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जब-जब बदला हिंदुस्तान, तब-तब बदला सिनेमा, आजादी के पर्दे की कहानी

भारतीय सिनेमा की कहानी 15 अगस्त 1947 से शुरू नहीं होती. आजाद भारत से बहुत पहले गुलाम भारत की जमीन पर एक ऐसी दुनिया आकार ले रही थी,  जो आने वाले दशकों में करोड़ों लोगों की कल्पनाओं, भावनाओं और सपनों का हिस्सा बनने वाली थी.

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भारतीय सिनेमा का इतिहास आजादी से भी पुराना है. (Photo: ITG)
भारतीय सिनेमा का इतिहास आजादी से भी पुराना है. (Photo: ITG)

आजाद मुल्क के तौर पर हम 80 साल के हो गए हैं. यह समय सिर्फ एक देश के राजनीतिक सफर को पीछे मुड़कर देखने का नहीं है बल्कि उस सांस्कृतिक सफर को समझने का भी है, जिसमें भारतीय सिनेमा ने देश के साथ-साथ खुद को भी लगातार गढ़ा है. आजादी के बाद जिस तरह भारत का स्वरूप बदलता गया, सिनेमा भी लगातार बदला. कभी वह देश के सपनों की आवाज बना, कभी उसकी बेचैनियों का आईना, कभी मनोरंजन का सबसे बड़ा माध्यम तो कभी सत्ता, समाज, जाति, वर्ग और जेंडर से सवाल करने वाली आवाज.

लेकिन भारतीय सिनेमा की कहानी 15 अगस्त 1947 से शुरू नहीं होती. आजाद भारत से बहुत पहले गुलाम भारत की जमीन पर एक ऐसी दुनिया आकार ले रही थी,  जो आने वाले दशकों में करोड़ों लोगों की कल्पनाओं, भावनाओं और सपनों का हिस्सा बनने वाली थी. भारत ने पहली बार सात जुलाई 1896 को पर्दे पर चलती तस्वीरों का जादू देखा. मुंबई के वॉटसन होटल में फ्रांसीसी लुमिएर बंधुओं के प्रतिनिधि मैरियस सेस्तिए ऐसी मशीन लेकर पहुंचे थे, जो पर्दे पर चलती तस्वीरें दिखा सकती थी. भारत पहली बार एक ऐसे माध्यम से परिचित हो रहा था, जो आने वाले दशकों में उसकी संस्कृति, कल्पना और सामूहिक स्मृति का अहम हिस्सा बनने वाला था.

फिर आया साल 1913, जब दादासाहेब फाल्के ने राजा हरिश्चंद्र बनाई. इसे भारत की पहली फुल लेंथ फीचर फिल्म माना जाता है. फाल्के के पास न कोई स्थापित फिल्म उद्योग था, न कोई तैयार ढांचा और न ही फिल्मों की कोई विकसित परंपरा. उनके सामने तकनीकी मुश्किलें थीं, पैसे की कमी थी और सामाजिक बंदिशें भी थीं. फिर भी उन्होंने लगभग शून्य से भारतीय फिल्म निर्माण की नींव रख दी. राजा हरिश्चंद्र सिर्फ एक फिल्म नहीं थी. वह इस बात का प्रमाण था कि भारत अपनी कहानियां खुद भी पर्दे पर कह सकता है.

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उस दौर की मुश्किलें कम नहीं थी. फिल्मों में महिलाओं का अभिनय करना सामाजिक रूप से स्वीकार्य नहीं था. लिहाजा महिला किरदारों की भूमिका भी पुरुष कलाकार निभाते थे. राजा हरिश्चंद्र में रानी तारामती की भूमिका अन्ना सालुंके ने निभाई थी यानी जिस सिनेमा में आज अभिनेत्रियां स्टारडम और बॉक्स ऑफिस सफलता की बड़ी ताकत हैं, उसकी शुरुआत एक ऐसे दौर से हुई थी जब पर्दे पर किसी महिला का आना भी सामाजिक रूप से असाधारण माना जाता था.

