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Pooja Meri Jaan Movie Review: जुनूनी आशिक, बेबस लड़की और कोर्टरूम का खेल, कैसी है मृणाल की फिल्म?

Pooja Meri Jaan Review: मृणाल ठाकुर और हुमा कुरैशी की फिल्म में प्यार, जुनून और कोर्टरूम का ड्रामा है. जानिए फिल्म की कहानी, एक्टिंग और कमजोरियों के बारे में.

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पूजा मेरी जान फिल्म कैसी है? (Photo: Screengrab)
पूजा मेरी जान फिल्म कैसी है? (Photo: Screengrab)
फिल्म:मिस्ट्री ड्रामा
2.5/5
  • कलाकार : मृणाल ठाकुर, हुमा कुरैशी, विजय राज
  • निर्देशक :नवजोत गुलाटी

Pooja Meri Jaan Movie Review: एक तरफ है पूजा, जो अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेना जानती है, तो दूसरी तरफ है अनिकेत, जिसे प्यार में मिली एक ‘ना’ किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं. थिएटर के मंच से शुरू हुई यह कहानी कब जुनून, सनक और एक ऐसे कानूनी पचड़े में उलझ जाती है, जहां एक लड़की को अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए जूझना पड़ता है, पता ही नहीं चलता. 

मृणाल ठाकुर, हुमा कुरैशी और विजय राज जैसे दमदार कलाकारों से सजी 'पूजा मेरी जान' प्यार, रिजेक्शन, सहमति और समाज की दोहरी सोच जैसे गंभीर मुद्दों को उठाती है. लेकिन क्या फिल्म अपनी कहानी से दर्शकों को बांध पाती है? क्या कलाकारों की अदाकारी इस उलझे हुए रिश्ते को पर्दे पर असरदार बना पाती है? या फिर एक जरूरी मुद्दा कहानी के शोर में कहीं खो जाता है? चलिए, बिना कहानी के सस्पेंस को बिगाड़े जानते हैं कैसी है 'पूजा मेरी जान'.

क्या है फिल्म की कहानी?

फिल्म की शुरुआत होती है एक ऐसे प्रपोजल से, जो अचानक आता है और कहानी को सीधे विवाद के बीच ला खड़ा करता है. परेशानी ये है कि अभी तक हमें किरदारों को समझने का मौका ही नहीं मिला होता. न उनके रिश्ते की गहराई पता चलती है और न ही ये समझ आता है कि आखिर अनिकेत को स्टेज पर सबके सामने पूजा को प्रपोज करने का इतना हक किसने दे दिया?

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पूजा (मृणाल ठाकुर) और अनिकेत (विक्रांत सिंह चौहान) एक थिएटर प्ले में साथ काम करते हैं, जहां दोनों रोमियो-जूलियट का किरदार निभा रहे हैं. लेकिन असल जिंदगी में कहानी कुछ और ही है. अनिकेत अचानक पूजा को सबके सामने प्रपोज कर देता है. पूजा को उसका ये अंदाज बिल्कुल पसंद नहीं आता, क्योंकि वह अनिकेत की गर्लफ्रेंड तक नहीं है. पूजा साफ कहती है कि वह किसी और के साथ रहना चाहती है. इसके बाद वह फूलों का गुलदस्ता फेंक देती है, अंगूठी वापस करती है और अनिकेत को वहां से दफा होने तक कह देती है.

अब यहां तक तो मामला एकतरफा प्यार और रिजेक्शन का लगता है, लेकिन इसके बाद कहानी ऐसा मोड़ लेती है, जो पूजा की जिंदगी पूरी तरह बदल देता है. अनिकेत एक जुनूनी आशिक है, जिसे पूजा का 'ना' किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं. वह एक बेहद खौफनाक कदम उठा लेता है और अपनी जान दे देता है. इसके बाद शुरू होता है असली तमाशा

जिस लड़की ने न तो उसे प्यार का वादा किया था और न ही उसकी मौत के लिए कोई जिम्मेदार थी, उसी पूजा को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया जाता है. यहीं से फिल्म एक बेहद जरूरी सवाल उठाती है- क्या किसी के प्यार को ठुकराना भी गुनाह है? और अगर कोई इंसान आपके इनकार को बर्दाश्त नहीं कर पाता, तो उसकी हरकतों की सजा आपको क्यों मिले?

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मुद्दा दमदार है, लेकिन फिल्म इसे जिस तरह पेश करती है, वहां काफी कुछ अधूरा रह जाता है.

