बिल्सी, उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले का एक सब-डिविजन स्तर का शहर है, जहां नगर पालिका परिषद है. जिले के बीचों-बीच स्थित यह शहर पारंपरिक रूप से आस-पास के ग्रामीण इलाकों के लिए प्रशासनिक और व्यापारिक केंद्र रहा है. आज, यह बदायूं लोकसभा क्षेत्र के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है. ग्रामीण और शहरी दोनों तरह की आबादी वाला बिल्सी एक सामान्य सीट है. यहां अनुसूचित जाति की अच्छी-खासी आबादी के साथ-साथ मुस्लिम समुदाय के लोग भी बड़ी संख्या में रहते हैं, जिससे यहां की चुनावी राजनीति में सामाजिक समीकरण एक अहम भूमिका निभाते हैं.
परिसीमन आयोग के 1967 के आदेश के तहत बनी बिल्सी विधानसभा सीट पर पहली बार 1974 में चुनाव हुए थे. 2008 में हुए परिसीमन के दौरान इसकी सीमाओं में काफी बदलाव किए गए. अब इस क्षेत्र में बिल्सी नगर पालिका परिषद और बिल्सी कानूनगो सर्कल का पूरा इलाका आता है. इसके साथ ही, इसमें बदायूं तहसील के उझानी नगर पालिका परिषद, कछला नगर पंचायत और उझानी कानूनगो सर्कल, तथा सहसवान तहसील का कौलहाई कानूनगो सर्कल भी शामिल है, जिससे इसे एक अर्ध-शहरी स्वरूप मिला है.
बिल्सी में अब तक 14 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं, जिनमें 1997 में हुआ उपचुनाव भी शामिल है. यहां के मतदाताओं ने हमेशा बंटा हुआ जनादेश दिया है, जिसकी वजह से कोई भी राजनीतिक पार्टी यहां अपनी मजबूत पकड़ नहीं बना पाई है. बहुजन समाज पार्टी (BSP) और BJP, दोनों ने ही यह सीट चार-चार बार जीती है. BJP की जीत की गिनती में उसकी पूर्ववर्ती पार्टी, भारतीय जनसंघ की 1974 में हुए पहले चुनाव की जीत भी शामिल है. कांग्रेस ने यह सीट तीन बार जीती है, जबकि जनता पार्टी, जनता दल और समाजवादी पार्टी ने एक-एक बार जीत हासिल की है.
बिल्सी के प्रमुख विधायकों में उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती भी शामिल हैं, जिन्होंने 1996 में यह सीट जीती थी. हालांकि, उन्होंने हरौरा विधानसभा सीट को अपने पास रखने का फैसला किया और बिल्सी सीट छोड़ दी, जिसके कारण 1997 में यहां उपचुनाव कराना पड़ा.
2012 में, BSP के मुसर्रत अली बिट्टन ने समाजवादी पार्टी के विमल कृष्ण अग्रवाल को 8,328 वोटों से हराकर बिल्सी सीट जीती थी. उस चुनाव में छठे स्थान पर रहने के बाद, BJP ने 2017 में राधा कृष्ण शर्मा को मैदान में उतारकर शानदार वापसी की. उन्होंने मौजूदा BSP विधायक को 26,979 वोटों के बड़े अंतर से हराया. 2022 में उम्मीदवार बदलकर BJP ने यह सीट अपने पास बनाए रखी. पार्टी के उम्मीदवार हरीश चंद्र ने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार चंद्र प्रकाश मौर्य को 25,115 वोटों से हराया, उन्हें 93,500 वोट मिले, जबकि मौर्य को 68,385 वोट मिले.
बिल्सी के मतदाताओं ने लोकसभा चुनावों में भी इसी तरह का अनिश्चित व्यवहार दिखाया है. 2009 में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी से 2,064 वोटों के मामूली अंतर से आगे रही. 2014 में एक और कड़े मुकाबले वाले चुनाव में समाजवादी पार्टी सबसे आगे रही और BJP से 5,815 वोटों की बढ़त बनाई. हालांकि, BJP ने अगले दो संसदीय चुनावों में अपना दबदबा कायम किया. 2019 में वह समाजवादी पार्टी से 23,440 वोटों से आगे रही, लेकिन 2024 में यह बढ़त घटकर 13,709 वोट रह गई; तब BJP उम्मीदवार दुर्विजय सिंह शाक्य को 90,753 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के आदित्य यादव को 77,044 वोट मिले.
