फिरोजाबाद जिले का सिरसागंज, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उपजाऊ मैदानों में व्यस्त आगरा-इटावा कॉरिडोर के किनारे बसा एक समृद्ध कृषि मंडी वाला कस्बा है. प्राचीन शूरसेन साम्राज्य और यादव परंपराओं से जुड़े ऐतिहासिक ब्रज क्षेत्र का हिस्सा होने के नाते, यह सदियों तक मुख्य रूप से खेती-बाड़ी वाला इलाका रहा और बाद में आसपास के ग्रामीण इलाकों के लिए एक महत्वपूर्ण मंडी के रूप में उभरा. आज, यह फिरोजाबाद लोकसभा क्षेत्र के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है. एक सामान्य, अनारक्षित निर्वाचन क्षेत्र होने और यहां के मतदाताओं में ग्रामीणों की बड़ी संख्या होने के कारण, सिरसागंज की राजनीति यादव, राजपूत और अनुसूचित जाति के प्रभावशाली समुदायों के इर्द-गिर्द घूमती है, जिससे यह जिले की सबसे चर्चित सीटों में से एक बन गई है.
सिरसागंज उन नई विधानसभा सीटों में से एक है जो परिसीमन आयोग के 2008 के आदेश से बनी थीं. इसमें पूरा सिरसागंज नगर बोर्ड, सिरसागंज कानूनगो सर्कल के सभी गांव और शिकोहाबाद कानूनगो सर्कल के कुछ गांव शामिल हैं. नगर बोर्ड होने के बावजूद, यहां के 90 प्रतिशत से अधिक मतदाता गांवों में रहते हैं, जिससे इस निर्वाचन क्षेत्र की पहचान मुख्य रूप से ग्रामीण है.
सिरसागंज में पहली बार 2009 के लोकसभा चुनाव और 2012 के पहले विधानसभा चुनाव में वोट डाले गए. तब से, यह समाजवादी पार्टी के सबसे भरोसेमंद निर्वाचन क्षेत्रों में से एक बन गया है. पार्टी ने इस क्षेत्र में हुए सभी तीन विधानसभा चुनाव जीते हैं और हर लोकसभा चुनाव में बढ़त बनाई है, हालांकि बीजेपी लगातार एक मजबूत चुनौती देने वाली पार्टी के रूप में उभरी है.
समाजवादी पार्टी के हरिओम यादव ने 2012 में पहला विधानसभा चुनाव जीता और बहुजन समाज पार्टी (BSP) के उम्मीदवार अतुल प्रताप सिंह को 40,015 वोटों से हराया. बीजेपी छठे स्थान पर रही और केवल 2.12 प्रतिशत वोट पाकर अपनी जमानत राशि भी गंवा बैठी.
2017 में राजनीतिक समीकरण काफी बदल गए. जहां हरिओम यादव ने बीजेपी उम्मीदवार जयवीर सिंह को 10,676 वोटों से हराकर समाजवादी पार्टी के लिए सीट बरकरार रखी, वहीं बीजेपी छठे स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंच गई और उसके वोट शेयर में भारी बढ़ोतरी हुई.
2022 के चुनाव से पहले, समाजवादी पार्टी ने हरिओम यादव को दोबारा टिकट नहीं दिया, जिसके बाद वे बीजेपी में शामिल हो गए और अपनी पुरानी पार्टी के खिलाफ चुनाव लड़ा. मौजूदा MLA को उम्मीदवार बनाने के बावजूद, BJP इस सीट पर समाजवादी पार्टी की पकड़ नहीं तोड़ पाई. सर्वेश सिंह यादव ने हरिओम यादव को 8,805 वोटों से हराकर समाजवादी पार्टी के लिए यह सीट बरकरार रखी. सर्वेश सिंह यादव को 96,224 वोट मिले, जबकि हरिओम यादव को 87,419 वोट मिले.
