्यूह को तोड़ना. इसके लिए संजय राउत और अनिल देसाई सुबह 10 बजे प्रेस कॉफ्रेंस भी करेंगे. 

संजय राउत ने चला अपना पहला दांव
दिल्ली पहुंचने से पहले ही उद्धव ठाकरे के रणनीतिकार संजय राउत ने अपना पहला दांव चल दिया है. राउत ने आरोप लगाया है कि हमारे सांसदों को 15-15 करोड़ रुपये का ऑफर दिया गया है. राज्यसभा सांसद संजय राउत ने अपने सोशल मीडिया पर लिखा कि अपना सपना मनी मनी, यह चौंकाने वाला और घिनौना काम है कि महाराष्ट्र के सांसदों को पाला बदलने के लिए 15-15 करोड़ रुपये का ऑफर दिए जा रहे हैं. 

संजय राउत ने बागी रुख अपनाने वाले सांसदों को साधने में जुट गए हैं ताकि लोकसभा के स्तर पर किसी भी संभावित दलबदल को अमान्य ठहराया जा सके. इसी का नतीजा  कि UBT सांसद राजाभाऊ वाजे ने 'आज तक' से बात करते हुए कहा कि वे कहीं नहीं जा रहे हैं. वे उद्धव ठाकरे के साथ हैं. वे संसदीय समिति की बैठक के लिए दिल्ली आ रहे हैं, जो दोपहर 3 बजे होनी है. 

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संजय राउत ने कहा कि ऑपरेशन टाइगर की बात करने वालों के पास ज़रूरी संख्या नहीं है. हमारे सांसदों को तोड़ने की उनकी कोशिशें नाकाम रहेंगी. शिवसेना (यूबीटी) को तोड़ने के लिए उन्हें दो-तिहाई बहुमत चाहिए, जो उनके पास नहीं है. हमने स्पीकर को भी पत्र लिखकर बीजेपी की सियासी चाल की जानकारी दे दी है. हमें अपने सांसदों पर भरोसा है, लेकिन वे लोगों को डरा-धमकाकर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं

संजय राउत ने कहा कि हम सुबह 10 बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं. वे पीएम मोदी या अमित शाह के चेहरे पर नहीं जीते थे बल्कि उद्धव ठाकरे ने ही उनके लिए कड़ी मेहनत की थी और प्रचार किया था.

नंबर गेम में उलझाकर पलटाया गेम

शिवसेना (य़ूबीटी) के 9 लोकसभा सांसद है. दलबदल कानून से बचने के लिए उद्धव के कम से कम 6 लोकसभा सांसदों को एक साथ आना होगा. माताश्री पर हुई बैठक में पांच सांसद गैर-हाजिर थे जबकि चार सांसद उद्धव के घर पहुंचे थे. माना जा रहा था कि उद्धव के घर पहुंचने वाले चार में से दो सांसद टूट सकते हैं, लेकिन जिन दो सांसदों पर संदेह था, उन्होंने भी साफ मना कर दिया है कि उनका शिंदे से कोई लेना-देना नहीं है. 

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यूबीटी के 9 में से 4 सांसद भी उद्धव के साथ मजबूती से खड़े रहते हैं तो फिर 'ऑपरेशन टाइगर' को अमलीजामा पहनाने का काम सफल नहीं हो पाएगा. संजय राउत इसीलिए दावे के साथ कह रहे हैं कि उनके पास नंबर गेम नहीं है कि हमारे सांसदों को तोड़ सकें.

सहानुभूति कार्ड और मीडिया नैरेटिव
संजय राउत ने दिल्ली पहुंचते ही मीडिया के सामने आकर आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया. उन्होंने विरोधियों पर 'पार्टी को धोखा देने' और 'सत्ता के लालच' का आरोप लगाकर जनता के बीच सहानुभूति बटोरने का खेल शुरू कर दिया है. राउत ने दावा किया है कि बागी गुट के बाद दलबदल करने के लिए सांसदों की पर्याप्त संख्या नहीं है, एक तरह से उन्होंने साफ कह दिया है कि बागी गुट के पास 6 सांसदों का समर्थन नहीं है. 

वहीं, दूसरी तरफ अनिल देसाई भी अपने मिशन पर लग गए हैं. सांसदों के टूट का खतरा देखते हुए शिवसेना (यूबीटी)ने लोकसभा अध्यक्ष को एक आधिकारिक पत्र सौंपकर मांग की है कि संसद में केवल शिवसेना (यूबीटी) को ही अधिकृत राजनीतिक दल के रूप में मान्यता दी जाए.

अरविंद सावंत द्वारा लोकसभा अध्यक्ष को भेजे गए पत्र में कहा गया है कि यदि किसी अन्य गुट द्वारा मान्यता या विशेष दर्जे की मांग की जाती है, तो उस पर कोई निर्णय लेने से पहले शिवसेना (यूबीटी) को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाए. पार्टी ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के तहत उपलब्ध कानूनी प्रावधानों का उपयोग करने का अधिकार सुरक्षित रखती है. 

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क्या कामयाब होंगे 'मातोश्री' के चाणक्य?
सवाल अब भी वही है कि क्या यह पहला दांव बगावत की इस लहर को रोकने के लिए काफी होगा? उद्धव ठाकरे के लिए यह साख की लड़ाई है. संजय राउत की आक्रामकता जहां कार्यकर्ताओं में जोश भरती है, वहीं कभी-कभी इससे नाराज गुट और ज्यादा आक्रामक हो जाता है. दूसरी ओर, अनिल देसाई की शांत और सधी हुई रणनीति अदालत के भीतर तो कारगर साबित हो सकती है, लेकिन जमीन पर विधायकों के मन को बदलना सिर्फ कानूनी दांव-पेच से मुमकिन नहीं होता.

महाराष्ट्र की राजनीति इस समय उस मोड़ पर है जहां हर पल समीकरण बदल रहे हैं. दिल्ली में चला गया यह पहला दांव अगर विरोधियों को बैकफुट पर धकेलने में कामयाब रहा,तो उद्धव ठाकरे को एक बड़ी संजीवनी मिल जाएगी, लेकिन अगर बगावत की जड़ें बहुत गहरी हैं, तो इन 'चाणक्यों' को अपनी रणनीति में कुछ और बड़े और अप्रत्याशित बदलाव करने होंगे. ऐसे में देखना है कि शह-मात के खेल में कौन किस पर भारी पड़ता है.


 

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