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'राहुल गांधी हों या अखिलेश यादव दोनों अहंकार में डूबे', INDIA ब्लॉक मार्च के बाद BJP का वार

बीजेपी ने राहुल गांधी और अखिलेश यादव को अहंकारी बताया है और कहा है कि इसी वजह से उत्तर प्रदेश में दोनों के बीच गठबंधन नहीं हो पा रहा है. बीजेपी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने बताया कि दिल्ली में चुनाव आयोग के मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन में भी दोनों नेता अलग-अलग नजर आए.

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बीजेपी ने राहुल गांधी और अखिलेश यादव पर साधा निशाना  (Photo-ITG)
बीजेपी ने राहुल गांधी और अखिलेश यादव पर साधा निशाना (Photo-ITG)

मंगलवार को INDIA ब्लॉक के मार्च के बाद बीजेपी ने राहुल गांधी और अखिलेश यादव पर निशाना साधा है. बीजेपी ने दोनों नेताओं को अहंकारी बताया है. बीजेपी ने समाजवादी पार्टी पर इमरान मसूद के मुद्दे को लेकर भी निशाना साधा है. BJP ने दोनों नेताओं पर निशाना साधते हुए उत्तर प्रदेश में दोनों दलों के बीच गठबंधन मुश्किल बताया.

बीजेपी ने कहा कि राहुल गांधी और अखिलेश यादव दोनों विरासत की राजनीति से आए हैं और दोनों ही अहंकार में हैं. बीजेपी का कहना है कि यही कारण है कि उत्तर प्रदेश में दोनों दलों के बीच गठबंधन नहीं हो पा रहा. 

बीजेपी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के गठबंधन को ध्यान में रखते हुए ही दिल्ली में चुनाव आयोग के मु्द्दे पर विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है. बीजेपी ने दावा किया है कि इस प्रदर्शन में भी राहुल गांधी और अखिलेश यादव अलग-अलग नजर आए. 

राकेश त्रिपाठी ने दोनों नेताओं पर निशाना साधते हुए कहा कि अखिलेश यादव अपना राग गा रहे हैं जबकि राहुल गांधी अलग श्रेय लेने की कोशिश कर रहे हैं. बीजेपी ने इमरान मसूद के मु्द्दे पर भी समाजवादी पार्टी पर निशाना साधा. 

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यह भी पढ़ें: UP के 'दो लड़कों' की जोड़ी में आ गई दूरी? सीटों पर पेंच, प्रदर्शन में नहीं दिखी राहुल-अखिलेश की गर्मजोशी

बीजेपी का कहना है कि इन घटनाओं से साफ है कि उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी और अखिलेश यादव के बीच गठबंधन की संभावनाएं कमजोर होती दिख रही हैं. 

गठबंधन की मजबूरी या वोट बैंक का दबाव?

विशेषज्ञों के मुताबिक, सपा और कांग्रेस दोनों ही खुद को गठबंधन के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध दिखाना चाहते हैं. वे यह संदेश देना चाह रहे हैं कि दोनों मिलकर चुनाव लड़ेंगे. इसके पीछे सबसे बड़ी वजह दोनों दलों का कैडर और वोट बैंक है, जो चाहता है कि दोनों पार्टियां मिलकर 2024 के लोकसभा चुनाव जैसा करिश्मा दोबारा दोहराएं.

ऐसे माहौल में, यदि चुनाव नतीजे भाजपा के पक्ष में जाते हैं तो जिस भी दल की ओर से थोड़ी सी भी ढील दिखेगी, जनता हार का ठीकरा उसी के सिर फोड़ेगी. कोई भी सियासी पार्टी इस बदनामी का जोखिम नहीं लेना चाहती और यही मजबूरी दोनों को एक मंच पर बांधे हुए है. जानकारों की मानें तो अगर मतदाताओं का यह दबाव न होता, तो यह गठबंधन काफी पहले ही बिखर चुका होता.

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