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दिनेश, अदिति और मनोज...राहुल के गढ़ में बीजेपी का दलबदलुओं पर दांव

उत्तर प्रदेश के योगी मंत्रिमंडल में सपा के बागी विधायक मनोज पांडेय को मंत्री बनाकर शामिल कर लिया गया है, जो रायबरेली से आते हैं. इस तरह बीजेपी का 'रायबरेली प्लान' पूरी तरह से 'आउटसोर्सिंग' पर टिका है. कांग्रेस और सपा से स्थानीय चेहरों को मिलाकर गांधी परिवार के अंतिम किले पर भगवा फहराने की रणनीति है.

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राहुल गांधी के गढ़ में बीजेपी का दलबदलू प्लान (Photo-ITG)
राहुल गांधी के गढ़ में बीजेपी का दलबदलू प्लान (Photo-ITG)

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के सिपहसालार रहे शुभेंदु अधिकारी को तोड़कर बीजेपी जिस तरह 'दीदी' के अभेद्य दुर्ग को भेदकर कमल खिलाने में कामयाब रही है. अब उसी 'विनिंग मॉडल' के जरिए बीजेपी गांधी परिवार के मजबूत गढ़ और राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली में सेंधमारी करने की तैयारी में है. 

उत्तर प्रदेश में रायबरेली और अमेठी को गांधी परिवार का गढ़ माना जाता रहा है. अमेठी के किले को भेदने में बीजेपी सफल हो चुकी है, लेकिन रायबरेली अभी भी गांधी परिवार का दुर्ग बना हुआ है. इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी के बाद अब राहुल गांधी रायबरेली से सांसद हैं.

गांधी परिवार के इस मजबूत किले को दरकाने के लिए बीजेपी 'दलबदलू' नेताओं के भरोसे है. रायबरेली को 'कांग्रेस मुक्त' बनाने वाले मिशन में बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत वो चेहरे बने हुए हैं, जो कभी कांग्रेस या सपा के स्तंभ हुआ करते थे. दिनेश प्रताप सिंह के बाद मनोज पांडेय को भी योगी कैबिनेट में मंत्री बनाया गया है ताकि रायबरेली में भी 'कमल' खिलाया जा सके.

गांधी परिवार में दलबदलुओं के भरोसे बीजेपी
आजादी के बाद से लेकर अभी तक रायबरेली गांधी परिवार का सबसे सुरक्षित किला माना जाता है. फिरोज गांधी से लेकर पूर्व पीएम इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी के बाद राहुल गांधी रायबरेली सीट से लोकसभा सांसद हैं. रायबरेली की सियासत में भले ही गांधी परिवार की तूती बोलती रही हो, लेकिन यहां पर कई सियासी क्षत्रप भी हैं, जिनका अपना-अपना सियासी असर और रसूख है. 

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पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी ममता बनर्जी के संगठन की रग-रग से वाकिफ थे. इसी तरह गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली में बीजेपी ने उन चेहरों को चुना है जो कभी गांधी परिवार के 'कान और आंख'हुआ करते थे. बीजेपी ने जिले के इन्हीं सियासी मठाधीशों को एक-एक कर कई नेताओं को अपने साथ मिला लिया है.

दिनेश प्रताप सिंह से लेकर विधायक अदिति सिंह, रामलाल अकेला और मनोज कुमार पांडेय तक अपनी मूल पार्टी को छोड़कर बीजेपी का दामन थाम चुके हैं? इस तरह रायबरेली में बीजेपी की सियासत पूरी तरह से दलबदलू नेताओं को भरोसे चल रही है. 

दिनेश प्रताप के बाद मनोज पांडेय बने मंत्री
योगी सरकार में मंत्री दिनेश प्रताप सिंह एक समय गांधी परिवार के करीबी माने जाते थे, लेकिन 2019 में बीजेपी का दामन थामा. दिनेश प्रताप सिंह को रायबरेली के 'शुभेंदु' भी कहा जा सकता है. कभी सोनिया गांधी के चुनाव संचालक रहे दिनेश सिंह अब भाजपा के सबसे बड़े सेनापति हैं.

बीजेपी ने उन्हें योगी सरकार में मंत्री बनाकर रायबरेली में कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे को तोड़ने की कवायद में है. दिनेश सिंह सबसे ज्यादा गांधी परिवार के खिलाफ आक्रमक रहते हैं. 2019 में सोनिया गांधी और 2024 में राहुल गांधी के खिलाफ लोकसभा चुनाव लड़ चुके हैं, लेकिन सफल नहीं रहे. 

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2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले सपा से बगावत करने वाले ऊंचाहार से विधायक मनोज कुमार पांडेय को योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया गया है. मनोज पांडेय सपा सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे हैं और ब्राह्मण वोटों के नजरिए से उन्हें बीजेपी ने मंत्री बनाया है.

