पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उपजाऊ दोआब मैदानों के बीच बसा जसराना, एक शांत सब-डिविजन हेडक्वार्टर है. यह ऐतिहासिक आगरा-मैनपुरी कॉरिडोर पर फिरोजाबाद जिले में एक अहम जगह रखता है. मुख्य रूप से खेती वाला इलाका होने के कारण यहां गेहूं, आलू और सरसों की पैदावार होती है. इलाके के कई अहम कस्बों से अच्छी तरह जुड़े होने के बावजूद जसराना ने अपना खास ग्रामीण स्वरूप बनाए रखा है. यह जसराना तहसील का हेडक्वार्टर है और फिरोजाबाद लोकसभा क्षेत्र के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है. एक सामान्य, अनारक्षित निर्वाचन क्षेत्र के तौर पर, जसराना पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अहम राजनीतिक अखाड़ों में से एक बनकर उभरा है, जहां चुनावी मुकाबला मुख्य रूप से यादव, लोधी और अन्य OBC समुदायों के प्रभाव के इर्द-गिर्द घूमता है.
आजाद भारत में हुए पहले आम चुनावों के लिए 1952 में बने जसराना की भौगोलिक सीमाओं में समय-समय पर परिसीमन की प्रक्रियाओं के जरिए बदलाव हुए हैं. अपने मौजूदा स्वरूप में, इस निर्वाचन क्षेत्र में पूरी जसराना तहसील शामिल है, जिससे यह जिले के सबसे ग्रामीण विधानसभा क्षेत्रों में से एक बन गया है, और जसराना नगर पंचायत यहां की एकमात्र उल्लेखनीय शहरी बस्ती है.
जसराना ने अब तक उत्तर प्रदेश में हुए सभी 18 विधानसभा चुनावों में हिस्सा लिया है. शुरुआती दशकों में इस निर्वाचन क्षेत्र पर कांग्रेस पार्टी का दबदबा रहा और उसने 1952 से 1989 के बीच पांच बार यह सीट जीती. 1992 में समाजवादी पार्टी के गठन के बाद राजनीतिक समीकरणों में भारी बदलाव आया. 1993 के बाद से, समाजवादी पार्टी ने सात विधानसभा चुनावों में से पांच बार यह सीट जीती है, जिससे जसराना उसका एक अहम ग्रामीण गढ़ बन गया है, हालांकि पिछले दशक में बीजेपी ने भी यहां अपनी पैठ लगातार बढ़ाई है. निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी दो बार यह सीट जीती है, जबकि स्वतंत्र पार्टी, भारतीय क्रांति दल, जनता पार्टी, लोक दल, जनता दल और बीजेपी ने एक-एक बार यहां जीत हासिल की है.
समाजवादी पार्टी के रामवीर सिंह ने 2012 में बहुजन समाज पार्टी (BSP) के रामगोपाल लोधी को 28,636 वोटों से हराकर यह सीट फिर से हासिल की. बीजेपी, जो पिछली बार सिर्फ 2.06% वोट पाकर और अपनी जमानत जब्त करवाकर तीसरे नंबर पर रही थी, उसने 2017 के चुनाव से पहले रामगोपाल लोधी को अपनी पार्टी में शामिल करके जबरदस्त वापसी की. इस रणनीति का अच्छा फायदा मिला और लोधी ने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार शिव प्रताप सिंह को 20,328 वोटों से हरा दिया. मौजूदा विधायक रामवीर सिंह, जिन्होंने समाजवादी पार्टी छोड़ने के बाद लोक दल के टिकट पर चुनाव लड़ा था, चौथे स्थान पर खिसक गए और सिर्फ 4.89% वोट पाकर अपनी जमानत जब्त करवा बैठे.
समाजवादी पार्टी ने 2022 में जबरदस्त वापसी की, जो उस साल उत्तर प्रदेश में हुए सबसे कड़े मुकाबलों में से एक था. उसके उम्मीदवार सचिन यादव ने बीजेपी उम्मीदवार मानवेन्द्र प्रताप सिंह को सिर्फ 836 वोटों के बहुत कम अंतर से हराया. सचिन यादव को 108,289 वोट मिले, जबकि उनके बीजेपी प्रतिद्वंद्वी मानवेन्द्र प्रताप सिंह को 107,453 वोट मिले, जिससे पता चलता है कि यह सीट कितनी कड़ी प्रतिस्पर्धा वाली बन गई है.
