लंबे इंतजार, कई बड़े शेड्यूल और देरी के बाद आखिरकार यश की मच अवेटेड फिल्म 'Toxic: A Fairytale for Grown-Ups' दस्तक दे चुकी है. 'KGF' के रॉकी भाई के बाद यश इस बार एक बिल्कुल अलग अंदाज में नजर आने वाले हैं. फिल्म की कमान गीतू मोहनदास ने संभाली है, यानी 3 घंटे 15 मिनट की A रेटेड वाली एक्शन और गैंगस्टर की इस दुनिया को एक महिला निर्देशक का नजरिया मिला है.
500 करोड़ रुपये से ज्यादा के बड़े बजट, पीरियड सेटिंग, खतरनाक एक्शन, रहस्यमयी किरदारों और यश के डबल रोल ने पहले ही फिल्म को लेकर एक्साइटमेंट बढ़ा दी है. तो सवाल सीधा है- क्या 'टॉक्सिक' सिर्फ यश के स्टारडम पर टिकी फिल्म है या इसमें ऐसा कुछ है जो 'KGF' की यादों से आगे ले जाता है? आइए जानते हैं, कैसी है 'टॉक्सिक: अ फेयरीटेल फॉर ग्रोन-अप्स'. पढ़ें हमारा रिव्यू...
राया- 'तुम्हें लगता है मैं बुरा आदमी हूं? नादिया- नहीं, मुझे लगता है तुम टॉक्सिक हो.'
फिल्म में यह डायलॉग उस वक्त आता है, जब तक यह बात पूरी तरह साफ हो चुकी होती है कि राया (यश) वही धांसू अल्फा मेल है, जिसे खून के छींटे दुनिया की सबसे बढ़िया एक्सेसरी लगते हैं- खासकर तब, जब वे किसी के ताजा-ताजा टूटे हाथ-पैर से उड़ रहे हों.
तो क्या यह सच में कोई सवाल है? बिल्कुल नहीं. यह तो बस दिखावे का सवाल है. क्योंकि यही चीज टॉक्सिक की पूरी पहचान है- आजादी के बाद के दौर में फैली गैंगस्टर दुनिया की यह कहानी पूरे 3 घंटे 15 मिनट तक दर्शकों के सामने खून-खराबे की ऐसी दुकान खोलती है, जिसमें हीरो जितना ज्यादा मार-काट करता है, उतना ही मजा समझा जाता है. खासकर तब, जब उसने अपनी पिछली ब्लॉकबस्टर फिल्मों केजीएफ और केजीएफ 2 में इसी फॉर्मूले को खूब चलते देखा है.
केजीएफ की तरह टॉक्सिक भी एक पीरियड फिल्म है. कहानी 1947 के गोवा से शुरू होती है और करीब 20 साल आगे तक जाती है. फिल्म में पुराने हॉलीवुड गैंगस्टर क्लासिक्स, खासकर गॉडफादर की भरपूर झलक मिलती है- चुस्त सूट, साइडबर्न, फेडोरा पहने मर्द और चमकदार कपड़ों में महिलाएं, पतली सिगरेट होल्डर और धुएं से भरे नाइट क्लब.
ऊपर से एनिमल की भी याद दिलाई जाती है. आखिर हमारे सुपरस्टार्स को घनी दाढ़ी वाले, सेक्स के भूखे और भावनात्मक रूप से अधूरे मर्दों के रूप में दिखाने का इससे बेहतर तरीका और क्या हो सकता है.
बदस्तूर टूटी उम्मीद...
मैं टॉक्सिक देखने सिर्फ धड़ाम-धड़ूम और मार-काट के लिए नहीं गई थी. मुझे फिल्म के रोमांस से ज्यादा उम्मीद थी. यश, नयनतारा, कियारा... यहां तक कि गीतू मोहनदास के किए उस वादे- इट्स लेडीज वर्सेज लेडीज से भी उम्मीद थी. आखिर इसकी टैगलाइन भी एक रोमांटिक ‘फेयरीटेल फॉर ग्रोन-अप्स’ यानी बड़ों के लिए फेयरीटेल का वादा करती है. गीतू पहले भी फिल्मों में मुश्किल हालात के बीच भी अपने किरदारों की नर्म भावनाओं को उभारने की काबिलियत दिखाई है.