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भारत की पहली फुल लेंथ फिल्म राजा हरिश्चंद्र का एक दृश्य (Photo: Wikipedia)

यही भारतीय सिनेमा की पहली विडंबना थी कि जिस माध्यम ने आगे चलकर समाज की बदलती तस्वीर को सबसे ज्यादा दर्ज किया. उसकी शुरुआत खुद एक बेहद संकोची समाज के बीच हुई थी. फाल्के के बाद सिनेमा धीरे-धीरे प्रयोग से कारोबार की तरफ बढ़ा. 1920 के दशक तक फिल्म निर्माण एक उभरते हुए उद्योग का रूप लेने लगा. पौराणिक कथाएं, ऐतिहासिक प्रसंग और लोककथाएं पर्दे पर आने लगीं. इसका एक कारण यह भी था कि इन कहानियों में भारतीय दर्शकों के लिए परिचित दुनिया मौजूद थी. सिनेमा विदेशी तकनीक थी, लेकिन कहानियां अपनी थीं.

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फिर 1931 में आलम आरा ने भारतीय सिनेमा को आवाज दे दी. मूक फिल्मों के दौर का अंत हुआ और बोलती फिल्मों का युग शुरू हुआ. पर्दे पर अब सिर्फ चेहरे नहीं थे बल्कि संवाद भी थे, गाने थे, आवाजें थीं. भारतीय सिनेमा की सबसे विशिष्ट पहचान संगीत यहीं से उसके डीएनए का स्थायी हिस्सा बनने लगा.

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केएल. सहगल

इसके बाद सिनेमा तेजी से बदलता गया. स्टूडियो बनने लगे, सितारों की पहचान बनने लगी और फिल्में एक बड़े कारोबारी उद्योग में तब्दील होने लगी. लेकिन देश भी बदल रहा था. स्वतंत्रता आंदोलन तेज हो रहा था. औपनिवेशिक शासन के खिलाफ संघर्ष बढ़ रहा था. ऐसे समय में सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं रह सकता था. पर्दे पर कही गई कहानियों में भी उस दौर की बेचैनी, उम्मीद और राष्ट्र की कल्पना कहीं न कहीं मौजूद थी. अछूत कन्या, औरत जैसी फिल्मों ने पर्दे पर समाज के उन सवालों को जगह दी जिन्हें सामान्य जीवन में दबा दिया जाता था. केएल. सहगल भारतीय सिनेमा के उन शुरुआती सितारों में शामिल थे, जिन्होंने अभिनय और गायकी दोनों को मिलाकर स्टारडम की एक नई परिभाषा गढ़ी. उन्हें अक्सर भारतीय सिनेमा का पहला बड़ा सिंगिंग स्टार कहा जाता है.

1947 में मुल्क आजाद हुआ तो भारतीय सिनेमा भी एक नए मोड़ पर खड़ा था. अब सवाल सिर्फ यह नहीं था कि फिल्में कैसी होंगी? सवाल यह भी था कि आजाद भारत खुद को पर्दे पर किस रूप में देखना चाहता है? 1950 और 1960 के दशक में सिनेमा ने इस सवाल का जवाब बखूबी दिया. देश गरीबी, बेरोजगारी, विस्थापन और असमानता से जूझ रहा था, लेकिन उसके भीतर एक नए राष्ट्र के निर्माण का सपना भी था. इसी दौर में राज कपूर, गुरु दत्त, बिमल रॉय, महबूब खान जैसे फिल्मकारों ने आम आदमी, गरीबी, शहर, गांव, प्रेम और सामाजिक असमानता को अपनी कहानियों के केंद्र में रखा. दो बीघा जमीन, मदर इंडिया, श्री 420, प्यासा, आवारा, कागज के फूल, नया दौर और सुजाता जैसी फिल्मों में गरीबी, वर्गभेद, किसान, मजदूर, नैतिक संघर्ष और बदलते भारत की तस्वीर दिखाई दी. सिनेमा अब सिर्फ पर्दे पर कहानी नहीं सुना रहा था, वह देश से पूछ रहा था कि आजादी का मतलब आखिर किसके लिए क्या है? उस समय फिल्म का नायक अक्सर करोड़पति या सुपरहीरो नहीं होता था. वह रिक्शावाला, मजदूर, किसान, बेरोजगार युवक या व्यवस्था से लड़ता हुआ आम आदमी था.