लोकसभा वोटिंग का पैटर्न मोटे तौर पर विधानसभा के रुझान जैसा ही रहा है. 2009 में समाजवादी पार्टी, बीएसपी से 31,490 वोटों से आगे थी और 2014 में बीजेपी पर अपनी बढ़त बढ़ाकर 47,088 वोट कर ली. 2019 में बीजेपी ने 4,776 वोटों की मामूली बढ़त बनाकर बाजी पलट दी. 2024 में राजनीतिक स्थिति फिर बदली, जब समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार अक्षय यादव को 115,650 वोट मिले और बीजेपी उम्मीदवार विश्वदीप सिंह को 89,753 वोट मिले, जिससे समाजवादी पार्टी को इस विधानसभा क्षेत्र में 25,897 वोटों की अच्छी-खासी बढ़त मिली.
जसरना में मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ी है. रजिस्टर्ड मतदाताओं की संख्या 2012 में 305,791 से बढ़कर 2017 में 340,477, 2019 में 357,509, 2022 में 367,280 और 2024 में 372,439 हो गई. वोटिंग में लोगों की भागीदारी लगातार अच्छी रही है. 2012 में वोटिंग 66.87 प्रतिशत थी, 2017 में 67.67 प्रतिशत थी, 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान घटकर 60.82 प्रतिशत हो गई, 2022 के विधानसभा चुनावों में फिर से बढ़कर 67.55 प्रतिशत हो गई और 2024 के संसदीय चुनाव के दौरान 61.09 प्रतिशत रही.
जसरना हिंदू-बहुसंख्यक निर्वाचन क्षेत्र है, जहां मुस्लिम आबादी कुल मतदाताओं का अनुमानित 4 से 8 प्रतिशत है. अनुसूचित जातियों की आबादी मतदाताओं का लगभग 16.53 प्रतिशत है. इस निर्वाचन क्षेत्र को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यादवों के गढ़ों में से एक माना जाता है, जहां यादव सबसे बड़ा और सबसे प्रभावशाली जाति समूह हैं. लोधी दूसरी सबसे महत्वपूर्ण OBC समुदाय हैं और हाल के वर्षों में वे तेजी से BJP के समर्थन में आए हैं, जिससे यहां चुनाव बहुत कड़े मुकाबले वाले हो गए हैं. ब्राह्मण, ठाकुर, कुशवाहा और अन्य OBC समुदाय भी चुनावी नतीजों को तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. जसराना मुख्य रूप से ग्रामीण इलाका है. यहां के कुल मतदाताओं में से केवल 3.47 प्रतिशत ही जसराना नगर पंचायत की सीमा के भीतर रहते हैं, जबकि बाकी 96.53 प्रतिशत गांवों में रहते हैं.
जसरना का इतिहास ब्रज क्षेत्र के व्यापक सांस्कृतिक और राजनीतिक विकास से जुड़ा हुआ है. प्राचीन काल में, यह इलाका शूरसेन महाजनपद का हिस्सा था, जो शुरुआती भारतीय साहित्य में बताए गए 16 महाजनपदों में से एक था. बाद में यह भगवान कृष्ण से जुड़ी यादव परंपराओं और ब्रज की पशुपालक संस्कृति से जुड़ गया. हालांकि जसराना खुद कभी कोई बड़ा केंद्र नहीं बना, लेकिन इसके आस-पास के ग्रामीण इलाकों ने उन कई रीति-रिवाजों, बोलियों और सांस्कृतिक परंपराओं को संजोकर रखा है जो आज भी ब्रज क्षेत्र की पहचान हैं. मध्यकाल में, यह इलाका दिल्ली सल्तनत और मुगल प्रशासन के अधीन रहा और औपनिवेशिक शासन की स्थापना के बाद ब्रिटिश नियंत्रण में आ गया. ब्रिटिश शासन के दौरान, जसराना आस-पास के गांवों की जरूरतों को पूरा करने वाले एक छोटे से बाजार और प्रशासनिक कस्बे के रूप में विकसित हुआ और धीरे-धीरे एक स्थानीय व्यापारिक केंद्र बन गया.