पांडेय के जरिए भाजपा ने सपा के उस मजबूत आधार को चोट पहुंचाई है जो रायबरेली में कांग्रेस-सपा गठबंधन की रीढ़ हुआ करता था, लेकिन 2024 में मनोज पांडेय कोई असर नहीं दिखा सके. इसीलिए अब उन्हें मंत्री बनाकर उनके सियासी कद को बढ़ाया गया है ताकि उनके रसूख का लाभ उठाया जा सके. 

अदिति सिंह और रामलाल अकेला बीजेपी के साथ
रायबरेली के बाहुबली नेता अखिलेश सिंह भले ही अब दुनिया में नहीं रहे, लेकिन उनकी बेटी अदिति सिंह उनकी सियासी विरासत को संभाल रही है. अदिति सिंह ने अपनी सियासी पारी का आगाज कांग्रेस से किया, लेकिन बाद में बीजेपी का दामन थाम लिया. उनका भाजपा में आना कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक झटका था. अदिति सिंह के भाजपा में आने से पार्टी को शहर की सीट पर मजबूती मिली जो दशकों से उसके पास नहीं थी. 2022 में रायबरेली सदर सीट पर बीजेपी की टिकट से अदिति विधायक बनी. 

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रायबरेली की सियासत में रामलाल अकेला दलित चेहरा माने जाते हैं, जो एक समय सपा से अपनी राजनीति पारी का आगाज किया था. सपा के टिकट पर बछरावां (सुरक्षित) सीट से दो बार विधायक रहे चुके हैं, लेकिन 2022 के चुनाव से पहले बीजेपी का दामन थाम लिया. रामलाल अब बीजेपी के लिए सियासी बैंटिग कर रहे हैं और दलित में खासकर जाटव वोटों को जोड़ने में जुटे हैं. 

रायबरेली में कितने काम के दलबदलू नेता
रायबरेली में बीजेपी ने ज्यादातर उन नेताओं को अपने साथ जोड़ा है, जो पहले से राजनीतिक तौर पर स्थापित हैं. मनोज पांडेय सपा से तीन बार के विधायक हैं तो दिनेश प्रताप सिंह तीसरी बार एमएलसी हैं. अदिति सिंह दो बार की विधायक हैं, जिसमें एक बार कांग्रेस और एक बार बीजेपी से हैं. इसके अलावा उनके पिता अखिलेश सिंह पांच बार के विधायक थे. 

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रामलाल अकेला भी दो बार सपा के टिकट पर विधायक रह चुके हैं. इस तरह  गांधी परिवार के गढ़ में बीजेपी ठाकुर और ब्राह्मण के साथ दलित नेताओं को जोड़कर मजबूत सियासी पिच तैयार की है, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में दलबदलू नेता बीजेपी के काम नहीं आ सके. मनोज पांडेय से लेकर अदिति सिंह तक के विधानसभा क्षेत्र में बीजेपी को करारी मात खानी पड़ी थी. बीजेपी से ज्यादा वोट कांग्रेस को मिला था. इसकी एक बड़ी वजह यह है कि रायबरेली की तीनों सवर्ण नेताओं के बीच सियासी वर्चस्व की जंग है.  

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मनोज, दिनेश, अदिति में वर्चस्व की जंग
रायबरेली लोकसभा क्षेत्र के तहत पांच विधानसभा सीटें आती है जबकि जिले में 6 विधानसभा सीटें है. रायबरेली जिले में दो विधानसभा सीटों पर बीजेपी के विधायक हैं, जिसमें अदिति सिंह रायबरेली सदर से और दूसरी सलोन विधानसभा सीट से अशोक कोरी विधायक हैं. इसके अलावा 4 सीट पर सपा के विधायक हैं, जिसमें से मनोज पांडेय अब बागी होकर बीजेपी के पाले में आ गए हैं. दिनेश सिंह और मनोज पांडेय योगी सरकार में मत्री भी है.  

सपा और कांग्रेस से आए दिनेश प्रताप सिंह,  मनोज पांडेय और अदिति सिंह के बीच सियासी अदावत किसी से छिपी नहीं है. तीनों ही नेताओं के सियासी वर्चस्व ऐसी है कि एक दूसरे के साथ मंच भी शेयर नहीं करते हैं. बीजेपी ने भले राहुल गांधी के सियासी गढ़ को भेदने के लिए दलबदलू नेताओं को अपने साथ मिला लिया हो, लेकिन गांधी परिवार के सियासी प्रभाव और इन नेताओं के आपसी रंजिश के चलते रायबरेली की जमीन पथरीली बनी हुई है.

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