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इसी दौर में भारतीय सिनेमा की एक दूसरी धारा भी दुनिया के सामने आई. पचास के दशक में सत्यजीत रे की पाथेर पांचाली ने भारतीय फिल्मों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई. बाद में ऋत्विक घटक, बिमल रॉय और दूसरे फिल्मकारों की फिल्मों ने यह साबित किया कि भारतीय सिनेमा सिर्फ गीत-संगीत और मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि गंभीर कला का माध्यम भी हो सकता है. यहीं से आगे चलकर समानांतर या आर्ट सिनेमा की जमीन मजबूत हुई.

मुख्यधारा की हिंदी फिल्मों में गीत, प्रेम, परिवार, त्याग और भावनाओं का संसार लगातार मजबूत होता गया. यानी भारतीय सिनेमा एक साथ दो दिशाओं में बढ़ रहा था. एक तरफ दर्शकों का मनोरंजन करने वाला लोकप्रिय सिनेमा और दूसरी तरफ समाज को आईना दिखाने वाला यथार्थवादी सिनेमा. 1960 का दशक आया तो भारतीय फिल्मों का रंग और भव्यता दोनों बढ़ने लगे. तकनीक बेहतर हुई, विदेशी लोकेशन और बड़े सेट दिखाई देने लगे और फिल्मी रोमांस ने एक नया रूप लिया.

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दिलीप कुमार, राज कपूर और देव आनंद

दिलीप कुमार, राज कपूर और देव आनंद की त्रिमूर्ति के बाद राजेश खन्ना का दौर आया और भारतीय सिनेमा में सुपरस्टार शब्द को एक नया अर्थ मिला. राजेश खन्ना की जबरदस्त लोकप्रियता ने यह साबित किया कि दर्शक अब सिर्फ फिल्म की कहानी नहीं, बल्कि स्टार को देखने के लिए भी सिनेमाघर जा सकता है. संगीत भारतीय फिल्म उद्योग का आर्थिक और सांस्कृतिक दोनों स्तरों पर सबसे शक्तिशाली हिस्सा बन चुका था.

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1970 का दशक राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल का दौर था. बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार और व्यवस्था के प्रति लोगों का गुस्सा बढ़ रहा था. इसी बेचैनी ने पर्दे पर एंग्री यंग मैन को जन्म दिया, जिसे बाद में सिनेमा का सबसे बड़ा जननायक कहा गया. रोमांटिक राजेश खन्ना की जगह गुस्से से भरा अमिताभ बच्चन जंजीर, दीवार, शोले, त्रिशूल, मुकद्दर का सिकंदर जैसी फिल्मों से एंग्री यंग मैन का चेहरा बना हुआ था. 

यह वह नायक था जो व्यवस्था से परेशान था, अन्याय का विरोध करता था और अपने दम पर दुनिया से लड़ता था. सलीम-जावेद की जोड़ी ने इस दौर में नायक को सिर्फ प्रेम करने वाले युवक से निकालकर सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ खड़े व्यक्ति में बदल दिया. यही वह समय था जब मसाला फिल्म भारतीय लोकप्रिय सिनेमा की सबसे बड़ी पहचान बन गई. एक ही फिल्म में एक्शन, रोमांस, कॉमेडी, परिवार, बदला, भावनाएं सब कुछ था. 

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कुली फिल्म के एक दृश्य में अमिताभ बच्चन

लेकिन 1970 और 1980 के दशक की कहानी सिर्फ अमिताभ बच्चन और मसाला फिल्मों की नहीं थी. इसी समय समानांतर सिनेमा ने भी अपनी मजबूत पहचान बनाई. श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, मणि कौल और बाद में सईद अख्तर मिर्जा जैसे फिल्मकारों ने गांव, मजदूर, राजनीति, जाति, वर्ग और आम आदमी की वास्तविक जिंदगी को पर्दे पर उतारा.