मैं देखना चाहती थी कि क्या यह फिल्म सच में मुझे अपनी दुनिया में बहा ले जाएगी. क्योंकि ऐसी कहानी बनाने की हिम्मत भारतीय फिल्मकार बहुत कम दिखाते हैं. लेकिन अफसोस, मेरी उम्मीद हर सीन के साथ टूटती हुई नजर आई.
इसके बजाय हमें गोवा, मकाऊ और दूसरी खूबसूरत लोकेशनों में चल रहा हिंसा का एक लंबा, थका देने वाला सिलसिला मिलता है. अपराध की दुनिया में गैंगस्टर और भ्रष्ट ताकतें हाथ मिला चुकी हैं. बंदूकधारी गुंडों की ऐसी फौज है, जिनके चेहरे तक ठीक से याद नहीं रहते. वे आते हैं, गोलियां चलाते हैं और अगले एक्शन सीन की तरफ भाग जाते हैं. एक के बाद एक सेट-पीस आते रहते हैं. लेकिन रोमांच पैदा करने के बजाय वे धीरे-धीरे आपको थका देते हैं.
फिल्म में जब महिलाएं आती हैं, तभी कहानी थोड़ी देर के लिए सांस लेती है. हालांकि यहां भी हर महिला की पहचान किसी न किसी पुरुष से जुड़े रिश्ते के जरिए होती है. डायरेक्टर की कुर्सी पर गीतू मोहनदास जरूर बैठी हैं, लेकिन आखिरकार यह पूरी तरह और बिना किसी शक के ‘रॉकिंग स्टार यश’ के स्वैग की फिल्म है.
हुमा कुरैशी एक दूसरे गैंगस्टर की प्रेमिका हैं. तारा सुतारिया उसी गैंगस्टर की बेटी हैं और हमारे राया के लिए उनके दिल में भावनाएं हैं. रुक्मिणी वसंत के साथ भी लगभग यही कहानी है. नयनतारा राया की बेहद प्रोटेक्टिव बड़ी बहन हैं.
सुकून का एहसास देतीं कियारा आडवाणी
इन सबमें सबसे ज्यादा असर छोड़ती हैं कियारा आडवाणी. वह एक खूबसूरत और दुखी सर्कस ट्रैपेज आर्टिस्ट के किरदार में हैं, जो पत्थर जैसे सख्त राया के भीतर भी थोड़ी नरमी पैदा कर देती है. अगर कोई इस फिल्म को सचमुच बचाने की कोशिश करता दिखता है, तो वह कियारा ही हैं. 'टॉक्सिक’ की शुरुआत कियारा आडवाणी यानी नादिया की एंट्री से ही होती है और पहला ही सीन दमदार असर छोड़ता है. हालांकि उस सीन की झलक हमने ट्रेलर में भी देखी है, लेकिन यहां यह अलग ही मोड़ देती है. मुझे इस सीन को देखने से ही कियारा से प्यार हो गया. साथ ही फिल्म में उनका बच्चा बना 'टिकट' आपको अलग से जोड़ता हा.
लेकिन इसके बाद फिल्म करवट लेती है गोवा की क्राइम की दुनिया को दिखाने से लेकर उसी क्रेमेटोरियम वाले सीन पर, जो हमने पहले टीजर में देखा था. यकीन मानिए, इसके बाद से या तो शराब और लड़की के नशे में चूर दिखे हैं, या फिर सिर्फ मार-काट मचाते. जितनी तेजी से वो लोगों को मारते हैं- देख के यकीन हो जाएगा कि दुनिया अगले 5 मिनट में खत्म है.
यश की दमदार मौजूदगी, कमजोर कहानी
राया के किरदार को जिस तरह से पेश किया गया है, उसमें स्वैग भी है और एक खतरनाक अंदाज भी. हाथ, मुंह, पैर... जहां जगह मिली, वहीं से गोलियां चलती नजर आती हैं. एक्शन भरपूर है, लेकिन लगातार हिंसा के बीच कहानी का इमोशनल हिस्सा कहीं दबता हुआ महसूस होता है.
