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त्याग का बोझ कब तक उठाएंगी महिलाएं? करवा चौथ मनाइए, परंपराओं पर सवाल भी उठाइए!

मैं हमेशा से मानती आई हूं कि स्वेच्छा से तीज-त्योहार मनाने और व्रत रखने में त्योरियां चढ़ा लेने जैसा कुछ भी नहीं है. हर व्यक्ति अपनी तरह से अपनी जिंदगी जीने के लिए स्वतंत्र है और इन त्योहारों और व्रतों को रख सकता है और रख रहा है लेकिन जिन बराबरी की बात हम करते आए हैं. उस नजरिए से देखें तो इन पर सवाल उठाना भी जरूरी है.

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त्योहारों में महिलाओं की स्थिति. (Photo: ITG)
त्योहारों में महिलाओं की स्थिति. (Photo: ITG)

औरत पैदा नहीं होती, उसे औरत बनाया जाता है... फ्रांस की मशहूर फेमिनिस्ट फिलॉसफर सिमोन द बोउआर ने अपनी किताब द सेकेंड सेक्स में यह विचार रखते हुए उस सामाजिक व्यवस्था पर सवाल उठाया था, जो स्त्री की पहचान और उसकी भूमिका को गढ़ती है. समाज एक लड़की के जन्म के साथ ही उसके लिए कई अपेक्षाएं तय करने लगता है कि उसे कैसा व्यवहार करना चाहिए, उसकी प्राथमिकताएं क्या होनी चाहिए और एक अच्छी बेटी, पत्नी या मां होने के लिए उससे क्या उम्मीद की जाती है. सिमोन का यह विचार आज भी मौजूं है, क्योंकि बदलती लाइफस्टाइल के बावजूद स्त्री की भूमिका, रिश्तों और परंपराओं को लेकर समाज की कई धारणाएं अब भी अमूमन वैसी ही हैं. ऐसे में करवा चौथ ऐसा ही एक अवसर है, जहां प्रेम और आस्था के साथ स्त्री से जुड़ी सामाजिक धारणाएं भी सामने आती हैं.

सवाल यह नहीं कि महिलाएं व्रत क्यों रखती हैं, बल्कि यह है कि प्रेम और समर्पण व्यक्त करने के लिए समाज ने कुछ खास जिम्मेदारियां स्त्री के हिस्से ही क्यों तय कर दी हैं? करवा चौथ पर सजना-संवरना, चांद निकलने का इंतजार करना, पति की लंबी उम्र के लिए प्रार्थना करना कई महिलाओं के लिए खुशियों से भरा भावनात्मक पल हो सकता है तो कुछ के लिए यह पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक परंपरा हो सकती है. लेकिन यह सवाल जरूर पूछा जा सकता है कि अगर पति-पत्नी एक-दूसरे से प्रेम करते हैं और एक-दूसरे की सलामती चाहते हैं, तो उस प्रेम को व्यक्त करने की जिम्मेदारी अक्सर पत्नी के हिस्से क्यों आती है?

पति की लंबी उम्र के लिए पत्नी का उपवास रखना जहां समर्पण माना जाता है, वहीं पत्नी के लिए पति के उपवास रखने की परंपरा को संस्कृति में उस तरह की जगह क्यों नहीं मिल पाई? प्रेम को इजहार करने के तरीके अलग हो सकते हैं, लेकिन उसकी जिम्मेदारी बराबर क्यों नहीं हो सकती? बेशक इसके पीछे का कारण बताते हुए दुहाई उस समय की स्थितियों को दी जाए लेकिन इसकी जड़े समाज के पितृसत्तात्मक ढांचे तक पहुंचती हैं.

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यह सवाल करवा चौथ की आस्था को खारिज करने के लिए नहीं है, बल्कि उस सामाजिक सोच को समझने के लिए है जिसमें स्त्री का त्याग सहज और पुरुष का त्याग असाधारण मान लिया जाता है. पितृसत्ता का अर्थ केवल महिलाओं पर पाबंदियां लगाना भर नहीं है. यह उन धारणाओं में भी मौजूद है जो महिलाओं से दूसरों की जरूरतों को प्राथमिकता देने और रिश्तों को बनाए रखने के लिए ज्यादा समझौते करने की अपेक्षा करती हैं.

