कुछ फिल्मों की हाइप सिर्फ एक स्टार और उसके 'ऑरा' से कितनी ज्यादा बढ़ सकती है, इसके कई उदाहरण हाल ही में देखे गए. सबसे ताजा यश की फिल्म टॉक्सिक है, जो उनके स्टारडम के दम पर 100 करोड़ की ओपनिंग ले गई. वहीं अगर उससे कुछ महीने पहले जाएं, तो राम चरण की पेद्दी भी लोगों के बीच बज बनाने में कामयाब रही थी. साउथ की फिल्मों का क्रेज अब नॉर्थ में भी तगड़ा है, यही वजह है कि टॉक्सिक और पेद्दी ने पैन-इंडिया में पहले हफ्ते तगड़ी कमाई की. हालांकि जब पिक्चर के रिव्यू बाहर आए, तो कमाई में गिरावट आई.
टॉक्सिक और पेद्दी को देखकर कई लोगों ने कहा था कि ये सिरदर्द है. दोनों फिल्में अपनी कहानी को लेकर ट्रोल हुई थीं. अब साउथ सिनेमा से एक और स्टार नानी भी अपनी पैन-इंडिया फिल्म द पैराडाइज लेकर आए हैं. इस फिल्म का कोई ट्रेलर रिलीज नहीं हुआ था. मगर तब भी लोगों के बीच इसकी हाइप थी, क्योंकि फिल्म के गाने और एक्टर्स की प्रेजेंटेशन सबको पसंद आई थी. अब चूंकि ये फिल्म रिलीज हो गई है, तो इसकी अच्छाई-बुराई से भी पर्दा उठ गया है. कैसी है नानी की द पैराडाइज? चलिए बात करते हैं.
क्या है पैराडाइज?
पैराडाइज जगह है, जो 1980 के दशक के दौरान आंध्र प्रदेश के सिकंदराबाद में स्थित था. वहां आजादी के बाद से एक पिछड़ा हुआ समुदाय अपनी पहचान के लिए लड़ाई कर रहा है. उनके ऊपर मलिक (मोहन बाबू) नाम का शख्स है, जिसका वो लोग अत्याचार सहते हैं. वो नहीं चाहता कि पैराडाइज की बस्ती के लोगों को पहचान मिले. वो बेहद अमानवीय हालात में जीने को मजबूर हैं, जहां खाने की कमी है, कमाई का कोई पक्का जरिया नहीं है और अपनी मर्जी से जीने की आजादी भी नहीं है. इसी बस्ती में एक जादल (नानी) और उसकी मां शमक्का (सोनाली कुलकर्णी) रहते हैं. शमक्का अपने बेटे को पाल-पोसकर बड़ा करने के लिए हर कष्ट झेलती है.
जादल बड़ा होकर अपनी बस्ती के लोगों को पहचान दिलाने की कोशिशों में लग जाता है. वो उनका सरताज बनकर मलिक और उसे बेटे विक्रम (राघव जुयाल) से दुश्मनी मोल लेता है. एक अकेला जादल अपने समुदाय के लोगों के बीच एक ऐसे शख्स के तौर पर देखा जाता है, जो एक दिन उन्हें सालों से चले आ रहे अत्याचार और शोषण से आजाद करा सकता है. और ऐसी कहानियों की तरह, एक वक्त ऐसा भी आता है जब जादल को अपने जीवन का मकसद समझ में आता है और वो अपने लोगों के लिए लड़ने का फैसला करता है. अब क्या जादल, विक्रम और मलिक को रास्ते से हटाकर पैराडाइज की बस्ती के लोगों को देश का नागरिक बना पाएगा? यही इस पिक्चर के प्लॉट का एक हिस्सा है.
गोल-घुमक्कड़ है पैराडाइज की दुनिया, कहानी में नहीं कोई दम
फिल्म की कहानी को 'धुरंधर' स्टाइल की तरह चैप्टर्स में बांटने का काम किया गया है. हालांकि डायरेक्टर श्रीकांथ ओडेला की ये कोशिश नाकामयाब रहती है. उनकी स्टोरी बिखरी-बिखरी सी ज्यादा लगती है. भले ही हर एक चैप्टर का मकसद स्टोरी को आसानी से समझाने के लिए था. मगर इसे आसान तो दूर की बात, कहानी गोल-घुमक्कड़ सी ज्यादा लगी. कहानी में कुछ मोमेंट्स सिर्फ ऑडियंस का ध्यान खींचने के लिए बनाए हों, ऐसा महसूस हो रहा था. वहीं फिल्म में टिपिकल साउथ मसाला डालने की कोशिश हुई.
