scorecardresearch
 

नसीरुद्दीन शाह अचानक कैसे बन गए दिमागी नक्सल?

नसीरुद्दीन शाह ने बीते दो दिनों में दो बार खुद को 'दिमागी नक्सल' कहा है. इस सवाल का जवाब उनके हालिया बयान की राजनीतिक पृष्ठभूमि में छिपा है. यह सरकार, शिक्षा संस्थानों और छात्रों के साथ हो रहे व्यवहार को लेकर उनकी नाराजगी का इजहार है.

Advertisement
X
फिर चर्चा में नसीरुद्दीन शाह (Photo: Instagram/@naseeruddin49)
फिर चर्चा में नसीरुद्दीन शाह (Photo: Instagram/@naseeruddin49)

हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता नसीरुद्दीन शाह एक बार फिर अपनी बेबाक राजनीतिक विचारों को लेकर चर्चा में हैं. पद्म श्री और पद्म भूषण से सम्मानित शाह लंबे समय से सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर अपनी राय खुलकर रखते रहे हैं. लेकिन उनका एक बयान अब उन्हें फिर चर्चा में ले आया है. उन्होंने अब खुद को खुलकर दिमागी नक्सल बता दिया है. लेकिन सवाल है कि आखिर नसीरुद्दीन ने अचानक खुद को दिमागी नक्सल बताना क्यों शुरू कर दिया?

नसीरुद्दीन शाह ने बीते दो दिनों में दो बार खुद को 'दिमागी नक्सल' कहा है. इस सवाल का जवाब उनके हालिया बयान की राजनीतिक पृष्ठभूमि में छिपा है. यह सरकार, शिक्षा संस्थानों और छात्रों के साथ हो रहे व्यवहार को लेकर उनकी नाराजगी का इजहार है. शाह ने 27 अक्टूबर को फेसबुक पर शेयर किए गए एक वीडियो में खुद को गर्व से 'दिमागी नक्सल' बताया. उनके इस बयान के पीछे जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्रसंघ की बहाली की मांग कर रहे छात्रों के समर्थन से लेकर सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट (SRFTI) में चल रहे विरोध प्रदर्शन तक कई मुद्दे हैं. शाह ने इन घटनाओं को युवाओं की आवाज, शिक्षा व्यवस्था और लोकतंत्र से जुड़े बड़े सवालों के तौर पर पेश किया है. 

आखिर 'दिमागी नक्सल' कहने के पीछे क्या है वजह?

Advertisement

नसीरुद्दीन शाह के बयान को समझने के लिए पहले यह समझना जरूरी है कि 'दिमागी नक्सल' शब्द का इस्तेमाल किस संदर्भ में किया जा रहा है. इसका इस्तेमाल अक्सर उन लोगों के लिए किया जाता है, जिन पर नक्सली विचारधारा का समर्थन करने या व्यवस्था के खिलाफ वैचारिक विरोध को बढ़ावा देने का आरोप लगाया जाता है. इस वजह से नसीर ने इसका इस्तेमाल करते हुए उन लोगों पर तंज किया है, जो सरकार की आलोचना करने वालों को 'राष्ट्रविरोधी' और 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' जैसे नाम देते हैं. यानी जिस शब्द को वह अपने खिलाफ लगाए जाने वाले आरोपों की तरह देखते हैं, उसी को उन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वीकार करके चुनौती देने का रास्ता चुना. 

इस विवाद में सबसे तीखी प्रतिक्रिया केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू की ओर से आई. उन्होंने नसीरुद्दीन शाह को 'खतरनाक अर्बन दिमागी नक्सल' बताते हुए उनके विचारों को भारतीय लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह करार दिया. रिजिजू ने सोशल मीडिया पर लिखा कि वह पहले शाह का सम्मान करते थे, लेकिन उन्हें उनके वास्तविक चरित्र का अंदाजा देर से हुआ. यह प्रतिक्रिया इसलिए अहम है, क्योंकि नसीरुद्दीन ने अपने बयान में सरकार पर ही लोकतंत्र को खतरे में डालने और युवाओं का हौसला तोड़ने का आरोप लगाया था.