बचपन से लड़की को दूसरों का ख्याल रखने, परिवार की इज्जत का मान रखने और रिश्तों में तालमेल बनाने की सीख दी जाती है. बड़े होकर यही गुण उसके तथाकथित संस्कार और अच्छे चरित्र की पहचान बनते हैं. दूसरों की परवाह करने या त्याग करने में कोई बुराई नहीं है. मुश्किल तब होती है, जब संस्कारी होने के लिए इन गुणों को अनिवार्य मान लिया जाता है. 

करवा चौथ से आगे बढ़ें तो भारतीय त्योहारों में स्त्री की भूमिका के कई दूसरे रूप दिखाई देते हैं. तीज पर पति की लंबी उम्र की कामना हो, अहोई अष्टमी पर परिवार और संतान के कल्याण की प्रार्थना हो या रक्षाबंधन पर भाई की सलामती इन परंपराओं के अपने सांस्कृतिक और भावनात्मक अर्थ रहे हैं. लेकिन इसके केंद्र में सदा पुरुष ही रहा है.

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मैं हमेशा से मानती आई हूं कि स्वेच्छा से तीज-त्योहार मनाने और व्रत रखने में त्योरियां चढ़ा लेने जैसा कुछ भी नहीं है. हर व्यक्ति अपनी तरह से अपनी जिंदगी जीने के लिए स्वतंत्र है और इन त्योहारों और व्रतों को रख सकता है और रख रहा है लेकिन जिन बराबरी की बात हम करते आए हैं. उस नजरिए से देखें तो इन पर सवाल उठाना भी जरूरी है. बरसों से होता आया है. बड़े-बुजुर्ग कहते रहे हैं या वेद-पुराण में लिखा है. आंख मूंदकर उसे कब तक मान जाए? अपनी खुद की चेतना से सवाल भी उठाने जरूरी है.

सवाल कि शराबी पति हर रोज दारू पीकर घर पर आकर पत्नी से मारपीट करे और महिला हर साल उतनी ही शिद्दत से उसके लिए करवा चौथ का व्रत रखे. कम से कम मुझे तो फिर ये तीज-त्योहार हजम नहीं होते. 

ऐसे में इन परंपराओं के बीच यह देखना जरूरी है कि परिवार की सलामती के लिए उपवास रखने, पूजा की तैयारियां करने और रिश्तों की भावनात्मक जिम्मेदारी निभाने का कितना हिस्सा महिलाओं से अपेक्षित होता है. किसी रस्म का अर्थ केवल उसके धार्मिक विधान में नहीं बल्कि उस सामाजिक भूमिका में भी छिपा हो सकता है जो उससे निभाने वाले व्यक्ति के साथ जोड़ दी जाती है.

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नवरात्रि में कन्या पूजन भी इसी संदर्भ में एक दिलचस्प सवाल खड़ा करता है. बच्चियों को देवी का स्वरूप मानकर उनकी पूजा करना श्रद्धा का भाव है. लेकिन क्या यह सम्मान रोजमर्रा की जिंदगी में भी होता है? क्या उन्हें अपनी पसंद से जीने या पसंद का साथी चुनने की उतनी ही सहज आजादी मिलती है? देवी के रूप में पूजना और स्त्री के रूप में उसके अधिकारों का सम्मान करना दो अलग बातें हैं. किसी को ऊंचे पायदान पर बैठाना आसान हो सकता है, लेकिन उसे बराबर बैठकर उसकी बात सुनना, उसकी असहमति को स्वीकार करना और उसके फैसलों का सम्मान करना ज्यादा ठोस सामाजिक बदलाव मांगता है. आस्था और समानता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, लेकिन आस्था का सम्मान अपने आप समानता की गारंटी भी नहीं बन जाता.

यह सवाल केवल हिंदू त्योहारों या भारतीय परंपराओं तक सीमित नहीं है. रमजान में रोजा रखना अनेक महिलाओं और पुरुषों के लिए इबादत और आध्यात्मिक जुड़ाव का हिस्सा है. लेकिन कई परिवारों में सहरी और इफ्तार की तैयारियों का अतिरिक्त काम महिलाओं के हिस्से आता है यानी इबादत का अवसर दोनों के लिए है, मगर उसे निभाने के साथ जुड़ा श्रम हमेशा बराबर नहीं बंटता. यहां भी मुद्दा किसी धार्मिक परंपरा पर सवाल उठाना नहीं, बल्कि यह देखना है कि एक ही घर में आध्यात्मिक जिम्मेदारी साझा करने वाले लोग घरेलू जिम्मेदारियां भी किस हद तक साझा करते हैं. अगर परिवार के सभी सदस्य इबादत और त्योहार से जुड़ी खुशी में भागीदार हैं, तो उनकी तैयारी और उससे जुड़े काम की जिम्मेदारी भी सबकी क्यों न हो?