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नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, स्मिता पाटिल, शबाना आजमी जैसे कलाकारों ने अभिनय की एक ऐसी परंपरा बनाई जिसमें स्टार बनने से ज्यादा किरदार को जीना ज्यादा महत्वपूर्ण था. इस दौर में भारतीय सिनेमा के भीतर ही दो संसार दिखाई देने लगे. 1980 का दशक आते-आते सिनेमा के सामने एक नई चुनौती भी आ गई टेलीविजन. दूरदर्शन घर-घर पहुंचने लगा. अब मनोरंजन के लिए हर बार सिनेमाघर जाना जरूरी नहीं था. हम लोग, बुनियाद, रामायण और महाभारत जैसे धारावाहिकों ने भारतीय दर्शकों को नया अनुभव दिया. परिवार एक साथ टीवी के सामने बैठने लगा. सिनेमा को पहली बार अपने घर के भीतर आए एक ऐसे माध्यम से मुकाबला करना पड़ा जो टिकट नहीं मांगता था. इसके साथ ही वीडियो कैसेट और वीडियो पार्लर ने फिल्मों को सिनेमाघर से निकालकर घर-घर तक पहुंचाना शुरू कर दिया. 

1990 का दशक भारतीय सिनेमा के लिए शायद सबसे निर्णायक मोड़ों में से एक था. आर्थिक उदारीकरण के बाद भारत की अर्थव्यवस्था और उपभोक्ता संस्कृति बदली तो फिल्मों की दुनिया भी बदल गई. शाहरुख खान, आमिर खान, सलमान खान जैसे नए सितारे सामने आए. दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, हम आपके हैं कौन, कुछ कुछ होता है जैसी फिल्मों ने परिवार, प्रेम, विदेश में बसे भारतीय और नए मध्यम वर्ग की आकांक्षाओं को कहानी का केंद्र बनाया.

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दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे एक दृश्य में शाहरुख खान

हिंदी फिल्मों का युवा दर्शक अब सिर्फ भारत के छोटे शहरों में नहीं था. वह लंदन, न्यूयॉर्क, दुबई, कनाडा और दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी था. एनआरआई भारतीय सिनेमा का एक महत्वपूर्ण दर्शक और किरदार बन गए. फिल्मी नायक भी बदल गया. वह अब व्यवस्था से लड़ने वाला अकेला आदमी ही नहीं था, बल्कि करियर, प्रेम, परिवार और अपनी पहचान के बीच संतुलन तलाशता आधुनिक युवक था.

इसी दशक में सिनेमा देखने का तरीका भी बदलने लगा. पुराने सिंगल स्क्रीन थिएटर के साथ मल्टीप्लेक्स कल्चर धीरे-धीरे विकसित होने लगा. छोटे बजट की फिल्मों के लिए जगह बनी, नए कलाकार और नए फिल्मकार सामने आए. सिनेमा ने उन कहानियों की तरफ देखना शुरू किया जिन्हें लंबे समय तक मुख्यधारा के बाहर रखा गया था. छोटे शहर, दलित कहानियां, स्त्री की इच्छाएं, यौनिकता, मानसिक संघर्ष, हाशिए के समाज इन सबकी आवाजें धीरे-धीरे पर्दे पर ज्यादा आने लगीं.

2000 का दशक भारतीय सिनेमा के लिए सिर्फ नई सदी की शुरुआत नहीं था बल्कि तकनीक, कहानी और दर्शक तीनों के बदलने का दौर था. डिजिटल कैमरों ने शूटिंग की लागत और पूरी प्रक्रिया को बदलना शुरू किया. कंप्यूटर ग्राफिक्स, बेहतर साउंड रिकॉर्डिंग और विजुअल इफेक्ट्स ने फिल्मकारों के सामने संभावनाओं की एक नई दुनिया खोल दी. अब कैमरा सिर्फ विजुअल रिकॉर्ड करने का माध्यम नहीं था, बल्कि ऐसी दुनिया रचने का औजार बन गया था, जिसकी कल्पना पहले तकनीकी सीमाओं के कारण मुश्किल थी.

लेकिन इस दौर का सबसे बड़ा बदलाव सिर्फ तकनीक में नहीं, कहानियों में आया. लगान, दिल चाहता है, स्वदेस, रंग दे बसंती, तारे जमीन पर, ओमकारा, मकबूल जैसी फिल्मों ने दिखाया कि दर्शक एक ही तरह की कहानियों तक सीमित नहीं हैं. एक तरफ बड़े सितारों और बड़े बजट का सिनेमा था, तो दूसरी तरफ नई पीढ़ी के लेखक-निर्देशक छोटे और असामान्य विषयों को लेकर आगे आ रहे थे.

