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HealthWealth Summit: सोशल मीडिया पर मेंटल हेल्थ की चर्चा बढ़ी, फिर भी 75% लोग मदद लेने से बचते हैं

सोशल मीडिया पर डिप्रेशन और तनाव जैसे मानसिक स्वास्थ्य विषयों पर चर्चा बढ़ी है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार इलाज कराने वालों की संख्या में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई है.

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डॉ. समीर पारिख
डॉ. समीर पारिख

आज सोशल मीडिया पर डिप्रेशन, एंग्जायटी और तनाव जैसे विषयों पर खूब चर्चा होती हैय लोग अपने अनुभव साझा करते हैं और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ाने की कोशिश करते हैं,लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि मानसिक परेशानी से जूझ रहे लोग अब पहले से ज्यादा इलाज करा रहे हैं? इसका जवाब है नहीं. सोशल मीडिया पर चर्चा बढ़ने के बावजूद बड़ी संख्या में लोग मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मदद लेने से बचते हैं.

इंडिया टुडे के HealthWealth Summit में 'All is Hell?' सत्र के दौरान विशेषज्ञों ने इस अंतर पर चर्चा कीय फोर्टिस हेल्थकेयर के मेंटल हेल्थ एंड बिहेवियरल साइंसेज विभाग के चेयरपर्सन और डायरेक्टर डॉ. समीर पारीख ने बताया कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बातचीत बढ़ी है, लेकिन इससे यह मान लेना सही नहीं होगा कि इलाज लेने वालों की संख्या में भी उतनी ही बढ़ोतरी हुई है.

75% लोग मानसिक परेशानी में भी मदद नहीं लेते

डॉ. समीर पारीख के मुताबिक, आज भी मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं का सामना करने वाले करीब 75 प्रतिशत लोग मदद नहीं लेते है. इसके पीछे मानसिक बीमारियों को लेकर सामाजिक झिझक, लोगों में जानकारी की कमी और इलाज तक सीमित पहुंच जैसी वजहें हो सकती हैं. कई लोग मानसिक तनाव, उदासी या घबराहट को अपनी कमजोरी मान लेते हैं, जबकि ऐसा नहीं करना चाहिए. यही गलत सोच इलाज में देरी करने की वजह बन सकती है.

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सोशल मीडिया की दुनिया ही पूरी सच्चाई नहीं

 सोशल मीडिया पर दिखने वाली मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चर्चाओं को लेकर भी सावधान किया.उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के एल्गोरिदम इस बात को इफेक्ट करते हैं कि किसी व्यक्ति को किस तरह की पोस्ट बार-बार दिखाई देंगी. जैसे अगर कोई व्यक्ति डिप्रेशन या एंग्जायटी से जुड़ी पोस्ट देखता है या उनसे जुड़ता है, तो उसे इसी विषय का कंटेंट ज्यादा दिखाई देने लग सकता है. इससे उसे लग सकता है कि समाज में हर व्यक्ति मानसिक स्वास्थ्य पर बात कर रहा है और लोग आसानी से मदद भी ले रहे हैं.

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युवाओं का मानसिक तनाव नजरअंदाज करना ठीक नहीं

सत्र में युवाओं के बीच बढ़ते तनाव पर भी चर्चा हुई. डॉ. पारीख ने कहा कि मानसिक तनाव पहले भी था, लेकिन समय के साथ उसके कारण और परिस्थितियां बदल सकती हैं. इसलिए तनाव को नकारने के बजाय लोगों को इससे निपटने के कौशल सिखाने पर ध्यान देना चाहिए.

दिल्ली साइकियाट्रिक सोसाइटी की अध्यक्ष डॉ. मनुश्री गुप्ता और मनोचिकित्सक व डिजिटल मेंटल हेल्थ उद्यमी डॉ. संदीप वोहरा भी इस चर्चा में शामिल हुए. चर्चा का अहम संदेश यह है कि मानसिक स्वास्थ्य पर बातचीत बढ़ना सकारात्मक बदलाव है, लेकिन जागरूकता का वास्तविक फायदा तभी मिलेगा, जब लोग जरूरत पड़ने पर मदद लेने में सहज महसूस करेंगे.

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