गढ़मुक्तेश्वर विधानसभा क्षेत्र पश्चिमी उत्तर प्रदेश की एक पुरानी लेकिन विकसित होती हुई सीट है. यह गंगा के किनारे खेती और तीर्थयात्रा वाले इलाके में स्थित है और धीरे-धीरे फैलते हुए दिल्ली-NCR क्षेत्र के प्रभाव में आ रहा है. यह हापुड़ जिले में आता है और अमरोहा लोकसभा क्षेत्र के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है, जिससे इसका प्रशासनिक संबंध हापुड़ से और संसदीय संबंध अमरोहा से जुड़ता है.
यह एक सामान्य (अनारक्षित) निर्वाचन क्षेत्र है जिसमें गढ़मुक्तेश्वर शहर और ऊपरी गंगा-यमुना दोआब में इसके आस-पास के ग्रामीण इलाके शामिल हैं. इस क्षेत्र में गंगा किनारे के गांव, खेती-बाड़ी वाली बस्तियां और छोटे बाजार हैं, साथ ही गढ़मुक्तेश्वर की नगर पालिका परिषद भी है. यह इलाका एक बड़े शहरी केंद्र के बजाय स्थानीय मंडी और तीर्थयात्रा के केंद्र के रूप में अपनी भूमिका निभाता है.
गढ़मुक्तेश्वर में अब तक 16 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं. बीजेपी ने यह सीट पांच बार, कांग्रेस ने चार बार और समाजवादी पार्टी ने तीन बार जीती है, जबकि भारतीय क्रांति दल, जनता पार्टी, लोक दल और एक निर्दलीय उम्मीदवार ने एक-एक बार जीत हासिल की है. शुरुआती दौर में कांग्रेस का दबदबा था, लेकिन समय के साथ इस सीट पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में आए बड़े बदलाव दिखे हैं, जहां किसी एक स्थानीय कारक के बजाय जातिगत गठबंधन, खेती से जुड़े मुद्दे और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ने अक्सर नतीजों को तय किया है.
2012 में, मदन चौहान ने समाजवादी पार्टी के लिए लगातार तीसरी बार यह सीट जीती और बहुजन समाज पार्टी के फरहत हसन को 18,199 वोटों से हराया. 2017 के चुनाव में बड़ा बदलाव आया, जब बीजेपी उम्मीदवार कमल सिंह मलिक ने बीएसपी के प्रशांत चौधरी को 35,294 वोटों के अंतर से हराया, जबकि तीन बार चुने गए एसपी विधायक मदन चौहान तीसरे स्थान पर खिसक गए.
बीजेपी ने 2022 के विधानसभा चुनाव में हरेंद्र सिंह तेवतिया को अपना उम्मीदवार बनाकर गढ़मुक्तेश्वर सीट पर अपना कब्जा बनाए रखा. उन्होंने समाजवादी पार्टी के रवींद्र चौधरी को 26,306 वोटों से हराया, जबकि अब बीएसपी में शामिल हो चुके मदन चौहान काफी पीछे तीसरे स्थान पर रहे. तेवतिया को 1,04,113 वोट मिले और चौधरी को 77,807 वोट मिले. लगातार मिली इन जीतों ने गढ़मुक्तेश्वर को एक अनिश्चित और कई दावेदारों वाली सीट से बदलकर BJP के लिए काफी सुरक्षित सीट बना दिया है, कम से कम मौजूदा दौर में तो ऐसा ही है.
लोकसभा स्तर पर, गढ़मुक्तेश्वर क्षेत्र ने ज्यादातर BJP और उसके सहयोगियों का साथ दिया है. 2009 में, BJP की सहयोगी पार्टी राष्ट्रीय लोक दल (RLD) ने BSP पर 10,758 वोटों की बढ़त बनाई थी. 2014 में RLD से गठबंधन टूटने के बाद BJP ने बढ़त हासिल की और तब से पीछे मुड़कर नहीं देखा. इसके बाद हुए तीनों लोकसभा चुनावों में पार्टी आगे रही. 2014 में इसने समाजवादी पार्टी पर 66,257 वोटों की और 2019 में BSP पर 11,056 वोटों की बढ़त बनाई. 2024 में, BJP ने कांग्रेस पर 24,222 वोटों की बढ़त बनाई. इसमें BJP के कंवर सिंह तंवर को 102,646 वोट मिले और कांग्रेस के कुंवर दानिश अली को 78,424 वोट मिले.
