
'51 वार, तेजाब से जलाया... फिर नाले में फेंक दिया. लेकिन वो लोग जेल में रहेंगे, जिंदा रहेंगे. मेरा भाई तो देश की सेवा करते हुए चला गया. वो कभी वापस नहीं आएगा.'
दिल्ली दंगे में मारे गए IB अधिकारी अंकित शर्मा के भाई अंकुर की आवाज में अदालत के फैसले के बाद भी सुकून नहीं था. कड़कड़डूमा कोर्ट ने ताहिर हुसैन समेत पांच दोषियों को उम्रकैद की सजा सुना दी, लेकिन अंकुर के लिए यह फैसला जीत का जश्न नहीं, बल्कि अधूरे न्याय का एहसास लाया.
अंकुर कहते हैं, 'मुझे इस फैसले से न खुशी है, न गम. बस लगता है कि मेरे भाई के साथ जो हुआ, उसके मुकाबले सजा नाकाफी है.'
आजतक से बातचीत में अंकुर बताते हैं कि परिवार करीब 20 साल पहले यूपी के मुजफ्फरनगर से दिल्ली आ गया था. तब अंकुर 8 साल और अंकित 7 के थे. पिता गृह मंत्रालय (MHA) में काम करते थे. इसलिए परिवार उत्तर-पूर्वी दिल्ली के खजूरी खास में बस गया.
उस वक्त को याद कर अंकुर कहते हैं, 'जब हम एक छोटे शहर से दिल्ली आए, तो हम बहुत उत्साहित थे. यहां की तंग गलियों में हमने कई दोस्त बनाए, जिनके साथ खूब खेले.'
फिर आगे चल कर अंकित ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के हंसराज कॉलेज और अंकुर ने श्याम लाल कॉलेज से पढ़ाई की. फिर 2016 में अंकित ने IB का एंट्रेंस एग्जाम पास किया और 2017 में सेंट्रल एजेंसी में शामिल हो गए.
अंकित ने असिस्टेंट सेंट्रल इंटेलिजेंस ऑफिसर (ACIO) के रूप ज्वाइन किया था. जल्द ही उन्हें प्रमोशन मिलने वाला था.
लेकिन फरवरी 2020 उनकी जिंदगी में ऐसा तूफान लेकर आया, जिसके बाद ये इलाका-पड़ोस सब उन्होंने छोड़ दिया.
25 फरवरी 2020 को याद करते हुए अंकित बताते हैं, 'सड़क पर आगजनी-पत्थरबाजी हो रही थी. मैं छत पर डरा-सहमा बैठा यही सब सोच रहा था. तभी मैंने अंकित के घर लौटने की आवाज सुनी. शाम के करीब 4:30 बजे थे. वह चाणक्यपुरी में IB हेडक्वार्टर से लौटा था. परिवार भी परेशान था. मेरी मां (सुदेश शर्मा) ने उससे पूछा कि बेटा तू ठीक है ना?
अंकित ने बस इतना कहा- दफ्तर से फोन है, उन्होंने बोला है कि बाहर जाकर देखो कि आस-पड़ोस में क्या हो रहा है.
किसी ने नहीं सोचा था कि घर से निकलते वक्त बोले गए ये शब्द आखिरी बातचीत बन जाएंगे.
रात बढ़ती गई, लेकिन अंकित का कोई पता नहीं चला. पहले परिवार को लगा कि शायद किसी दोस्त के पास चले गए होंगे या किसी काम में फंस गए होंगे. लेकिन एक-एक करके सभी परिचितों से पूछ लिया, किसी के पास कोई जवाब नहीं था.
मां सुदेश और पिता रविंदर पूरी रात बेटे की तलाश में भटकते रहे. पड़ोसियों से पूछा, आसपास के अस्पतालों के चक्कर लगाए, लेकिन हर जगह निराशा ही मिली. आखिरकार दयालपुर थाने में गुमशुदगी की शिकायत दर्ज कराई गई.
रात करीब डेढ़ बजे जब वे घर लौटे, तब भी उम्मीद पूरी तरह टूटी नहीं थी. पड़ोसियों के साथ मिलकर एक बार फिर गलियों में बेटे को तलाशने निकले. लेकिन फिर उन्हें जो बात पता चली, उसने पैरों तले जमीन खिसका दी.