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त्योहारों के दौरान महिलाओं का यह श्रम और बढ़ जाता है. घर की सफाई, पकवान बनाना, मेहमानों की आवभगत, बच्चों की जरूरतों का ध्यान रखना इन सबके बीच त्योहार की खुशी अक्सर महिलाओं की मेहनत पर टिकी होती है. बहुत-से घरों में पुरुष भी इन कामों में हाथ बंटाते हैं, लेकिन कई जगह महिलाओं से ही उम्मीद की जाती है कि वे सबकी पसंद और सुविधा का ख्याल रखें. घर को त्योहार के लिए तैयार करने से लेकर रिश्तेदारों को संभालने तक उनका काम इतना सामान्य मान लिया जाता है कि उसकी मेहनत अलग से दिखाई ही नहीं देती. ऐसे में सवाल उठता है कि अगर त्योहार पूरे परिवार का उत्सव हैं, तो उन्हें सफल बनाने की जिम्मेदारी भी पूरे परिवार की क्यों नहीं होनी चाहिए? 

भारतीय परिवारों में त्याग करने वाली महिला को अक्सर आदर्श माना जाता है. बच्चों को अपने हिस्से का खाना खिला देने वाली मां, अपनी पसंद छोड़कर परिवार की जरूरतों को प्राथमिकता देने वाली पत्नी या त्योहार पर सबसे पहले उठकर घर के काम में जुट जाने वाली बहू की तारीफ होती है. अपनों के लिए कुछ करना, अपनी खुशी बांटना और जरूरत पड़ने पर समझौता करना रिश्तों की खूबसूरती हो सकती है. लेकिन जब त्याग को महिलाओं की खूबी के बजाय उनकी अनिवार्य जिम्मेदारी मान लिया जाता है, तब यही खूबी उनके लिए दबाव भी बन सकती है. सबकी जरूरतों का ध्यान रखने वाली महिला को संस्कारी कहा जाता है, लेकिन जब वही अपनी जरूरतों को प्राथमिकता देती है, तो उसे स्वार्थी ठहरा दिया जाता है. 

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यहीं सिमोन द बोउआर के विचार की प्रासंगिकता समझ आती है. सामाजिक कंडीशनिंग हमेशा किसी आदेश या पाबंदी के रूप में सामने नहीं आती. कई बार वह हमारी आदतों, पसंद और उन बातों में छिपी होती है जिन्हें हम बिना सवाल किए स्वाभाविक मान लेते हैं. कोई महिला अपनी इच्छा से व्रत रखती है, परिवार की परंपरा आगे बढ़ाती है या अपनों के लिए त्याग करती है, तो उसके चुनाव का सम्मान होना चाहिए. लेकिन यह भी समझना जरूरी है कि किसी चुनाव को वास्तविक स्वतंत्रता तभी कहा जा सकता है, जब उसके उलट फैसला लेने की गुंजाइश भी हो. अगर व्रत न रखने वाली महिला को कम समर्पित पत्नी समझा जाए, त्योहार में शामिल न होने वाली बहू को संस्कारहीन कहा जाए या अपनी जरूरतों को प्राथमिकता देने वाली मां को स्वार्थी ठहराया जाए, तो सवाल उस सामाजिक माहौल पर उठता है जिसमें चुनाव की आजादी तो है, लेकिन हर चुनाव को बराबर सम्मान नहीं मिलता.

नई पीढ़ी की महिलाओं के सामने यह बदलाव खासतौर पर दिखाई देता है. वे करवा चौथ मनाना चाहती हैं, सजना-संवरना चाहती हैं, अपने रिश्ते की खुशी साझा करना चाहती हैं, लेकिन साथ ही अपने करियर, आर्थिक स्वतंत्रता, निजी समय और फैसले लेने के अधिकार को भी महत्व देती हैं. इन इच्छाओं में कोई विरोधाभास नहीं है. आधुनिक होने का मतलब अपनी संस्कृति से दूरी बना लेना नहीं है. एक महिला अपनी इच्छा से व्रत रख सकती है और उसी सहजता से अपने पति से घर के काम में साझेदारी भी मांग सकती है. असली बदलाव तब होगा, जब समाज स्त्री की स्वतंत्रता को उसकी परंपराओं से टकराव के रूप में देखने के बजाय उसके अपने फैसले लेने के अधिकार के रूप में स्वीकार करेगा.

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