पिछले दशक में बिल्सी के मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ी है. रजिस्टर्ड मतदाताओं की संख्या 2012 में 293,359 से बढ़कर 2017 में 334,037, 2019 में 339,928, 2022 में 355,234 और 2024 में 356,769 हो गई. हालांकि, मतदान में धीरे-धीरे गिरावट देखी गई है. 2012 में वोटिंग 60.55 प्रतिशत, 2017 में 58.69 प्रतिशत, 2019 के लोकसभा चुनाव में 57.65 प्रतिशत, 2022 के विधानसभा चुनाव में 57.82 प्रतिशत और 2024 के संसदीय चुनावों में 53.88 प्रतिशत रही.
बिल्सी का इलाका मुख्य रूप से ग्रामीण है. यहां के वोटरों में मुस्लिम 18.10 प्रतिशत और अनुसूचित जाति के लोग 20.49 प्रतिशत हैं. यादव, मौर्य, शाक्य और कई अन्य OBC समुदायों की अच्छी-खासी मौजूदगी है, जबकि ब्राह्मण और ठाकुर भी यहां की सामाजिक बनावट का अहम हिस्सा हैं. इस निर्वाचन क्षेत्र की 78.45 प्रतिशत आबादी ग्रामीण इलाकों में और बाकी 21.55 प्रतिशत शहरी इलाकों में रहती है. लोगों की इस मिली-जुली आबादी के कारण चुनाव के नतीजों में अनुसूचित जाति, मुस्लिम और OBC वोट बहुत असरदार होते हैं.
उत्तर भारत के कस्बों के हिसाब से बिल्सी एक अपेक्षाकृत नया बसा हुआ इलाका है. इसकी स्थापना 18वीं सदी के आखिर में हुई थी, जब यह इलाका अवध के नवाब वज़ीर के शासन का हिस्सा था. इसे स्थानीय जमींदार बिलासी सिंह के संरक्षण में जस राम नाम के एक वैश्य व्यापारी ने बसाया था. शुरू में इस जगह को 'बिलासी गंज' के नाम से जाना जाता था, जो धीरे-धीरे बदलकर 'बिल्सी' हो गया. 19वीं सदी के शुरुआती दशकों में, रेलवे के आने से पहले, बिल्सी रोहिलखंड के अनाज और सामान के मुख्य बाजारों में से एक के रूप में उभरा. यह आस-पास के ग्रामीण इलाकों से आने वाली कृषि उपज के लिए एक अहम कलेक्शन और डिस्ट्रीब्यूशन सेंटर था. कुछ समय तक यूरोपियन लोगों द्वारा चलाई जा रही नील की फैक्ट्री ने भी इसकी समृद्धि में योगदान दिया. दूसरी जगहों पर रेलवे रूट बनने के बाद इस शहर का कमर्शियल महत्व धीरे-धीरे कम हो गया, फिर भी यह आसपास के ग्रामीण इलाकों के लिए एक जरूरी तहसील हेडक्वार्टर और व्यापारिक केंद्र बना हुआ है.
खेती इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. गेहूं, धान, गन्ना, आलू और मेंथा यहां की मुख्य फसलें हैं, जबकि डेयरी फार्मिंग और पशुपालन से ग्रामीणों की आमदनी बढ़ती है. बिल्सी और उझानी मुख्य व्यापारिक केंद्र हैं, जहां अनाज मंडियां, थोक बाजार, राइस मिलें, कोल्ड स्टोरेज और खेती से जुड़े कारोबार हैं. छोटे पैमाने पर व्यापार, ट्रांसपोर्ट, रिटेल व्यापार और सर्विस सेक्टर से शहरी इलाकों में अतिरिक्त रोजगार मिलता है.