Advertisement

फिल्म जगत से भी इस बयान पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आई हैं. अभिनेता पुनीत इस्सर ने शाह की आलोचना करते हुए उन पर चुनिंदा मुद्दों पर बोलने का आरोप लगाया. उन्होंने शाह को अपना सीनियर, शिक्षक और सम्मानित कलाकार बताया, लेकिन सवाल किया कि जब वह सरकार की आलोचना करते हैं, तो उन लोगों के खिलाफ भी क्यों नहीं बोलते जिन्हें इस्सर देश को बांटने वाला मानते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि अगर नसीर मौजूदा सरकार से सहमत नहीं हैं, तो उन्हें चुनाव लड़कर अपनी विचारधारा के आधार पर सरकार बदलने की कोशिश करनी चाहिए. 

महाराष्ट्र के मंत्री नितेश राणे ने और तीखा हमला बोलते हुए उनके मानसिक संतुलन पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि बात यह है कि नसीरुद्दीन शाह एक मेंटली नक्सली हैं. उन्हें पाकिस्तान की स्क्रिप्ट पढ़ने के लिए पैसे मिलते हैं. अब फिल्मों में तो उनके पास ज्यादा काम बचा नहीं है. पहले जाकर उनसे यह तो पूछिए कि वे दिन में कितने घंटे होश में रहते हैं.

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

Shared post on

नसीरुद्दीन शाह के ताजा बयान की वजह जामिया मिल्लिया इस्लामिया में चल रहा छात्र आंदोलन है. छात्र लंबे समय से बंद पड़े छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग कर रहे हैं. विश्वविद्यालय में वर्ष 2006 के बाद से छात्र संघ के चुनाव नहीं हुए हैं. छात्रों की मांग है कि चुनाव की तारीख तय की जाए और छात्र संघ के संविधान को मंजूरी देने की प्रक्रिया स्पष्ट की जाए. विश्वविद्यालय प्रशासन ने करीब दो दशक बाद चुनाव बहाल करने की बात स्वीकार की है, लेकिन प्रदर्शनकारी छात्रों की मांग है कि इसके लिए स्पष्ट समयसीमा भी तय हो.

Advertisement

इस आंदोलन के समर्थन में नसीरुद्दीन ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए सवाल उठाया कि आखिर देश के युवाओं का हौसला तोड़ने की कोशिशें कब तक जारी रहेंगी. उनके बयान का केंद्र सिर्फ छात्रसंघ चुनाव नहीं, बल्कि छात्रों को अपनी मांग रखने और संस्थानों में लोकतांत्रिक भागीदारी का अधिकार देने का सवाल भी है. 

नसीरुद्दीन ने आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया?

नसीरुद्दीन शाह के हालिया बयान की भाषा और अंदाज को देखें, तो इतना जरूर कहा जा सकता है कि वह अपने राजनीतिक विचारों को लेकर पीछे हटते नजर नहीं आ रहे. उन्होंने सिर्फ सरकार की आलोचना नहीं की, बल्कि 'दिमागी नक्सल' जैसे टर्म को अपने लिए स्वीकार करते हुए उसे गर्व से इस्तेमाल किया. इसके जरिए उन्होंने उन लेबल्स को चुनौती दी है, जो उनके मुताबिक सरकार से असहमति जताने वालों पर लगाए जाते हैं. यह उनके विरोध को ज्यादा मुखर और टकरावपूर्ण बनाता है. 

इस पूरे विवाद में सबसे अहम बात यह है कि नसीरुद्दीन शाह जामिया, जेएनयू और SRFTI के छात्रों के मुद्दों को लोकतंत्र और शिक्षा व्यवस्था से जोड़ रहे हैं. दूसरी ओर, उनके आलोचकों का सवाल है कि क्या वह सभी राष्ट्रीय मुद्दों पर समान रूप से बोलते हैं और क्या उनकी टिप्पणियां देशहित के प्रति संवेदनशील हैं. इन दोनों पक्षों के बीच असली बहस असहमति की सीमा, सरकार की आलोचना के अधिकार और राजनीतिक भाषा की जिम्मेदारी को लेकर है. उन्होंने बेशक एक विवादित टर्म को अपनाकर बहस को और तीखा कर दिया है, लेकिन अब देखना यह होगा कि वह अपने अगले बयानों में इस विरोध को किस दिशा में ले जाते हैं.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Latest News in Hindi »
Advertisement