जरूरत से ज्यादा स्लो मोशन, खून-खराबा, लाउड एक्शन सीक्वेंस, और ओवर-ड्रामैटिक सीन्स पिक्चर को काफी 'टॉक्सिक' बनाने का काम करते हैं. एक वक्त के बाद सिर में दर्द होने लगता है कि आखिर डायरेक्टर श्रीकांथ ओडेला दिखाना क्या चाह रहे हैं? मां-बेटे के इमोशन, बस्ती वालों को पहचान दिलाने की लड़ाई, या विलेन संग दुश्मनी? एक ही कहानी में इतने सारे प्लॉट पॉइंट्स डालकर, डायरेक्टर ने सिर्फ कंफ्यूज ही किया. एक पॉइंट पर ऐसा लगता है कि फिल्म खत्म हो गई, लेकिन तभी कोई ऐसा ट्विस्ट आ जाता है जिससे फिर पिक्चर आगे खींच दी जाती है. ये माना जा सकता है कि उनकी कोशिश एक दुनिया को बनाने की थी, मगर जिस दुनिया में इतना कमजोर विलेन और एक मकसद ना हो वो देखने में मजेदार नहीं होती.
अनिरुद्ध भी नहीं बचा पाए नानी की फिल्म
इस फिल्म का सबसे बड़ा सेलिंग-पॉइंट म्यूजिक डायरेक्टर अनिरुद्ध रविचंद्र थे. द पैराडाइज में उनके गानों ने सोशल मीडिया पर जो धूम मचाई, वो हम सभी ने एक्सपीरियंस किया. नानी का हुक-स्टेप हो या कीर्ति सुरेश का येशनागुला गाना, फिल्म की हाइप को बढ़ाने में इनका बड़ा योगदान रहा. मगर ये सब भी फिल्म को वैसे नहीं उठा सकी जैसे अनिरुद्ध अकेले कर देते हैं. उनका बैक्राउंड स्कोर भी इस बार किसी काम नहीं आया, जिसमें अनिरुद्ध को महारथ हासिल थी.
यहां देखें फिल्म का टीजर:
नानी की एक्टिंग ने दिखाया दम, मगर राघव...
पिक्चर में कहानी और स्कीनप्ले के अलावा सिर्फ एक्टर्स की एक्टिंग ही बढ़िया थी. तेलुगू सिनेमा के 'नेचुरल स्टार' कहे जाने वाले नानी अपने कंधों पर पूरी फिल्म को उठाकर चलते रहे. उनका साथ सोनाली कुलकर्णी ने भी अच्छे से दिया. नानी ने अपनी परफॉरमेंस और 'ऑरा' से द पैराडाइज फिल्म में जान फूंकी. ये कहना गलत नहीं होगा कि इसमें सिर्फ नानी शो था. आप उनके इमोशन्स को महसूस करते हैं, किरदार से साथ जुड़ भी जाते हैं लेकिन उनकी कहानी ही इतनी बिखरी हुई है कि आप चाहकर भी कुछ नहीं कर पाते.
विलेन की बात करूं, तो मैं जानना चाहूंगा कि राघव जुयाल ने क्या सोचकर फिल्म के लिए हां की. क्योंकि इसमें उनके लिए करने को कुछ नहीं था. ना कोई मासी मोमेंट, ना कोई दमदार सीन. उनके किरदार की इतनी आसान मौत फैंस को जरूर निराश करने वाली है. बल्कि उनके सामने मोहन बाबू एक तगड़े विलेन लग रहे थे. शुरुआत से ही उन्होंने अपना माहौल बनाकर रखा था. लेकिन कहानी में उनका योगदान कुछ खास ना रहने की वजह से वो यादगार नहीं रह पाए.
कुल मिलाकर अगर देखें, तो द पैराडाइज नानी के कट्टर फैंस के लिए बनी है जिसमें उनके मासी मोमेंट्स और ओवर द टॉप एक्शन आपका दिल जीत सकते हैं. अगर आप इससे कोई खास उम्मीद लगाकर जा रहे हैं, तो निराशा ही हाथ लगेगी.