लोकसभा चुनावों के दौरान सिरसागंज विधानसभा क्षेत्र में वोटिंग का पैटर्न विधानसभा चुनावों के ट्रेंड जैसा ही रहा है. जब से यह सीट बनी है, समाजवादी पार्टी ने यहां हुए सभी चार संसदीय चुनावों में बढ़त बनाई है. 2009 में इसने BSP पर 23,853 वोटों की बढ़त बनाई थी. मुख्य चुनौती देने वाली पार्टी के तौर पर BSP की जगह लेने के बाद, BJP ने समाजवादी पार्टी की बढ़त को 2014 के 73,365 वोटों से घटाकर 2019 में सिर्फ 7,326 वोट कर दिया, हालांकि 2024 में समाजवादी पार्टी ने यह अंतर फिर से बढ़ा दिया. समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार अक्षय यादव को 102,809 वोट मिले, जबकि BJP उम्मीदवार विश्वदीप सिंह को 69,385 वोट मिले, जिससे पार्टी को विधानसभा क्षेत्र में 33,424 वोटों की बढ़त मिली.
जब से यह सीट बनी है, तब से मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ी है. रजिस्टर्ड मतदाताओं की संख्या 2012 में 288,186 से बढ़कर 2017 में 305,946, 2019 में 319,091, 2022 में 321,298 और 2024 में 325,899 हो गई. वोटिंग में लोगों की भागीदारी अच्छी रही है, हालांकि लोकसभा चुनावों की तुलना में विधानसभा चुनावों में हमेशा ज्यादा वोटिंग होती है. वोटिंग प्रतिशत 2012 में 64.67%, 2017 में 66.38%, 2022 में 64.90%, 2019 में 58.03% और 2024 के संसदीय चुनाव के दौरान 57.93% रहा.
लगातार चुनावों में एक दिलचस्प चुनावी ट्रेंड सामने आया है. आमतौर पर, जब भी वोटिंग ज्यादा हुई है, बीजेपी ने बेहतर प्रदर्शन किया है, जबकि समाजवादी पार्टी ने तब अपनी बढ़त बढ़ाई है जब वोटिंग का प्रतिशत कम रहा है. यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या 2027 में भी यह ट्रेंड जारी रहता है.
सिरसागंज एक हिंदू-बहुसंख्यक निर्वाचन क्षेत्र है, जहां यादव सबसे बड़ा समुदाय हैं और कुल मतदाताओं में उनकी हिस्सेदारी लगभग 38.18 प्रतिशत है. यहां राजपूतों की आबादी लगभग 20.82 प्रतिशत है, जबकि अनुसूचित जातियों के मतदाताओं की संख्या लगभग 19.67 प्रतिशत है. मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 10.16 प्रतिशत है. हालांकि अकेले उनके दम पर चुनाव का नतीजा तय नहीं हो सकता, लेकिन वे आम तौर पर बीजेपी के मुख्य प्रतिद्वंद्वी के समर्थन में एकजुट रहे हैं. सिरसागंज नगरपालिका क्षेत्र में केवल 7.31 प्रतिशत मतदाता रहते हैं, जबकि 92.69 प्रतिशत मतदाता ग्रामीण इलाकों में हैं. इसलिए, खेती-किसानी से जुड़े स्थानीय मुद्दे ही यहां की राजनीतिक चर्चाओं में हावी रहते हैं.
सिरसागंज का इतिहास प्राचीन ब्रज क्षेत्र से जुड़ा है और यह प्राचीन भारत के 16 महाजनपदों में से एक, शूरसेन महाजनपद का हिस्सा था. महाभारत और पुराणों में बताए गए भगवान कृष्ण और यदुवंशी कुलों से जुड़ी परंपराओं में यहां के आस-पास के ग्रामीण इलाकों का अहम स्थान है. उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी होने के कारण, यह इलाका सदियों से खेती-बाड़ी का केंद्र रहा है.