यह क्षेत्र स्टेट हाईवे और जिला सड़कों के नेटवर्क के जरिए बदायूं, बरेली, संभल, चंदौसी और आस-पास के शहरों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है. बिल्सी, बदायूं से लगभग 35 किमी, बरेली से लगभग 70 किमी, मुरादाबाद से लगभग 85 किमी, नई दिल्ली से लगभग 185 किमी और लखनऊ से लगभग 285 किमी दूर है. उझानी, जो इस क्षेत्र के प्रमुख शहरी केंद्रों में से एक है, जिला मुख्यालय से सिर्फ 18 किमी दूर है. सबसे नजदीकी रेलवे सुविधा उझानी और बदायूं में उपलब्ध है.
हाल के वर्षों में शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं में लगातार सुधार हुआ है, हालांकि लोग खास इलाज और उच्च शिक्षा के लिए अभी भी बदायूं पर निर्भर हैं. सरकारी स्कूल, डिग्री कॉलेज, कम्युनिटी हेल्थ सेंटर और प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं लोगों की बुनियादी जरूरतें पूरी करते हैं, जबकि चुनावों के दौरान ग्रामीण सड़कें, सिंचाई, रोजगार पैदा करना, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं और बिना रुकावट बिजली की सप्लाई जैसे मुद्दे अहम बने रहते हैं.
बीजेपी 2027 के विधानसभा चुनाव में एक साफ बढ़त के साथ उतर रही है, क्योंकि उसने पिछले दो विधानसभा चुनाव जीते हैं और पिछले दो लोकसभा चुनावों में भी इस क्षेत्र में बढ़त बनाई है. फिर भी, बिल्सी ऐसी सीट नहीं है जहां कोई पार्टी लापरवाही बरत सकती है. बीजेपी की हालिया जीत या संसदीय चुनावों में उसकी बढ़त इतनी बड़ी नहीं रही है कि उसके प्रतिद्वंद्वियों का हौसला टूट जाए. समाजवादी पार्टी का समर्थन आधार अभी भी मजबूत है, जबकि बीएसपी, भले ही हाल के दिनों में कमजोर हुई हो, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि अतीत में उसे यहां अच्छी सफलता मिली है. अगर मौजूदा सरकार के खिलाफ पड़ने वाले वोट (एंटी-इनकंबेंसी वोट) समाजवादी पार्टी और बीएसपी के बीच बंट जाते हैं, तो बीजेपी की स्थिति और बेहतर हो सकती है. इसलिए, ऐसा लगता है कि 2027 में बिल्सी में एक और कड़ा मुकाबला होने वाला है, जिसमें जातिगत समीकरण, समुदाय का एकजुट होना और उम्मीदवार का चयन निर्णायक साबित हो सकते हैं.
(अजय झा)
Chandra Prakash Maurya
SP
Mamta Shakya
BSP
Mir Hadi Ali Urf Babar Miyan
ASPKR
Veer Pal Singh
RPD
Ankit Chauhan
INC
Kishor Kumar
RSOSP
Nota
NOTA
Rajaram Shakya
IND
Shailendra Kumar Mishra
JDL
Devendra
AAAP
Deenanath
IND
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के साथ सीट बंटवारे को लेकर अखिलेश यादव ने अपना रुख साफ किया है. इटावा के सैफई में मतदान के बाद उन्होंने कहा कि सपा और कांग्रेस दोनों को पता है कि कितनी सीटों पर बंटवारा होना है. उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए दोनों दलों को रास्ता निकालना होगा. हालांकि, अखिलेश ने सीटों की संख्या का खुलासा नहीं किया.
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इटावा में अखिलेश यादव ने कांग्रेस के साथ सीटों के बंटवारे पर सवालों का जवाब दिया. इस दौरान सपा नेता राजकुमार भाटी पर कार्रवाई और आजम खान से जुड़े मुद्दों पर भी उनसे सवाल पूछे गए.
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उत्तर प्रदेश की राजनीति में अखिलेश यादव और आजम खान की मुलाकात की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 11 महीने बाद रामपुर जेल में बंद वरिष्ठ नेता आजम खान से करीब 45 मिनट तक मुलाकात की. इस मुलाकात के दौरान आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर विस्तृत चर्चा हुई. सूत्रों के मुताबिक आजम खान ने अखिलेश यादव को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अपने पसंदीदा उम्मीदवारों की एक सूची सौंपी है. वह अपने समर्थकों और मददगारों के लिए टिकट की मांग कर रहे हैं.
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