हिमाचल के सेब बागवानों को इस बार करीब ₹2,000 करोड़ का बड़ा झटका लगा है. प्रदेश में सेब उत्पादन पिछले साल के मुकाबले बुरी तरह गिर गया है.वर्ष 2025 में जहां सेब कारोबार का उत्पादन मूल्य करीब ₹5,200 करोड़ तक पहुंचा था, वहीं इस बार यह घटकर करीब ₹2,200 करोड़ रहने का अनुमान है. यानी बागवानों की कमाई और प्रदेश की सेब अर्थव्यवस्था पर सीधा बड़ा असर पड़ा है.
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस बार सेब उत्पादन आधे से भी कम रह गया है. बागवानी विभाग के मुताबिक सेब सीजन समाप्त हो चुका है और अब तक प्रदेश की मंडियों में सिर्फ 1.37 करोड़ पेटियां ही पहुंची हैं. मार्केट इंटरवेंशन स्कीम यानी MIS के तहत खरीदे गए सेब और CA स्टोर में रखे सेब को जोड़ने के बाद भी कुल उत्पादन करीब 1.60 से 1.70 करोड़ पेटियों के बीच रहने का अनुमान है.
15 साल में दूसरी बार सबसे कम उत्पादन
बागवानी विभाग के निदेशक सतीश शर्मा के मुताबिक इस साल का सेब उत्पादन पिछले करीब 15 वर्षों में दूसरी बार सबसे कम रहने वाला है.इससे पहले वर्ष 2011-12 में महज 1.37 करोड़ पेटियों का उत्पादन दर्ज किया गया था. वर्ष 2018-19 में भी उत्पादन घटकर 1.84 करोड़ पेटियां रह गया था. इस बार का अनुमान इन वर्षों के बाद सबसे निचले स्तर पर है. यानी हिमाचल की सेब अर्थव्यवस्था के लिए यह सीजन बेहद कमजोर साबित हुआ है.
पुराने बगीचे बने बड़ी चुनौती
सेब उत्पादन में गिरावट की एक बड़ी वजह प्रदेश के पुराने पारंपरिक बगीचे भी हैं. इन बगीचों में बड़ी संख्या में पौधे काफी पुराने हो चुके हैं और उनकी फल देने की क्षमता लगातार कम हो रही है.हिमाचल के बागवान अब पारंपरिक बागवानी से निकलकर हाई डेंसिटी प्लांटेशन (HDP) की तरफ बढ़ रहे हैं, लेकिन नए बगीचों का पूरा असर उत्पादन के आंकड़ों में आने में अभी समय लगेगा.
4-5 साल में दिखेगा HDP का असली असर
बागवानी विभाग के निदेशक सतीश शर्मा के अनुसार हाई डेंसिटी प्लांटेशन का वास्तविक फायदा अगले चार से पांच वर्षों में सामने आने की उम्मीद है. विभाग गुणवत्तापूर्ण पौधे तैयार कर बागवानों को उपलब्ध करवाने पर जोर दे रहा है. इस सीजन में करीब 8 से 10 लाख अच्छी गुणवत्ता वाले पौधे वितरित करने की योजना है.उम्मीद है कि इससे आने वाले वर्षों में न केवल उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि सेब की गुणवत्ता में भी सुधार होगा.
न्यूजीलैंड से हिमाचल की बड़ी तुलना
हिमाचल में सेब उत्पादन की एक और बड़ी चुनौती कम उत्पादकता है. प्रदेश में एक हेक्टेयर जमीन से औसतन करीब 5 से 6 मीट्रिक टन सेब पैदा होता है. इसके मुकाबले न्यूजीलैंड जैसे विकसित सेब उत्पादक देशों में यही उत्पादकता 55 मीट्रिक टन से अधिक है. आधुनिक तकनीक से विकसित कुछ बगीचों में यह आंकड़ा 80 मीट्रिक टन तक पहुंच रहा है. यही वजह है कि सरकार और बागवानी विभाग हाई डेंसिटी प्लांटेशन पर जोर दे रहे हैं. लक्ष्य साफ है कि सीमित जमीन से ज्यादा उत्पादन और बेहतर गुणवत्ता. हालांकि, HDP की सफलता सिर्फ पौधे बदलने से नहीं आएगी। इसके लिए सिंचाई, आधुनिक तकनीक, बेहतर प्रबंधन, गुणवत्तापूर्ण पौधे और वैज्ञानिक तरीके से बागवानी जरूरी होगी.
इस सीजन के आंकड़ों ने हिमाचल की पारंपरिक सेब बागवानी के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है. उत्पादन में भारी गिरावट और करीब ₹2,000 करोड़ के अनुमानित आर्थिक झटके ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया है कि पुराने बगीचों पर निर्भरता कब तक चलेगी? अब नजर इस बात पर है कि हाई डेंसिटी प्लांटेशन आने वाले 4-5 वर्षों में हिमाचल के सेब उत्पादन की तस्वीर कितनी बदल पाता है.