मध्यकाल में, सिरसागंज पर बारी-बारी से मुगलों, मराठों और बाद में अंग्रेजों का शासन रहा. ब्रिटिश शासन के दौरान, यह धीरे-धीरे आस-पास के खेती वाले इलाकों के लिए एक जरूरी बाजार बन गया. आजादी के बाद, खेती के उत्पादन में बढ़ोतरी, खासकर आलू और गेहूं की खेती ने इसे एक क्षेत्रीय व्यापार केंद्र के तौर पर और मजबूत किया. बाद में यह नगर पंचायत बना और 1989 में फिरोजाबाद जिला बनने के बाद, यह एक तहसील और जिले के अहम व्यापारिक केंद्रों में से एक के रूप में उभरा, जबकि इसका ग्रामीण स्वरूप भी बना रहा.
सिरसागंज, फिरोजाबाद से लगभग 28 किमी, मैनपुरी से करीब 40 किमी, आगरा से लगभग 55 किमी, इटावा से करीब 70 किमी और एटा से लगभग 90 किमी दूर है. आगरा के जरिए यमुना एक्सप्रेसवे तक पहुंचा जा सकता है, जिससे ग्रेटर नोएडा लगभग 165 किमी, नोएडा करीब 180 किमी और नई दिल्ली लगभग 215 किमी दूर है. आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे के जरिए लखनऊ लगभग 290 किमी दूर है.
खेती सिरसागंज की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. किसान मुख्य रूप से आलू, गेहूं, सरसों और धान की खेती करते हैं, जबकि बागवानी से भी स्थानीय लोगों की आमदनी होती है. यह शहर फिरोजाबाद जिले की अहम कृषि मंडियों में से एक है, जहां आस-पास के दर्जनों गांवों की उपज का व्यापार होता है. छोटी चावल मिलें, कोल्ड स्टोरेज, एग्रो-प्रोसेसिंग यूनिट, खाद के डीलर और ट्रांसपोर्ट का काम ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा देते हैं. कई निवासी रोजगार के लिए पास के फिरोजाबाद के कांच और चूड़ी उद्योग में भी जाते हैं.
सिरसागंज नेशनल हाईवे 19 के जरिए सड़क मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है, जो इसे आगरा, इटावा और कानपुर से जोड़ता है. सबसे नजदीकी बड़ा रेलवे स्टेशन शिकोहाबाद जंक्शन है, जो सिर्फ 10 किमी दूर है, जबकि फिरोजाबाद जंक्शन से भी रेल कनेक्टिविटी मिलती है. नियमित बस सेवाएं इस इलाके को आगरा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, इटावा और आस-पास के जिलों से जोड़ती हैं. पिछले कुछ सालों में यहां शिक्षण संस्थान, सरकारी अस्पताल, बैंक और कृषि सेवा केंद्र लगातार बढ़े हैं, लेकिन सिंचाई के बुनियादी ढांचे, ग्रामीण सड़कों, स्वास्थ्य सेवा और रोजगार के मौकों में सुधार अभी भी इस क्षेत्र की मुख्य विकास प्राथमिकताओं में शामिल हैं.
कागज पर देखा जाए तो समाजवादी पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव में साफ बढ़त के साथ उतर रही है. जब से यह निर्वाचन क्षेत्र बना है, तब से पार्टी ने यहां हुए हर विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की है और हर लोकसभा चुनाव में भी आगे रही है. फिर भी, आंकड़े एक दूसरी कहानी भी बताते हैं. बीजेपी ने 2012 में सिर्फ 2.12 प्रतिशत वोट पाने की स्थिति से आगे बढ़कर 2022 में 41.99 प्रतिशत वोट शेयर के साथ मुख्य चुनौती देने वाली पार्टी के तौर पर अपनी जगह बनाई है, जिससे समाजवादी पार्टी की जीत का अंतर घटकर सिर्फ 4.23 प्रतिशत अंक रह गया है. यह अंतर ऐसा नहीं है जिसे पाटा न जा सके. अगर बीजेपी गैर-यादव हिंदू समुदायों को एकजुट करने और अनुसूचित जाति के वोटरों के बीच अपनी पैठ बढ़ाने में कामयाब हो जाती है, तो वह उस जगह पर कड़ी चुनौती पेश कर सकती है जिसे अब तक समाजवादी पार्टी का गढ़ माना जाता रहा है. इसलिए, 2027 में सिरसागंज में एक और कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है, जिसमें समाजवादी पार्टी अपने शानदार रिकॉर्ड को बचाने की कोशिश करेगी, वहीं बीजेपी सालों से हो रही धीरे-धीरे बढ़त को चुनावी जीत में बदलने की कोशिश करेगी.