यमुना और गंगा नदी प्रणालियों के बीच उपजाऊ जलोढ़ मैदानों में स्थित जसराना की विशेषता यहां की समतल कृषि भूमि और गांवों का घना नेटवर्क है. कृषि यहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, जिसमें गेहूं, आलू, धान, सरसों और दालें मुख्य फसलें हैं. यह निर्वाचन क्षेत्र पश्चिमी उत्तर प्रदेश के आलू व्यापार में भी योगदान देता है, जबकि डेयरी फार्मिंग और पशुपालन ग्रामीण परिवारों के लिए आय का एक महत्वपूर्ण अतिरिक्त स्रोत हैं. कृषि-आधारित छोटे व्यवसाय, अनाज मंडियां और स्थानीय व्यापारिक गतिविधियां जसराना कस्बे की अर्थव्यवस्था को बनाए रखती हैं, हालांकि यहां बड़े पैमाने पर उद्योग लगभग न के बराबर हैं.
जसरना राज्य राजमार्गों और जिला सड़कों के नेटवर्क के माध्यम से पड़ोसी जिलों से अच्छी तरह सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है. पास का राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क इस निर्वाचन क्षेत्र को आगरा, फिरोजाबाद, मैनपुरी और एटा से जोड़ता है. रेल संपर्क फिरोजाबाद और टूंडला जंक्शन के माध्यम से उपलब्ध है, जो देश के सबसे व्यस्त रेलवे स्टेशनों में से एक है. शिक्षण संस्थान, स्वास्थ्य सेवाएं और सरकारी कार्यालय मुख्य रूप से जसराना कस्बे में केंद्रित हैं.
जसरना जिला मुख्यालय फिरोजाबाद से लगभग 35 किमी, मैनपुरी से लगभग 45 किमी, आगरा से लगभग 55 किमी, एटा से लगभग 50 किमी और शिकोहाबाद से लगभग 65 किमी दूर स्थित है. टूंडला जंक्शन लगभग 45 किमी दूर है और देश भर के प्रमुख शहरों के लिए सीधी रेल कनेक्टिविटी प्रदान करता है. यह निर्वाचन क्षेत्र यमुना एक्सप्रेसवे के जरिए ग्रेटर नोएडा से लगभग 170 किमी, नोएडा से लगभग 185 किमी, नई दिल्ली से लगभग 220 किमी और आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे के जरिए राज्य की राजधानी लखनऊ से लगभग 285 किमी दूर है.
जसरना का चुनावी इतिहास साफ तौर पर इस निर्वाचन क्षेत्र में समाजवादी पार्टी की मजबूत पकड़ को दिखाता है, जो मुख्य रूप से यादव मतदाताओं के बीच उसके लंबे समय से चले आ रहे समर्थन पर टिकी है. वहीं, पिछले दशक में बीजेपी ने लोधी और अन्य गैर-यादव OBC समुदायों के बीच अपनी पैठ बढ़ाकर इस अंतर को लगातार कम किया है. इससे यह सीट, जिसे कभी समाजवादी पार्टी के लिए आसान माना जाता था, अब कड़े मुकाबले वाले मैदान में बदल गई है. 2017 में बीजेपी की जीत और 2022 के विधानसभा चुनाव में सिर्फ 836 वोटों का बहुत कम अंतर यह दिखाता है कि यह निर्वाचन क्षेत्र कितना प्रतिस्पर्धी हो गया है. हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की बड़ी बढ़त यह बताती है कि मुकाबला एकतरफा होने के बजाय अब भी बराबरी का बना हुआ है. नतीजतन, 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कोई भी पार्टी लापरवाही नहीं बरत सकती. समाजवादी पार्टी अपने पारंपरिक यादव समर्थन को मजबूत करने के साथ-साथ अपने सामाजिक गठबंधन का दायरा बढ़ाने की कोशिश करेगी, जबकि बीजेपी से लोधी, अन्य OBC समुदायों और ऊंची जाति के मतदाताओं के बीच अपनी पहुंच और मजबूत करने की उम्मीद है. इसलिए, ऐसा लगता है कि 2027 में जसराना में एक और कड़ा मुकाबला होने वाला है, जहां बड़े राजनीतिक नैरेटिव के बजाय जातिगत समीकरण, उम्मीदवार का चयन और मतदाताओं को प्रभावी ढंग से लामबंद करना ज्यादा मायने रखेगा.