पूजा मेरी जान का एक सीन

मजबूत कहानी, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले ने बिगाड़ा खेल

मेरे हिसाब से 'पूजा मेरी जान' की सबसे बड़ी परेशानी इसकी जल्दबाजी है. फिल्म शुरुआत में ही इतने बड़े विवाद पर पहुंच जाती है कि दर्शकों को किरदारों से जुड़ने का मौका ही नहीं मिलता. अगर मेकर्स पूजा और अनिकेत के रिश्ते को थोड़ा और समय देते, उनके बीच की परिस्थितियों को बेहतर तरीके से दिखाते, तो अनिकेत के जुनून और पूजा की परेशानी का असर कहीं ज्यादा गहरा हो सकता था.

पूजा की गिरफ्तारी के बाद कहानी जेल पहुंचती है. यहां एक महिला की जिंदगी अचानक कैसे बदल जाती है, समाज उसे किस नजर से देखने लगता है और जेल की चारदीवारी के भीतर वह किस मानसिक और भावनात्मक दौर से गुजरती है- ये सब दिखाने का शानदार मौका था.

लेकिन अफसोस, जेल के सीन इतने सपाट हैं कि पूजा की बेबसी, डर और अकेलेपन का एहसास ठीक से हो ही नहीं पाता. एक आम महिला का अचानक आरोपी बन जाना अपने आप में बहुत बड़ा झटका है. मगर फिल्म इस बदलाव की गंभीरता को पूरी तरह पकड़ने में नाकाम रहती है. इसके बाद कहानी कोर्टरूम पहुंचती है, जहां जतिन (विजय राज) और सना (हुमा कुरैशी) कानूनी लड़ाई लड़ते नजर आते हैं. यहां कहानी में थोड़ी रफ्तार जरूर आती है, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले की परेशानी बनी रहती है.

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मृणाल ठाकुर, हुमा कुरैशी और विजय राज: किसने जीता दिल?

फिल्म में मृणाल ठाकुर और हुमा कुरैशी जैसी दमदार एक्ट्रेसेज हों, तो उम्मीदें अपने आप बढ़ जाती हैं. लेकिन यहां मामला थोड़ा उल्टा पड़ जाता है. कलाकार अपनी तरफ से पूरी कोशिश करते हैं, मगर कमजोर लेखन उनके अभिनय को खुलकर सामने आने ही नहीं देता.

मृणाल ठाकुर पूजा के किरदार में जंचती हैं. उनके चेहरे पर परेशानी, डर और बेबसी साफ नजर आती है. एक ऐसी महिला, जो अचानक खुद को एक ऐसे मामले में फंसा हुआ पाती है, जिसकी उसने कल्पना तक नहीं की थी- मृणाल इस दर्द को अपने अभिनय से महसूस कराने की कोशिश करती हैं. लेकिन किरदार की कमजोर लिखावट उनके रास्ते में आ जाती है. खासकर फिल्म के पहले हिस्से में पूजा को खुद को साबित करने और एक मजबूत किरदार के रूप में उभरने का पर्याप्त मौका नहीं मिलता.

हुमा कुरैशी ने निभाया उलझन में फंसी दोस्त का किरदार

हुमा कुरैशी सना के किरदार में ठीक लगती हैं. उनका किरदार एक अजीब कशमकश में फंसा हुआ है. एक तरफ उसका दोस्त अनिकेत है, जिसकी मौत हो चुकी है, तो दूसरी तरफ पूजा है, जो उसी मौत के मामले में जेल में बंद है. सना के सामने सवाल है कि वह अपने दोस्त के साथ खड़ी हो या उस महिला की मदद करे, जिसे इस पूरे मामले में आरोपी बना दिया गया है. हुमा इस अंदरूनी संघर्ष को अच्छे से पर्दे पर उतारती हैं. हालांकि उनका प्रदर्शन भी उनकी पिछली फिल्मों के स्तर तक नहीं पहुंच पाता.

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अब बात करते हैं विजय राज की, जो फिल्म के सबसे दिलचस्प पहलुओं में से एक हैं. वह जतिन नाम के वकील के किरदार में नजर आते हैं, जो अपनी सोच और व्यवहार से गहरे पुरुषवादी नजरिए को सामने लाता है. उनका किरदार कई बार आपको खीझ दिलाएगा, लेकिन यही उनके अभिनय की खासियत है.

