फिल्मों में हीरो आते हैं, जाते हैं, लेकिन कुछ विलेन ऐसे होते हैं, जिनका चेहरा और अंदाज सालों तक दर्शकों के दिलों-दिमाग में बस जाता है. प्रदीप रावत उन्हीं कलाकारों में से एक थे. उनके चेहरे का खौफ, भारी आवाज और दमदार स्क्रीन प्रेजेंस ने उन्हें भारतीय सिनेमा के सबसे यादगार विलेन्स में शामिल कर दिया.
आज प्रदीप रावत हमारे बीच नहीं हैं. पांच साल तक ब्लड कैंसर से लड़ने के बाद उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया. लेकिन उनका सफर सिर्फ एक सफल विलेन बनने की कहानी नहीं था, बल्कि संघर्ष, धैर्य और कभी हार न मानने वाले एक कलाकार की मिसाल भी था.
जबलपुर से शुरू हुआ सपनों का सफर
मध्य प्रदेश के जबलपुर में जन्मे प्रदीप रावत के लिए फिल्म इंडस्ट्री तक पहुंचना बिल्कुल आसान नहीं था. मुंबई आने के बाद उन्हें लगातार रिजेक्शन का सामना करना पड़ा. लंबे-चौड़े शरीर और तेज-तर्रार चेहरे की वजह से उन्हें अक्सर एक जैसे किरदार ऑफर होते थे, लेकिन बड़ा मौका मिलने का इंतजार लंबा था.
इसी दौरान उनकी पर्सनैलिटी पर दिग्गज फिल्ममेकर बीआर चोपड़ा की नजर पड़ी और उनकी जिंदगी बदल गई.
'महाभारत' के अश्वत्थामा ने बदल दी किस्मत
साल 1988 में बीआर चोपड़ा के ऐतिहासिक टीवी शो 'महाभारत' में प्रदीप रावत को अश्वत्थामा का किरदार मिला. यह उनका पहला बड़ा ब्रेक था. उस दौर में 'महाभारत' देश के लगभग हर घर में देखा जाता था और अश्वत्थामा के किरदार ने उन्हें पहचान दिला दी. यहीं से फिल्मों के दरवाजे खुलने लगे.
फिल्मों में शुरुआत हुई, लेकिन पहचान नहीं मिली
प्रदीप रावत ने फिल्मों में 1985 की 'मेरी जंग' से कदम रखा था. इसके बाद वह कोयला, बागी, मेजर साब, सरफरोश, अग्निपथ, लगान जैसी कई बड़ी फिल्मों में नजर आए. हालांकि, इन फिल्मों में उन्हें ज्यादातर छोटे या सहायक किरदार ही मिले. बड़े बैनर की फिल्मों का हिस्सा बनने के बावजूद उन्हें वह पहचान नहीं मिल रही थी, जिसके वह हकदार थे. कई बार ऐसा दौर भी आया जब करियर चलाने के लिए उन्हें छोटे रोल स्वीकार करने पड़े.
'स्ये' ने रातों-रात बना दिया साउथ का सबसे बड़ा विलेन
साल 2004 में आई एस.एस. राजामौली की तेलुगु फिल्म 'Sye' प्रदीप रावत के करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई. उन्होंने फिल्म में भिक्षु यादव का किरदार निभाया. उनकी खतरनाक मुस्कान, दमदार डायलॉग और रौबदार स्क्रीन प्रेजेंस ने दर्शकों को ऐसा प्रभावित किया कि आज भी भिक्षु यादव को तेलुगु सिनेमा के सबसे आइकॉनिक विलेन्स में गिना जाता है.
फिल्म की सफलता के बाद प्रदीप रावत साउथ इंडस्ट्री के सबसे डिमांड वाले विलेन बन गए. इसके बाद उन्होंने भद्रा, अंदरीवाडु, छत्रपति, लक्ष्मी जैसी सुपरहिट फिल्मों में लगातार यादगार किरदार निभाए. 'छत्रपति' में उनका रास बिहारी वाला रोल आज भी फैंस का पसंदीदा माना जाता है.
फिर आया 'गजनी'... जिसने इतिहास बदल दिया
साल 2005 में ए.आर. मुरुगदॉस की तमिल फिल्म 'गजनी' में प्रदीप रावत ने मुख्य विलेन का किरदार निभाया. फिल्म इतनी सफल रही कि बाद में इसका हिंदी रीमेक बना, जिसमें आमिर खान लीड रोल में नजर आए और प्रदीप रावत ने एक बार फिर गजनी का वही किरदार निभाया. दिलचस्प बात यह है कि फिल्म का नाम ही उनके किरदार 'गजनी' पर रखा गया था.
साल 2008 में रिलीज हुई हिंदी 'गजनी' बॉलीवुड की पहली 100 करोड़ रुपये कमाने वाली फिल्म बनी. आमिर खान के ट्रांसफॉर्मेशन के साथ-साथ प्रदीप रावत के खूंखार विलेन को भी दर्शकों ने खूब पसंद किया. आज भी 'गजनी' का जिक्र होते ही उनका चेहरा लोगों के सामने आ जाता है.
विलेन ही नहीं, कॉमेडी में भी दिखाया दम
ज्यादातर लोग उन्हें सिर्फ खतरनाक विलेन के रूप में याद करते हैं, लेकिन प्रदीप रावत ने कई फिल्मों में अपनी शानदार कॉमिक टाइमिंग भी दिखाई. 'ओए', 'पूलारंगाडु', 'नेनु शैलजा' और 'सर्रैनोडु' जैसी फिल्मों में उन्होंने साबित किया कि वह सिर्फ डराना ही नहीं, बल्कि दर्शकों को हंसाना भी जानते हैं.
धीरे-धीरे पर्दे से दूर हो गए
एक समय ऐसा था जब तेलुगु सिनेमा की बड़ी एक्शन फिल्मों में प्रदीप रावत लगभग तय माने जाते थे. लेकिन समय के साथ उन्होंने धीरे-धीरे हिंदी और दक्षिण भारतीय फिल्मों से दूरी बना ली. नए कलाकार आए, इंडस्ट्री बदली और प्रदीप रावत भी लाइमलाइट से दूर होते चले गए.
फिर भी फैंस का मानना रहा कि उन्हें उनके टैलेंट के मुकाबले कभी वह सम्मान और बड़े किरदार नहीं मिले, जिसके वह हकदार थे.
एक ऐसा विलेन... जिसे भुलाया नहीं जा सकेगा
प्रदीप रावत ने कभी सुपरस्टार बनने का दावा नहीं किया, लेकिन उन्होंने यह जरूर साबित किया कि एक मजबूत कलाकार बिना हीरो बने भी इतिहास रच सकता है. अश्वत्थामा, भिक्षु यादव, गजनी और रास बिहारी जैसे किरदार सिर्फ फिल्मी रोल नहीं हैं, बल्कि भारतीय सिनेमा की यादगार विरासत का हिस्सा हैं.
उनके निधन से परिवार गमगीन है. वो अपने पीछे पत्नी और दो बेटों को रोता-बिलखता छोड़ गए हैं. आज भले ही वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन जब भी भारतीय सिनेमा के सबसे दमदार विलेन्स की बात होगी, प्रदीप रावत का नाम हमेशा सम्मान के साथ लिया जाएगा.
अलविदा प्रदीप रावत... आपने साबित किया कि असली पहचान हीरो बनने से नहीं, बल्कि अपने किरदार को अमर बनाने से मिलती है.