पश्चिम बंगाल के चुनाव में अब ईसाई समुदाय की भूमिका अहम हो गई है. मुख्यमंत्री और टीएमसी नेता ममता बनर्जी ने मंगलवार को जलपाईगुड़ी के सेंट लूसी चर्च जाकर ईसाई समुदाय के लोगों और पादरियों से मुलाकात की. उन्होंने वहां प्रार्थना सभा में भी हिस्सा लिया.
ममता बनर्जी उत्तर बंगाल में चुनाव प्रचार के लिए पहुंचीं हैं. बुधवार को वह जलपाईगुड़ी में जनसभा को संबोधित करेंगी. सीएम ममता ने सोशल मीडिया पर ईसाई समुदाय के लोगों के साथ मुलाकात की तस्वीरें साझा करते हुए लिखा कि उन्हें चर्च जाकर बहुत खुशी हुई. उन्होंने सभी की सुख-शांति के लिए प्रार्थना की और कहा कि बंगाल हमेशा सभी धर्मों का सम्मान करने वाले रास्ते पर चलेगा.
लेकिन चुनाव के दौरान जलपाईगुड़ी में ममता बनर्जी की ईसाई समुदाय के लोगों के साथ कि इस मुलाकात की गहरे अर्थ हैं. वैसे तो पूरे पश्चिम बंगाल में ईसाई समुदाय की संख्या 1 प्रतिशत से भी कम है लेकिन सबसे ज्यादा ईसाई जलपाईगुड़ी और उससे सटे अलीपुरद्वार जिले में हैं. अंग्रेजी शासनकाल के दौरान 1940 के आस पास जलपाईगुड़ी में ईसाई समुदाय की संख्या बढ़ने लगी थी.
एक अनुमान के मुताबिक इन दो जिलों में लगभग 3 से 5 प्रतिशत के आसपास ईसाई समुदाय के लोग रहते हैं. इनमें से ज्यादातर आदिवासी हैं और चाय बागान श्रमिक है. जलपाईगुड़ी जिले की 7 विधानसभा सीटों और अलीपुरद्वार जिले की 5 विधानसभा सीटों पर हार-जीत का मार्जिन देखा जाए तो वो 2.83% से 5.34 % के बीच का है. ऐसे में इन 12 सीटों पर ईसाई आदिवासी निर्णायक भूमिका निभाते हैं. पिछले कई सालों में ईसाई समुदाय के ज्यादातर लोग TMC के पक्ष में ही वोट देते रहे हैं.
ऐसे में ममता बनर्जी ने इस बार इस बात को सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि ईसाई समुदाय का बहुत तृणमूल को ही मिले. ममता बनर्जी की ईसाई समुदाय के पादरियों और लोगों से ताजा मुलाकात काफी हद तक चुनाव की रणनीति का हिस्सा है.
बंगाल में दो चरणों में होना है मतदान
बता दें कि पश्चिम बंगाल की सत्ता के लिए सबसे बड़ी जंग की तारीखों का ऐलान हो गया है. इस बार बंगाल का मुकाबला दो चरणों में होगा. सूबे में 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे, जबकि 4 मई को चुनाव के नतीजे आएंगे. पिछली बार 8 फेज में वोटिंग कराई गई थी.
इन चुनावों में ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस ने 2016 चुनाव के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन करते हुए विधानसभा की 294 में से 213 सीटों पर जीत हासिल कर सत्ता में वापसी की थी. बीजेपी 77 सीटें जीतकर सूबे में पहली बार मुख्य विपक्षी पार्टी के रूप में उभरी थी. पश्चिम बंगाल की सत्ता पर लंबे समय तक काबिज रहे लेफ्ट और कांग्रेस पार्टी का गठबंधन शून्य पर सिमट गया था. इंडियन सेक्युलर फ्रंट और निर्दलीयों को एक-एक सीट पर जीत मिली थी.