विजय राज ने इस किरदार को जिस सहजता से निभाया है, वह फिल्म में जान डालता है. मेरे लिए तो वह इस फिल्म के सबसे यादगार कलाकार रहे.

डायरेक्शन और डायलॉग: यहां भी हुई चूक

'गिन्नी वेड्स सनी' के लेखक नवजोत गुलाटी ने इस फिल्म का निर्देशन किया है. फिल्म को दिनेश विजान और अमर कौशिक ने मैडॉक फिल्म्स के बैनर तले प्रोड्यूस किया है. रिलीज से पहले ही फिल्म को कई सालों की देरी का सामना करना पड़ा.

निर्देशक के तौर पर नवजोत गुलाटी की कोशिश ठीक है, लेकिन कमजोर कहानी और स्क्रीनप्ले फिल्म को लगातार पीछे खींचते हैं. फिल्म में कुछ डायलॉग ऐसे हैं, जो गंभीर मुद्दे को मजबूती देने के बजाय उसे हल्का कर देते हैं. जैसे- 'मुझे औरतों से प्रॉब्लम नहीं है, बुरी औरतों से प्रॉब्लम है.' ऐसे डायलॉग सुनकर लगता है कि जिस विषय पर फिल्म इतनी गंभीर बातचीत करना चाहती है, उसे और बेहतर तरीके से लिखा जा सकता था.

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पूजा मेरी जान का एक सीन

अगर कहानी में थोड़ी और गहराई होती, किरदारों को बेहतर तरीके से विकसित किया जाता और संवादों पर ज्यादा मेहनत की जाती, तो फिल्म का असर कहीं ज्यादा दमदार हो सकता था.

फिल्म की सबसे बड़ी ताकत और कमजोरी

फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका विषय है. एकतरफा प्यार, जुनून, सहमति यानी कंसेंट, महिलाओं को दोषी ठहराने की मानसिकता और समाज का महिलाओं के प्रति नजरिया- ये ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर खुलकर बात होनी चाहिए.

फिल्म वास्तविक जीवन की घटनाओं से प्रेरित परिस्थितियों के जरिए यह दिखाने की कोशिश करती है कि किसी महिला को किसी पुरुष के फैसलों और हरकतों के लिए किस तरह जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है. लेकिन समस्या ये है कि फिल्म का संदेश कई बार इसकी उलझी हुई कहानी के नीचे दब जाता है.

कुछ शांत और भावनात्मक दृश्य जरूर असर छोड़ते हैं. कलाकारों का अभिनय भी फिल्म को संभालने की कोशिश करता है. मगर इतने महत्वपूर्ण विषय के लिए सिर्फ अच्छे कलाकार और एक मजबूत संदेश काफी नहीं होते. कहानी और स्क्रीनप्ले का भी उतना ही मजबूत होना जरूरी है.

देखें या छोड़ दें?

कुल मिलाकर, 'पूजा मेरी जान' एक ऐसी फिल्म है, जो आपको सोचने पर मजबूर करने की कोशिश तो करती है, लेकिन खुद अपनी कहानी में उलझकर रह जाती है. फिल्म का विषय दमदार है, मृणाल ठाकुर और हुमा कुरैशी ने अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय करने की कोशिश की है और विजय राज तो अपने किरदार में खूब जमे हैं. लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले, जल्दबाजी में आगे बढ़ती कहानी और अधूरे इमोशनल सीन्स फिल्म का असर कम कर देते हैं.

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मेरे नजरिए से, 'पूजा मेरी जान' एक जरूरी मुद्दे पर बनी ऐसी फिल्म है, जिसे बेहतर कहानी और मजबूत राइटिंग के साथ कहीं ज्यादा प्रभावशाली बनाया जा सकता था. अगर आप मृणाल ठाकुर, हुमा कुरैशी और विजय राज की एक्टिंग के लिए फिल्म देखना चाहते हैं, तो इसे मौका दे सकते हैं. लेकिन अगर आप एक दमदार कोर्टरूम ड्रामा और गहराई से लिखी गई कहानी की उम्मीद कर रहे हैं, तो फिल्म आपको निराश कर सकती है.

क्योंकि प्यार में 'ना' सुनना मुश्किल हो सकता है, लेकिन किसी की 'ना' को स्वीकार करना भी उतना ही जरूरी है. और यही बात फिल्म जितनी मजबूती से कहना चाहती है, उतनी मजबूती से पर्दे पर कह नहीं पाती.

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