(अजय झा)
Manvendra Pratap Singh
BJP
Surya Pratap Singh
BSP
Shiv Pratap Singh
IND
Suneel Kumar Jha
JANADIP
Vijay Nath Singh Verma (chhotu)
INC
Nota
NOTA
Rajiv Kumar
IND
Amit Yadav
AAAP
Navab Singh
IND
Kishan Pal Singh
IND
Brij Bhushan Sharan Singh Exclusive Interview: बीजेपी के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह महिला पहलवानों के आरोपों से बाइज्जत बरी हो गए हैं. आजतक से बातचीत में उन्होंने दावा किया कि पूरा मामला हुड्डा परिवार की साज़िश थी, जिसका मकसद हरियाणा चुनाव जीतना था. उन्होंने बताया कि पार्टी और योगी आदित्यनाथ के साथ उनके रिश्ते सामान्य हैं, लेकिन किस पार्टी से लड़ेंगे यह उन्होंने नहीं बताया.
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा युवाओं को साधने की कोशिश कर रही है. भाजपा हर विधानसभा में एक टीम बनाएगी, जो स्कूल-कॉलेजों में जाकर युवाओं से बात करेगी और उनकी समस्याओं के बारे में जानेगी.
बसपा प्रमुख मायावती के भतीजे आकाश आनंद की यूपी की सियासत में दोबारा से एंट्री हो गई है. आकाश आनंद ने सोमवार को हाथरस से मिशन-2027 का आगाज भी कर दिया और युवा वोटर्स को साधते नजर आए. इस दौरान उन्होंने जिस तरह अखिलेश यादव को अंकल कहा, उसके सियासी मायने साफ हैं.
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव का भले ही ऐलान न हुआ हो, लेकिन सियासी सरगर्मी तेज हो गई है. आकाश आनंद ने हाथरस से जनसभा करके मिशन-2027 का आगाज कर दिया है तो अब बसपा प्रमुख मायावती मंगलवार को प्रेस कॉफ्रेंस करके बीजेपी और कांग्रेस पर जमकर हमले किए.
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में इस बार Gen-Z मतदाताओं को वोट बैंक माना जा रहा है. उनकी हिस्सेदारी लगभग 15% है, जो कई सीटों के नतीजों को प्रभावित कर सकती है. ऐसे में बीजेपी, कांग्रेस समेत सभी दल 2027 के चुनाव में युवा वोटरों को साधने की रणनीति बना रहे हैं.
बसपा प्रमुख मायावती के भतीजे आकाश आनंद सवा दो साल के बाद यूपी की सियासी पिच पर उतरे तो पहले की तरह की आक्रामक नजर आए. योगी सरकार से लेकर राहुल गांधी और अखिलेश यादव पर हमले किए, लेकिन चंद्रशेखर आजाद पर चुप्पी साधे रखी. ऐसे में सवाल उठता है कि किस रणनीति के साथ आगे बढ़ रहे हैं?
बसपा प्रमुख मायावती के भतीजे आकाश आनंद यूपी की सियासी पिच पर उतर गए हैं और पहले की तरह ही आक्रामक तेवर में नजर आए. उस दौरान उन्होंने योगी सरकार पर जमकर हमले किए तो कांग्रेस को निशाने पर लिया. साथ ही अखिलेश यादव को अंकल बताकर तंज कसा.
AIMIM नेता ने दावा किया कि प्रयागराज में राहुल गांधी का छात्र संवाद कार्यक्रम फेल रहा. असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के नेता ने कहा कि यूपी में AIMIM के बिना योगी को हराना मुश्किल है.
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का भले ही औपचारिएक ऐलान न हुआ हो, लेकिन सियासी सरगर्मी बढ़ गई है. बसपा प्रमुख मायावती के भतीजे आकाश आनंद सवा दो साल के बाद फिर से यूपी में हाथरस के सादाबाद से चुनावी हुंकार भरेंगे, लेकिन सवाल यही है कि 2024 वाले आक्रामक तेवर में दिखेंगे?
यूपी कांग्रेस के संगठन में बड़े बदलावों को लेकर दिल्ली में बैठक बुलाई गई है. बैठक में 2027 के चुनाव को लेकर संगठन में और क्या-क्या बदलाव करने की जरूरत है, इस पर चर्चा की जाएगी.