मुंबई की जिस जमीन पर खड़े होकर हम जो देख रहे हैं, वो सिर्फ एक नदी की बदहाली नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की नाकामी का बहता हुआ सच है. मॉनसून आने से पहले ही शहर पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं, क्योंकि अब तक मीठी नदी की सफाई के लिए कोई भी ठेकेदार आगे नहीं आया है.
बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) ने टेंडर जारी किए, डेडलाइन बढ़ाकर 24 तारीख तक कर दी, लेकिन हालात जस के तस हैं. अगर तब तक भी कोई बिड (Bid) नहीं आती, तो BMC खुद सफाई करने की बात कर रही है. लेकिन जमीन पर सवाल यही है कि क्या BMC अकेले यह काम संभाल पाएगी?
पिछले कई सालों से यह काम ठेकेदारों के जरिए होता आया है, लेकिन हाल ही में सामने आए घोटाले ने पूरे सिस्टम की साख पर सवाल खड़े कर दिए हैं. हालांकि इस मामले में ठेकेदारों और अधिकारियों दोनों पर केस दर्ज हो चुके हैं. शायद यही वजह है कि अब कोई भी ठेकेदार इस काम में हाथ डालने को तैयार नहीं है.
यहां खड़े होकर मीठी नदी को देखना किसी त्रासदी से कम नहीं है. ये सिर्फ गंदगी से भरी नदी नहीं है, बल्कि सिस्टम की नाकामी, भ्रष्टाचार और फाइलों में दबी अधूरी योजनाओं का जीता-जागता और बहता हुआ सबूत है.
आपको बता दें कि मीठी नदी का करीब 18 किलोमीटर का ये लंबा रास्ता कलीना से शुरू होकर माहिम की खाड़ी तक जाता है. जब मैं कुर्ला के पास पहुंचा, तो जो नजारा दिखा वो वाकई डराने वाला था. नदी के किनारों पर गंदगी का ऐसा ढेर लगा है जैसे ये कोई डंपिंग ग्राउंड हो. लोग बेधड़क घर का कूड़ा और फालतू सामान यहां फेंक रहे हैं. कहने को तो हर साल इसकी सफाई पर करोड़ों खर्च होते हैं, लेकिन जमीन पर आज भी गंदगी और जलकुंभी का अंबार लगा हुआ है. इस बदहाली को करीब से समझने के लिए हमने 3-4 किलोमीटर का रास्ता पैदल ही तय किया. यकीन मानिए, हर मोड़ पर वही मंजर दिखा जो आप इन तस्वीरों में देख रहे हैं.
मुंबई, जिसे दुनिया सपनों का शहर कहती है. वही मुंबई हर साल मॉनसून में डर का शहर बन जाती है. अभी तो बादलों ने ठीक से दस्तक भी नहीं दी है, लेकिन मुंबईकरों के दिलों में खौफ पहले ही बैठ चुका है. आखिर हो भी क्यों न? यहां बारिश का पानी सिर्फ सड़कों को नहीं डुबोता, बल्कि वह लोगों के घरों में घुसता है, उनकी मेहनत की कमाई और रोजगार बहा ले जाता है और कई बार तो मासूमों की जिंदगियां भी निगल जाता है.
20 साल पहले, मीठी नदी को चौड़ा करने के नाम पर जिन लोगों के घर तोड़े गए थे, आज भी वे अपने नए घर का इंतजार कर रहे हैं. सरकारी वादे फाइलों में दबे पड़े हैं और लोग आज भी उसी दर्द के साथ जी रहे हैं.
अगर ठेकेदार ही भरोसा नहीं कर पा रहे हैं, तो आम आदमी किस भरोसे जीए?
पिछले घोटालों की गूंज आज भी बीएमसी के गलियारों में सुनाई देती है. ठेकेदारों पर केस हुए, बड़े अधिकारियों पर उंगलियां उठीं, लेकिन अब छाई यह रहस्यमयी चुप्पी एक बड़ा सवाल खड़ा करती है. क्या ठेकेदार कार्रवाई के डर से पीछे हट गए हैं, या फिर उन्हें इस सड़ चुके सिस्टम पर अब भरोसा ही नहीं रहा? सवाल बड़ा है. अगर खुद ठेकेदार ही हाथ पीछे खींच रहे हैं, तो फिर आम मुंबईकर किस भरोसे जिए?
इस पूरे मामले में सियासत भी अपने चरम पर है. एक तरफ भाजपा पार्षद नितेश सिंह का बड़ा दावा है कि अब भ्रष्टाचार का खेल खत्म हो चुका है. उनका कहना है कि पहले कमीशन की सेटिंग की वजह से टेंडर भरे जाते थे, लेकिन अब ठेकेदारों को समझ आ गया है कि धांधली का कोई मौका नहीं मिलेगा, शायद इसीलिए कोई आगे नहीं आ रहा. वहीं दूसरी तरफ, बीएमसी में कांग्रेस के गुट नेता अशरफ आजमी सीधा हमला बोल रहे हैं. उनका आरोप है कि बीएमसी को आम जनता की तकलीफों से कोई लेना-देना नहीं है, उन्हें तो बस अपनी मलाई खाने से मतलब है.
लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि मुंबई का आम इंसान कहां है?
सिक्के का दूसरा पहलू ये भी है कि मीठी नदी की इस बर्बादी के लिए कहीं न कहीं हम और आप भी जिम्मेदार हैं. खासतौर पर नदी के आसपास रहने वाले लोग. जब हम अपनी ग्राउंड रिपोर्टिंग के लिए वहां मौजूद थे, तो हमने अपनी आंखों से देखा कि कुछ लोग धड़ल्ले से नदी में कचरा फेंक रहे थे और कुछ खुले में शौच कर रहे थे. सवाल यही है कि जब यहां रहने वाले लोग ही इस नदी की साफ-सफाई और अपनी सेहत की फिक्र नहीं करेंगे, तो फिर किसी बाहरी या प्रशासन से क्या उम्मीद रखी जाए?
उस आम इंसान का दर्द समझिए, जो हर साल अपनी आंखों के सामने घर में घुसते गंदे पानी को देखता है. वो हर मॉनसून से पहले एक नई उम्मीद पाल लेता है कि 'शायद इस साल कुछ बदलेगा', लेकिन हर बार उसकी ये उम्मीद पानी में बह जाती है. अब जब BMC खुद सफाई का बीड़ा उठाने की बात कर रही है, तो बड़ा सवाल यही खड़ा होता है कि बिना किसी ठोस तैयारी और तजुर्बे के, क्या प्रशासन इतना बड़ा प्रोजेक्ट संभाल पाएगा?
अगर बीएमसी से यह काम नहीं संभला, तो क्या इस बार फिर मुंबई डूबने को मजबूर होगी? क्या मायानगरी की सुरक्षा अब सिर्फ एक एक्सपेरिमेंट बनकर रह गई है? काफी देर तक जब हम वहां खड़े रहे, तो लगा मानो मीठी नदी अपनी बदहाली पर हमसे ही सवाल कर रही हो कि'कभी कांच की तरह साफ बहने वाली मैं आज एक गंदा नाला बन गई हूं, क्या कभी लौट पाएगा मेरा वो पुराना दौर? फिलहाल इस सवाल का जवाब न हमारे पास था और न ही प्रशासन के पास.