कभी-कभी किसी अभिनेता की पहचान उसका नाम नहीं, उसकी आवाज बन जाती है. नाना पाटेकर के साथ भी कुछ ऐसा ही था. वो पर्दे पर आते थे तो लगता था कि अब कुछ होने वाला है. उनकी आंखें, उनका गुस्सा, बोलने का अंदाज और संवादों पर पकड़ उनके किरदारों को अलग बना देती थी. और अब वही आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई. आज सुबह नाना पाटेकर के निधन की खबर सामने आई.
गोवा के डोना पाउला स्थित अपने घर में नाना पाटेकर की तबीयत बिगड़ी. उन्हें अस्पताल ले जाया गया. डॉक्टरों ने करीब 45 मिनट तक CPR दिया, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका. डॉक्टरों के मुताबिक उन्हें सुबह 5 बजकर 20 बजे मृत घोषित किया गया.
अब पर्दे की तरफ लौटते हैं. क्योंकि नाना पाटेकर को याद करने का एक तरीका उनके वो डायलॉग भी हैं, जिन्हें सुनते ही सामने उनका चेहरा आ जाता है. फिल्म 'क्रांतिवीर' का वो संवाद याद कीजिए. 'आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने?' सिर्फ एक लाइन थी. लेकिन नाना पाटेकर ने इसे जिस अंदाज में बोला, वो संवाद फिल्म से निकलकर दर्शकों की यादों में बस गया. आज उनके निधन की खबर के बीच यही लाइन एक बार फिर याद आ रही है.
फिर आती है 'तिरंगा'. 'अपना तो उसूल है... पहले लात, फिर बात, उसके बाद मुलाकात!' नाना पाटेकर की आवाज में बोले गए इस संवाद में वही बेबाकी थी, जो उनके कई किरदारों की पहचान बनी. 'प्रहार' में उनका संवाद था- 'तू शेर है, शेर की तरह दहाड़... वरना कुत्तों की तरह भौंकते रह जाओगे!'
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ये सिर्फ संवाद नहीं थे. नाना की आवाज, उनका चेहरा, आंखों का गुस्सा और बोलने का अंदाज मिलकर इन्हें ऐसा बना देते थे कि दर्शक उन्हें भूल नहीं पाते. 'परिंदा' में उनका एक संवाद था- 'ये दुख नाम की बीमारी का इलाज किसी डॉक्टर के पास नहीं है... इसका इलाज खुद ही ढूंढना पड़ता है.' नाना पाटेकर के अभिनय की खासियत यही थी कि वह संवाद बोलते नहीं थे, उसे किरदार के भीतर से निकालते थे.
और फिर 'क्रांतिवीर' का वो संवाद, जिसमें उन्होंने समाज की हालत पर सवाल खड़ा किया- 'कुत्ते की तरह जीने की आदत पड़ गई है सबको...' उनके संवादों में गुस्सा था, दर्द था, व्यवस्था पर सवाल था और आम आदमी की बेचैनी भी. यही वजह है कि नाना पाटेकर को सिर्फ एक अभिनेता के तौर पर याद करना मुश्किल है.
उन्होंने 'परिंदा', 'प्रहार: द फाइनल एक्ट', 'तिरंगा', 'क्रांतिवीर' और 'खामोशी: द म्यूजिकल' जैसी फिल्मों में अलग-अलग तरह के किरदार निभाए. उन्हें नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिले. कई फिल्मफेयर अवॉर्ड और महाराष्ट्र स्टेट फिल्म अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया. उन्हें पद्म श्री से भी नवाजा गया था. लेकिन अवॉर्ड अपनी जगह हैं. दर्शकों की याद में किसी कलाकार की असली जगह उसके किरदार बनाते हैं.
नाना पाटेकर के मामले में उनकी आवाज भी उन्हीं किरदारों का हिस्सा थी. आज नाना पाटेकर हमारे बीच नहीं हैं. लेकिन जब कोई कहेगा, 'आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने?', तो शायद बहुत से लोगों के जेहन में वही चेहरा उभरेगा. और यही किसी अभिनेता की सबसे बड़ी विरासत होती है. पर्दा गिर जाता है. कहानी खत्म हो जाती है. लेकिन कुछ आवाजें हमेशा जिंदा रहती हैं.