(अजय झा)
Hariom Yadav
BJP
Pankaj Mishra
BSP
Pratima Pal
INC
Nota
NOTA
Kedar Singh Kusawaha
BMUP
Capt. Amit Chauhan
AAAP
Shalini
IND
Jayveer Singh
IND
Hariom
IND
Sunil Kumar Lodhi
BKPP
Tukman Singh Yadav
ADJP
पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल ने मिर्जापुर के चुनार में घोषणा की कि उनकी नई पार्टी जननीति भारत आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में भाग लेगी. उन्होंने कहा कि पार्टी मजबूत उम्मीदवार मिलने पर सभी 403 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी.
उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर हुई गड़बड़ी के सामने आने के बाद निर्वाचन आयोग ने सख्त रुख अपनाया है. जांच के दौरान यह बात उजागर हुई कि बिना किसी फॉर्म 8 के आवेदन के ही 10,000 से अधिक मतदाताओं के नाम और उनके पिता के नाम में बदलाव कर दिए गए. चुनाव आयोग ने इस मामले को केवल एक लापरवाही नहीं बल्कि गंभीर अपराध माना है. इसके बाद संबंधित अधिकारियों और कंप्यूटर ऑपरेटरों के खिलाफ मामला दर्ज कर कानूनी कार्रवाई की गई है.
उत्तर प्रदेश में शनिवार को मतदाता सूची में नाम जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है. इस अभियान के तहत प्रदेश के सभी जिलों में सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक विशेष कैंप लगाए गए हैं.
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने भारतीय जनता पार्टी पर जोरदार हमला बोलते हुए कहा कि प्रदेश में शिक्षक और स्नातक मतदाता सरकार से बुरी तरह नाराज हैं. उन्होंने दावा किया कि जनता ने बड़े पैमाने पर बीजेपी के खिलाफ मतदान करना शुरू कर दिया है. अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि अपनी हार सामने देखकर बीजेपी ने आगरा, फतेहपुर, इटावा, औरैया, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद और नोएडा जैसे कई जिलों में चुनावी धांधली करने की कोशिश की. प्रशासन और अधिकारियों के जरिए वोट डालने से रोकने का प्रयास किया गया, लेकिन जनता सब समझ चुकी है और बीजेपी की हार तय है.
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बदायूं की पूर्व सांसद संघमित्रा मौर्य को 2024 में BJP ने टिकट नहीं दिया था. इसके बाद उनकी नाराजगी और राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चाएं होती रहीं. पिता स्वामी प्रसाद मौर्य के कांग्रेस के साथ आने के बाद बिल्सी से चुनाव लड़ने की अटकलें तेज हुईं. अब संघमित्रा ने आज तक से बातचीत में BJP छोड़ने की चर्चा खारिज की है.
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समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव रामपुर पहुंचे और जेल में बंद पार्टी नेता आजम खान से मुलाकात की. इस मुलाकात के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं. रामपुर स्थित मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी के छात्रों और एल्युमनी ने इस पूरे घटनाक्रम और असदुद्दीन ओवैसी के हालिया बयानों पर अपनी प्रतिक्रिया दी है.
इटावा में अखिलेश यादव ने कांग्रेस के साथ सीटों के बंटवारे पर सवालों का जवाब दिया. इस दौरान सपा नेता राजकुमार भाटी पर कार्रवाई और आजम खान से जुड़े मुद्दों पर भी उनसे सवाल पूछे गए.