लोगों का कहना था कि अंकित शर्मा को खींचकर ताहिर हुसैन के कैंप ऑफिस में ले जाया गया था. कुछ प्रत्यक्षदर्शियों ने यह भी दावा किया कि ताहिर और उसके साथ मौजूद लोगों ने अंकित समेत तीन लोगों की वहां हत्या कर दी. इतना ही नहीं, कुछ लोगों ने परिवार से कहा कि उन्होंने उन शवों को नाले में फेंकते हुए भी देखा था.
फिर परिवार दयालपुर पुलिस स्टेशन गया और नाले की तलाशी लेने का अनुरोध किया. बातचीत में अंकुर ने बताया कि 26 फरवरी की सुबह पुलिस की एक टीम पहुंची और अंकित का क्षत-विक्षत शव बरामद किया.

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उस पल को याद करते हुए अंकुर आज भी टूट जाते हैं. बात करते-करते उनकी आवाज भर्रा जाती है. छह साल से ज्यादा वक्त बीत चुका है, लेकिन भाई की आखिरी तस्वीर आज भी उनकी आंखों से ओझल नहीं हुई.
वो कहते हैं, 'पुलिस ने रस्सी से उसका हाथ पकड़कर शव को बाहर निकाला था. आज भी वो तस्वीर आंखों के सामने आ जाती है, तो खुद को संभालना मुश्किल हो जाता है.'
अंकुर कहते हैं, 'उसकी आंखें बाहर की ओर निकली हुई थीं. चेहरा बुरी तरह बिगड़ चुका था. गले पर चाकू के गहरे घाव थे और चेहरे पर तेजाब डाला गया था."

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक, अंकित शर्मा के शरीर पर 51 चोटों के निशान दर्ज किए गए थे. अंकुर कहते हैं कि हर बार उस रिपोर्ट को याद करते हैं, तो उन्हें सिर्फ एक सवाल परेशान करता है, आखिर किसी इंसान के साथ इतनी क्रूरता कैसे की जा सकती है.
अंकुर कहते हैं, 'देश की सेवा करते वक्त मेरे भाई का ऐसा हाल किया गया. इस मामले को 'रेयरेस्ट ऑफ द रेयर' मानते हुए दोषियों को फांसी होनी ही चाहिए. इसके लिए दिल्ली पुलिस और हमारे वकील आगे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे. कोर्ट को मिसाल सेट करनी चाहिए, जिससे आगे कोई ऐसा कुछ करने की सोच भी न सके.' अंकित बताते हैं कि केस में जो छह लोग बरी हुए हैं, उनके खिलाफ भी हाईकोर्ट में अपील की जाएगी.
मारकर घर से 200 मीटर दूर फेंका... इलाका खाने को दौड़ता था
अंकुर बताते हैं कि हत्याकांड के बाद पुलिस ने पूरे परिवार को सुरक्षा दी थी. लेकिन सुरक्षा मिलने से दर्द कम नहीं हुआ. भाई के बिना उस घर में रहना हर दिन एक नई सजा जैसा था.
घर का हर कोना अंकित की याद दिलाता था. सबसे मुश्किल उस रास्ते से गुजरना था, जहां से करीब 200 मीटर दूर नाले में अंकित का शव मिला था. अंकुर कहते हैं, 'जब भी उधर से निकलना पड़ता, ऐसा लगता था जैसे कलेजा मुंह को आ जाएगा. मां-पापा उस सदमे से कभी बाहर नहीं निकल पाए. इसलिए हमने वह घर छोड़ देना ही बेहतर समझा.'
अब परिवार दूसरी जगह रहता है. ऐसी जगह, जहां पड़ोसियों को भी नहीं पता कि उनके बीच रहने वाला यह परिवार वही है, जिसने दिल्ली दंगों में अपना बेटा खोया था.
लेकिन पता बदलने से यादें नहीं बदलतीं. अंकुर कहते हैं, 'मां और पापा आज भी अक्सर बीमार रहते हैं. उन्हें हर दिन अंकित याद आता है. हमने घर बदल लिया, शहर का एक हिस्सा छोड़ दिया, लेकिन आंखों के आंसू आज तक नहीं रुके.'
क्या मुआवजा मिला? इस सवाल पर अंकुर कहते हैं कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने उनको एक करोड़ रुपये मुआवजा दिया और भाई को शहीद का दर्जा.
वहीं केंद्र की तरफ से मुजफ्फरनगर में मौजूद उनके गांव में सड़क बनवाई गई. जिसका नाम अंकित के नाम पर कर दिया गया. वहीं परिवार ने अपने पैसे से वहां एक स्मृति द्वार भी बनवाया है.
'सम्मान अपनी जगह है, लेकिन परिवार जिस बेटे को खो देता है, उसकी भरपाई न कोई मुआवजा कर सकता है, न किसी सड़क का नाम.' अंकुर की बात यहीं आकर ठहर जाती है.