सबसे बड़ी दिक्कत यहां राया और उसकी बहन गंगा के रिश्ते की लगती है. जिस बहन को राया की जिंदगी की ‘बैकबोन’ बताया गया है, वही रिश्ता उसकी लव स्टोरी के बिल्डअप में कहीं पीछे छूटता दिखता है. यानी भाई-बहन का मजबूत बॉन्ड धीरे-धीरे राया की मोहब्बत की कहानी के आगे बली चढ़ता हुआ महसूस होता है.
फिल्म लगातार अपने बड़े खुलासों और कहानी के बिल्डअप की तरफ बढ़ती रहती है, लेकिन इसी चक्कर में वह वह हाइप पैदा नहीं कर पाती जिसकी उम्मीद की जा रही थी. तमाम स्टाइल, एक्शन और यश के स्वैग के बावजूद फर्स्ट हाफ में कहानी पकड़ बनाने के बजाय कई जगह खींचती हुई लगती है.
और फिर आता है इंटरवल, जो रोमांच बढ़ाने के बजाय थोड़ा इरिटेट करता है. ऐसा लगता है कि फिल्म काफी देर से किसी बड़े धमाके की तैयारी कर रही थी, लेकिन इंटरवल तक वह धमाका उस स्तर का असर नहीं छोड़ पाता.
ये कैसी फेयरीटेल?
फिल्म हमें समझाना चाहती है कि राया गैंगस्टर अपनी परिस्थितियों की वजह से बना है, वह जन्म से राक्षस नहीं है. लेकिन दर्शकों के उस तबके को खुश करने के लिए, जिसे हीरो का महिलाओं के सामने भी दबंग और बदतमीज होना पसंद है, राया बार-बार घटिया और सेक्सिस्ट बातें करता है. और यह सब खूब होता है.
मेरे फर्स्ट-डे, फर्स्ट-शो वाले थिएटर में आधे से ज्यादा लोगों की सीटें भरी हुई थी. लेकिन हर कोई यश के मुंह से ऐसे डायलॉग्स सुनकर ताली नहीं बजा रहा था बल्कि हंस रहा था और कह रहा था कि- ये क्या है.
फिल्म में भाई-बहन, आशिकी के साथ पिता-पुत्र वाला एंगल भी है. यह हिस्सा आखिरकार कहानी से जुड़ता है, तो टॉक्सिक कुछ देर के लिए सही मायनों में फिल्म जैसी लगने लगती है. उस वक्त यह वही बेहद स्टाइलिश और बुखार जैसे सपने वाली फिल्म बनती दिखाई देती है, जो शायद डायरेक्टर शुरू से बनाना चाहती थीं. लेकिन इतने अफसोस की बातों के बीच एक दिक्कत ये भी है कि ये पल आपको फिल्म के आखिरी के 15 मिनट में देखने को मिलता है.
भागती-दौड़ती फिल्म
मैं किसी की एक्टिंग की बात नहीं करूंगी, सभी मंझे हुए कलाकार है, लेकिन 3 घंटे 15 में आपको ढंग की कहानी और स्क्रीनप्ले ही देखने को न मिले तो किसी की अच्छी एक्टिंग देखने कोई थियेटर क्यों जाए.
बाकी फिल्म में यश अपने ‘टॉक्सिक’ किरदार को ढोते हुए एक जल्दबाजी भरे सीन से दूसरे सीन में पहुंचते रहते हैं. महिलाओं के शरीर का इस्तेमाल, इंसानों पर गोलियां, चाकू और कुल्हाड़ी चलाना- सब कुछ इतनी तेजी और इतनी मात्रा में होता है कि फिल्म शुरू होते ही लाशों की गिनती भूल जाना आसान है.
आखिर एक फेयरीटेल इतनी खोखली कैसे हो सकती है? आवाज बहुत ज्यादा है. गुस्सा बहुत ज्यादा है. गोलियां बहुत ज्यादा हैं. खून बहुत ज्यादा है. लेकिन इन सबके पीछे कहने को आखिर बचता क्या है? बहुत शोर, बहुत सनसनी और मतलब लगभग कुछ भी नहीं.