गढ़मुक्तेश्वर में वोटरों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हुई है. 2012 में यहां 291,223 रजिस्टर्ड वोटर थे. यह संख्या 2017 में बढ़कर 329,503, 2019 में 336,580, 2022 में 348,800 और 2024 में 353,153 हो गई.
वोटिंग का प्रतिशत अच्छा रहा है, हालांकि पिछले संसदीय चुनाव में इसमें काफी गिरावट आई थी. यह 2012 में 65.68 प्रतिशत, 2017 में 67.31 प्रतिशत, 2019 में 68.47 प्रतिशत और 2022 में 67.85 प्रतिशत था, जो 2024 में गिरकर 59.44 प्रतिशत हो गया.
जनसांख्यिकी के नजरिए से देखें तो गढ़मुक्तेश्वर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हिंदू-बहुल इलाके में आता है. यहां जाट, त्यागी, गुर्जर और खेती-किसानी करने वाले अन्य समुदायों के साथ-साथ ब्राह्मण और अन्य ऊंची जातियों के लोग और अनुसूचित जाति की बड़ी आबादी रहती है. मुसलमान यहां एक अहम अल्पसंख्यक समुदाय हैं, जो गढ़मुक्तेश्वर शहर और कुछ गांवों में समूहों में रहते हैं. पारंपरिक रूप से वे समाजवादी पार्टी और बीएसपी जैसी पार्टियों के लिए वोट बैंक रहे हैं. अनुसूचित जाति के लोग यहां के कुल मतदाताओं का लगभग 19.81 प्रतिशत हैं. यह निर्वाचन क्षेत्र मुख्य रूप से ग्रामीण है, हालांकि मुख्य सड़कों और गंगा के किनारे वाले इलाकों में शहरीकरण बढ़ रहा है. कुल मतदाताओं में 87.86 प्रतिशत ग्रामीण और 12.14 प्रतिशत शहरी हैं.
जमीनी स्तर पर, गढ़मुक्तेश्वर की राजनीति पर खेती-किसानी करने वाली प्रभावशाली हिंदू जातियों, मुस्लिम समूहों और अनुसूचित जाति के मतदाताओं के बीच त्रिकोणीय समीकरण का असर दिखता है. हाल के वर्षों में जाट, त्यागी और ऊंची जाति के अन्य हिंदू समूह बीजेपी की ओर झुके हैं, खासकर मुजफ्फरनगर दंगों और उसके बाद पश्चिमी यूपी में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के बाद. साथ ही, कल्याणकारी योजनाओं और मजबूत कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर पार्टी की सक्रियता का भी इस पर असर पड़ा है. मुस्लिम मतदाताओं के साथ-साथ ओबीसी और एससी समुदायों के कुछ हिस्सों को एसपी और बीएसपी ने अपने पाले में करने की कोशिश की है. उनके चुनाव प्रचार में रोजी-रोटी के मुद्दों, गन्ने के बकाया भुगतान, महंगाई और स्थानीय स्तर पर भेदभाव या उत्पीड़न जैसे मुद्दों पर जोर दिया जाता है, जिससे वे बीजेपी के दबदबे को मुख्य चुनौती देने वाले बन गए हैं.
गढ़मुक्तेश्वर का इतिहास बहुत पुराना है और इसका जिक्र प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में मिलता है. यह महाभारत और भागवत पुराण से जुड़ा है और स्थानीय मान्यता के अनुसार, इसका संबंध प्राचीन हस्तिनापुर क्षेत्र से है. यह स्थान बाद के समय में अपने किले के लिए भी जाना जाता था, और आधुनिक चुनावी राजनीति में प्रवेश करने से पहले इसका इतिहास मुगल और ब्रिटिश काल से होकर गुजरा. शहर और इसके आसपास 1946 के दंगों सहित सांप्रदायिक तनाव की घटनाएं भी देखी गई हैं, जो क्षेत्र की ऐतिहासिक स्मृति का हिस्सा बनी हुई हैं.
