दुर्गा पूजा सपन्न होने के बाद मूर्ति विसर्जन एक बहुत बड़ा आयोजन होता है. लोग नाचते गाते दुर्गा मां की प्रतिमा को पवित्र जल में प्रवाहित करते हैं. आमतौर पर मूर्ति विसर्जन का कार्यक्रम दो से चार घंटे में संपन्न होता है. लेकिन बिहार के दरभंगा जिले अंतर्गत जाले गांव में जलेश्वरी मंदिर में स्थापित मां दुर्गा की प्रतिमा विसर्जन में लगभग 18 से 20 घंटे लग जाते हैं.
18 से 20 घंटे लगते हैं मूर्ति विसर्जन में
मिथिला क्षेत्र में दूर्गा पूजा का आयोजन गांव- गांव में बड़ी श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जाता है लेकिन जाले के जलेश्वरी मंदिर में मां दुर्गा की पूजा का अंदाज अलग है. पूजा तो भव्य होती ही है मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन भी बड़े भव्य तरीके से होता है. विसर्जन के दौरान एक से डेढ़ किलोमीटर दुरी तय करने में इतना समय लग जाता है कि आश्चर्य पैदा करता है.
1960 से जलेश्वरी मंदिर में दुर्गा पूजा का आयोजन किया जा रहा है
लोगों की उर्जा और भक्ति का मेल यहां देखते ही बनता है. यह सच है मूर्ति विसर्जन में इतना समय लगने के पीछे यहां की परंपरा है, जो कई दशकों से चली आ रही है. जलेश्वरी मंदिर में 1960 से दुर्गा पूजा का आयोजन किया जा रहा है यानि पिछले 56 सालों से यह परम्परा चल रही है कि महज लगभग एक किलोमीटर की दुरी तय करने में इतना वक्त लग रहा है.
हजारों की संख्या में प्रतिमा का विसर्जन में लोग हिस्सा लेते हैं
जलेश्वरी मंदिर में हो रही परम्परागत दुर्गा पूजा में लोगो की असीम आस्था है. लोगो की माने तो यहां मांगने पर हर मनौकामना पूरी होती है यही वजह है की यहां के लोग न सिर्फ पूजा धूम धाम से करते है, बल्कि मां दुर्गा की प्रतिमा विसर्जन भी पूरी उत्साह के साथ करते है. हजारों की संख्या में लोग मां दुर्गा की प्रतिमा विसर्जन में भाग लेते हैं. इसमें महिलाएं भी खूब बढ़- चढ़ कर हिस्सा लेती है.
महिलाएं झिझियां खेलती हैं
अब हम आपको बताते हैं कि मूर्ति विसर्जन में इतनी देरी क्यों लगती है. जलेश्वरी मंदिर से मूर्ति को जब विसर्जन के लिए लाया जाता है. तब वहां का पूरा माहौल और वातावरण भी साथ साथ चलता है. जगह- जगह रोक कर महिलाएं मिथिला की परम्परागत झिझियां खेलती है, माथे पर घड़ा रखकर उसके अंदर दीप जला कर यह खेल खेला जाता है जो मिथिला में काफी प्रचलित है.
महिलाएं जल में विसर्जित करती हैं
भीड़ इतनी होती है कि तिल रखने की जगह नहीं होती. मां कि भक्ति में सारे ऐसे लीन रहते हैं जैसे उन्हें समय का कोई अहसास नहीं रहता और देखते- देखते इनता वक्त निकल जाता है. आमतौर पर मूर्ति विसर्जन में पुरूषों की भागदीदारी देखी जाती है. लेकिन जाले में प्रधानता महिलाओं की है. शुरूआत में मूर्ति विसर्जन की कमान पूरूषों के पास जरूर होती है लेकिन आधी रात के बाद यह कमान महिलाओं के हाथ होती है और महिलाएं ही माता को पवित्र जल में विसर्जित करती हैं