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गुजरात: मांजलपुर उपचुनाव में BJP और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर, AAP इस बार भी नहीं लड़ेगी

BJP के मजबूत गढ़ माने जाने वाले मांजलपुर में इस बार मुकाबला बेहद दिलचस्प और त्रिकोणीय के बजाय आमने-सामने का हो गया है, क्योंकि आम आदमी पार्टी (AAP) ने एक बार फिर चुनाव से दूरी बना ली है.

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बीजेपी के 'गढ़' मांजलपुर में दिलचस्प हुई जंग.(Photo:Screengrab)
बीजेपी के 'गढ़' मांजलपुर में दिलचस्प हुई जंग.(Photo:Screengrab)

गुजरात विधानसभा की मांजलपुर सीट के लिए 30 जुलाई को उपचुनाव होना है जिसके लिए आज नामांकन का आखिरी दिन था. भाजपा की और से सतीश पटेल और कांग्रेस की और से भीखाभाई रबारी ने नामांकन किया. भाजपा के उम्मीदवार के साथ भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष जगदीश विश्वकर्मा और स्थानीय नेता मौजूद रहे तो दूसरी और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अमित चावडा और स्थानीय नेता मौजूद रहे.  

भाजपा-कांग्रेस दोनों ने अपने कार्यकर्ताओं को उत्साहित करते हुए 'विजय विश्वास सम्मेलन' भी आयोजित किया जहां पर दोनों पक्षोंने अपनी अपनी जीत के दावे किए. सबसे अहम बात यह है कि इस उपचुनाव से आप ने फिर एक बार दूरी बनाई है. अप्रैल महीने में हुए उमरेठ विधानसभा के उपचुनाव से भी आप ने दूरी बनाई थी. प्रदेश में विपक्ष होने का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी फिर एक बार चुनावी मैदान से दूर रही है.

मांजलपुर विधानसभा सीट लंबे समय से बीजेपी का मजबूत गढ़ मानी जाती रही है. भाजपा के वरिष्ठ नेता योगेश पटेल के निधन से यह सीट खाली हुई थी जिस पर भाजपाने  पूर्व जिला अध्यक्ष सतीश पटेल को मैदान में उतारा है. वह वडोदरा नगर निगम के पार्षद और स्थायी समिति के अध्यक्ष रह चुके हैं. सतीश पटेल का सहकारी क्षेत्र से भी गहरा नाता रहा है.

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उन्होंने कई सहकारी संस्थाओं में नेतृत्व की भूमिका निभाई है. यह जुड़ाव उन्हें स्थानीय स्तर पर मतदाताओं से जुड़ने में मदद करेगा. भाजपा द्वारा उनके चयन के पीछे 'पाटीदार फैक्टर' को भी एक अहम वजह माना जा रहा है. 

मांजलपुर सीट को पाटीदार-बहुल सीट माना जाता है, और भाजपा ने एक पाटीदार नेता को टिकट देकर इस समुदाय को साधने की कोशिश की है. इस फैसले के जरिए भाजपा ने योगेश पटेल के निधन के बाद भी पाटीदार मतदाताओं का भरोसा बनाए रखने का संकेत दिया है.

दूसरी ओर, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी भी बीजेपी के इस गढ़ में सेंध लगाने की रणनीति बना रही हैं. कांग्रेस द्वारा एक अनुभवी नेता को मैदान में उतारने से अब यह मुकाबला काफी दिलचस्प हो गया है. 

कांग्रेस उम्मीदवार भीखाभाई रबारी वडोदरा की राजनीति में एक बेहद जाना-माना और प्रभावशाली नाम हैं. उनके राजनीतिक सफर पर नज़र डालें तो: वे 1975, 1980 और 1985 के विधानसभा चुनावों में भारी बहुमत से विधायक चुने गए थे.

1985 में बनी अमरसिंह चौधरी की कांग्रेस सरकार में उन्होंने राज्य स्तरीय मंत्री के तौर पर अहम जिम्मेदारी निभाई थी. उन्होंने वडोदरा शहर कांग्रेस समिति में कार्यकारी अध्यक्ष से लेकर गुजरात प्रदेश कांग्रेस में महासचिव तक सक्रिय भूमिका निभाई है. 

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पार्टी के मुश्किल दौर में भी उन्होंने वडोदरा में संगठन को जीवित रखने में बड़ा योगदान दिया है. भीखाभाई जमीनी स्तर की राजनीति के लिए जाने जाते हैं. आम जनता के मुद्दों, महंगाई या स्थानीय प्रशासन की विफलता के खिलाफ वे अक्सर सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करते रहे हैं. मालधारी समाज और अन्य पिछड़े वर्गों में उनकी सामाजिक पकड़ बहुत मजबूत है. सामाजिक उत्थान के कार्यों में भी वे हमेशा सबसे आगे रहे हैं. (रिपोर्ट:- तृषार पटेल)

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