आर्थिक रूप से, गढ़मुक्तेश्वर गन्ना और खाद्यान्न बेल्ट का हिस्सा बना हुआ है, कृषि और संबद्ध गतिविधियां ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अधिकांश हिस्सा चलाती हैं. गढ़मुक्तेश्वर शहर एक मंडी और सेवा केंद्र के रूप में कार्य करता है, जिसमें छोटी दुकानें, भोजनालय, लॉज और परिवहन से जुड़ी नौकरियां हैं, जो स्थानीय निवासियों और धार्मिक स्नान और मेलों के लिए गंगा आने वाले तीर्थयात्रियों दोनों की सेवा करती हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रमुख सड़क संपर्कों पर निर्वाचन क्षेत्र के स्थान ने धीरे-धीरे उप-शहरी विकास, दैनिक आवागमन और राजमार्गों के साथ परिवहन, रसद और छोटे पैमाने के वाणिज्यिक उद्यमों के उद्भव को प्रोत्साहित किया है.
गढ़मुक्तेश्वर का अपना कोई रेलवे स्टेशन नहीं है. निकटतम रेलवे स्टेशन पिलखुआ है, उसके बाद हापुर है, दोनों ही व्यापक क्षेत्रीय रेल नेटवर्क तक पहुंच प्रदान करते हैं. इस सड़क और रेल संपर्क ने निर्वाचन क्षेत्र को श्रमिकों, व्यापारियों और तीर्थयात्रियों के लिए और अधिक सुलभ बना दिया है, साथ ही इसे दिल्ली-एनसीआर के आर्थिक आकर्षण के करीब भी लाया है.
आसपास के कस्बों और शहरों में लगभग 14 किमी दूर हापुड शामिल है. गाजियाबाद लगभग 35 किमी दूर है, अमरोहा लगभग 31 किमी दूर है, मेरठ लगभग 40 किमी दूर है, मोरादाबाद लगभग 84 किमी दूर है, सहारनपुर लगभग 145 किमी दूर है, और दिल्ली लगभग 60 किमी दूर है. उत्तराखंड में हरिद्वार और देहरादून क्रमशः 98 किमी और 155 किमी दूर हैं. राज्य की राजधानी लखनऊ लगभग 420 किमी दूर स्थित है.
बड़े शहरी केंद्रों से कनेक्टिविटी और निकटता ने भी मतदाताओं की आकांक्षाओं को प्रभावित करना शुरू कर दिया है, खासकर युवा और पहली बार मतदाताओं के बीच, जो शिक्षा और काम के लिए गांवों, गढ़मुक्तेश्वर शहर और पड़ोसी शहरों के बीच अक्सर आते-जाते हैं. इसने कृषि आय, सिंचाई और फसल की कीमतों पर पारंपरिक चिंताओं के साथ-साथ बेहतर सड़कों, विश्वसनीय सार्वजनिक परिवहन, बेहतर स्कूली शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और नौकरी के अवसरों जैसे मुद्दों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया है. गंगा प्रदूषण, रेत खनन, तट कटाव और प्रमुख धार्मिक सभाओं के दौरान भीड़ प्रबंधन को लेकर पर्यावरणीय चिंताएं भी समय-समय पर स्थानीय बहसों में सामने आती रहती हैं, जिससे निर्वाचन क्षेत्र की राजनीति में एक और परत जुड़ जाती है.
जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश 2027 के विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रहा है, गढ़मुक्तेश्वर में भाजपा के अपने समेकित सामाजिक गठबंधन को एक साथ रखने के प्रयास और मुसलमानों, जाटों, ओबीसी और एससी मतदाताओं के एक काउंटर-ब्लॉक को एकजुट करने के विपक्ष के प्रयासों से मुकाबला देखने की संभावना है. भाजपा की लगातार विधानसभा जीत और संगठनात्मक गहराई उसे फायदा देती है. इसके अलावा, एक सहयोगी के रूप में रालोद की वापसी से उसे जाट मतदाताओं के बीच कुछ अतिरिक्त पैठ मिल सकती है. कृषि संकट, स्थानीय सत्ता विरोधी लहर और व्यापक राज्य-व्यापी या राष्ट्रीय मूड स्विंग यह तय करेंगे कि जो ऐतिहासिक रूप से पूरी तरह से एकतरफा गढ़ के बजाय एक प्रतिस्पर्धी पश्चिमी यूपी सीट रही है, उसमें अंतर कितना कड़ा हो जाएगा.
(अजय झा)
Ravinder Chaudhary
SP
Madan Chauhan
BSP
Furkan
AIMIM
Abha Chaudhary
INC
Nota
NOTA
Gopal Sharma
AINHCP
Virendra Singh Prajapati
JANADIP
Narendra Singh
AAAP
Ghanshyam
ASPKR
Shivkumar Chauhan
IND
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