मौत से कुछ घंटे पहले कोई व्यक्ति क्या खाना चाहता है, यह सवाल जितना सामान्य लगता है, भगत सिंह के मामले में उतना ही असाधारण हो जाता है. केतकी पांडे की शॉर्ट फिल्म ‘द लास्ट मील’ इसी सवाल को अपनी कहानी का केंद्र बनाती है. 23 मार्च 1931 की उस शाम, जब लाहौर सेंट्रल जेल में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी का वक्त करीब आ रहा था, भगत सिंह ने जेल के सफाईकर्मी बोगा से अपने लिए खाना बनाने को कहा. वह बोगा को ‘बेबे’ कहकर बुलाते थे. फिल्म में मक्के की रोटी और सरसों का साग इस आखिरी भोजन का हिस्सा बनते हैं.
लेकिन इस प्रसंग की अहमियत इस बात में नहीं है कि भगत सिंह ने आखिरी बार क्या खाने की इच्छा जताई. असली बात यह है कि वह खाना किससे बनवाना चाहते थे. बोगा उस सामाजिक व्यवस्था के निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति हैं, जहां जाति और छुआछूत जीवन का हिस्सा थे. भगत सिंह का उनके हाथ का बना खाना मांगना किसी भाषण की तरह नहीं, बल्कि व्यवहार में बराबरी का विचार रखने जैसा है. मौत के सामने खड़े भगत सिंह के लिए भी इंसान की पहचान उसकी जाति से बड़ी है.
यही फिल्म का सबसे मार्मिक हिस्सा है. बोगा के किरदार में इश्तियाक खान उस झिझक और सामाजिक संकोच को बेहद सहजता से सामने लाते हैं, जो उनके किरदार के भीतर मौजूद है. उनके सामने एक ऐसा कैदी है जो कुछ ही घंटों में फांसी पर चढ़ने वाला है, लेकिन उससे बात करते हुए भगत सिंह के भीतर किसी ऊंच-नीच का भाव नहीं है. आकाश दहिया भगत सिंह के रूप में इसी सहजता और दृढ़ता को पकड़ते हैं. उनके अभिनय में न जरूरत से ज्यादा जोश है, न बनावटी वीरता. मौत के सामने खड़े युवक की शांति ही उनके अभिनय की सबसे बड़ी ताकत बनती है.
फिल्म का भोजन वाला प्रसंग इसलिए भी असरदार है क्योंकि यहां घर के खाने की इच्छा और आने वाली मौत एक साथ चलती हैं. मक्के की रोटी और सरसों का साग सिर्फ पकवान नहीं रह जाते. वे घर, अपनापन और उस जीवन की याद बन जाते हैं, जिसे भगत सिंह कुछ ही घंटों बाद हमेशा के लिए छोड़ने वाले हैं. लेकिन इसी भोजन के चुनाव में सामाजिक बराबरी का सवाल भी छिपा है.
यहीं ‘द लास्ट मील’ भगत सिंह पर बनी दूसरी फिल्मों से अलग हो जाती है. भगत सिंह पर बनी फिल्मों में अक्सर उनका क्रांतिकारी संघर्ष, असेंबली में बम, अदालत, जेल और फांसी कहानी के बड़े पड़ाव रहे हैं. वहां उनका नायकत्व बड़े घटनाक्रमों में दिखाई देता है. केतकी की फिल्म इन बड़े प्रसंगों से बाहर निकलकर एक थाली के सामने बैठती है. यहां क्रांति किसी विस्फोट या भाषण में नहीं, एक ऐसे व्यक्ति के हाथ का खाना स्वीकार करने की इच्छा में दिखाई देती है, जिसे समाज ने बराबरी का दर्जा नहीं दिया था.
आज के समय में इस प्रसंग का महत्व और बढ़ जाता है. भगत सिंह की तस्वीरें और नाम आज भी राजनीतिक भाषणों, पोस्टरों और सोशल मीडिया में खूब इस्तेमाल होते हैं. लेकिन उनके विचारों को अक्सर उनके शौर्य और बलिदान तक सीमित कर दिया जाता है. ‘द लास्ट मील’ याद दिलाती है कि भगत सिंह को सिर्फ एक वीर शहीद के रूप में देखना उनके व्यक्तित्व को छोटा कर देना है. उनके लिए सामाजिक बराबरी और इंसानियत भी उतने ही महत्वपूर्ण सवाल थे.
केतकी पांडे का निर्देशन इस पूरी कहानी को बिना अनावश्यक शोर के आगे बढ़ाता है. जेल की मद्धिम रोशनी, सलाखों की परछाइयां, चाबियों की खनक और भोजन की तैयारी के बीच बढ़ता तनाव उस आखिरी शाम को महसूस कराता है. फिल्म फांसी को चरम दृश्य बनाने के बजाय उससे पहले के क्षणों में अपना असर पैदा करती है.
‘द लास्ट मील’ की असली खूबी यही है कि यह भगत सिंह की शहादत को फिर से दोहराने के बजाय उनकी आखिरी इच्छा को देखने का मौका देती है. बोगा के हाथों बनने वाली मक्के की रोटी और सरसों का साग आखिरकार एक ऐसी थाली बन जाते हैं, जिसमें भूख से ज्यादा अपनापन और भोजन से ज्यादा बराबरी का विचार मौजूद है. फिल्म खत्म होने के बाद याद फांसी का दृश्य नहीं, वह आखिरी भोजन रह जाता है. और शायद यही इस छोटी फिल्म की सबसे बड़ी सफलता है.