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क्षेत्रीय फिल्मों की सीमाएं टूटने लगीं (बाहुबली फिल्म का दृश्य)

इसी समय एक और बड़ा बदलाव हुआ. क्षेत्रीय सिनेमा की सीमाएं टूटने लगीं. पहले हिंदी सिनेमा को देश का सबसे बड़ा लोकप्रिय फिल्म उद्योग माना जाता था, लेकिन धीरे-धीरे तमिल, तेलुगू, मलयालम, कन्नड़ और मराठी सिनेमा की फिल्मों को देशभर में दर्शक मिलने लगे. बाहुबली ने यह साबित किया कि किसी तेलुगू फिल्म को हिंदी दर्शक भी उतने ही उत्साह से देख सकता है. इसके बाद केजीएफ, पुष्पा, आरआरआर, कांतारा जैसी फिल्मों ने पैन इंडिया सिनेमा शब्द को लोकप्रिय बना दिया.

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ओटीटी प्लेटफॉर्म ने कलाकारों को मौके दिए.

भारतीय सिनेमा का नक्शा अब सिर्फ मुंबई से तय नहीं होता. चेन्नई, हैदराबाद, बेंगलुरु, कोच्चि, कोलकाता, पुणे और देश के दूसरे फिल्म केंद्र भी राष्ट्रीय लोकप्रिय संस्कृति को प्रभावित करने लगे. लेकिन 2020 में कोरोना ने सिनेमा के उस मॉडल को हिला दिया जिसे दशकों से हम जानते थे. सिनेमाघर बंद हुए और दर्शक घरों तक सिमट गए. ओटीटी प्लेटफॉर्म तेजी से फिल्मों और वेब सीरीज के सबसे महत्वपूर्ण माध्यमों में शामिल हो गए. कहानी कहने का तरीका बदला. अब किसी कहानी को दो-ढाई घंटे की फिल्म में समेटना जरूरी नहीं था. वही कहानी अब आठ से दस एपिसोड की सीरीज बन सकती थी. कलाकारों के लिए भी अवसर बढ़े. ऐसे अभिनेता जिन्हें पहले स्टार के बराबर बॉक्स ऑफिस सफलता नहीं मिलने की वजह से सीमित भूमिकाएं मिलती थीं. अब वे ओटीटी पर लंबे और जटिल किरदारों में चमकने लगे. दर्शकों की पसंद भी बदली. वह सिर्फ बड़े सितारे नहीं, बल्कि अच्छी कहानी, मजबूत अभिनय और नए विषय देखने लगा. 

ओटीटी ने भाषा की दीवार भी काफी हद तक कमजोर कर दी. एक मलयालम फिल्म हिंदी दर्शक तक पहुंच सकती है. एक मराठी फिल्म देश के दूसरे हिस्से में देखी जा सकती है. इतना ही नहीं जापानी, कोरियाई या स्पेनिश सिनेमा भी भारतीय युवाओं के लिए आसानी से उपलब्ध हो सकता है. इसका असर भारतीय फिल्मकारों पर भी पड़ा. दर्शकों की अपेक्षाएं बढ़ीं. वह अब कहानी की तुलना सिर्फ दूसरी भारतीय फिल्मों से नहीं करता, बल्कि पूरी दुनिया के सिनेमा से करता है. 

भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि उसने सिर्फ भारत को बदलते हुए देखा नहीं, बल्कि हर दौर में उस बदलते भारत को पर्दे पर दर्ज भी किया. उसने देश के सपनों को आवाज दी, उसकी बेचैनियों को चेहरा दिया और उसकी सामाजिक हलचलों को कहानियों में तब्दील किया.

दादासाहेब फाल्के की राजा हरिश्चंद्र से शुरू हुई यह यात्रा आलम आरा, मदर इंडिया, शोले, दीवार, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, लगान, दंगल, बाहुबली और आरआरआर से होती हुई आज ओटीटी की दुनिया तक पहुंच चुकी है. यह सिर्फ फिल्मों के बदलने की कहानी नहीं है. यह भारत के बदलने की कहानी भी है. आज, जब भारत को आजाद हुए 80 साल हो चुके हैं. भारतीय सिनेमा भी अपनी एक सदी से ज्यादा लंबी विरासत के साथ खड़ा है.  

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