नंदीग्राम में मतदान की कवरेज खत्म करने के बाद जब हम कोलकाता के लिए निकले, तब शाम ढलने को थी और रास्ता लंबा. अनुमान था कि 4 से 5 घंटे लगेंगे. लेकिन मन में एक और चिंता थी- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हावड़ा में रोड शो.
मैंने अपने साथी से कहा, 'जल्दी निकलते हैं, कहीं रास्ते डायवर्ट हुए तो हम फंस जाएंगे और पहुंच ही नहीं पाएंगे.' करीब दो घंटे की ड्राइव के बाद हम कोलाघाट पहुंचे. भूख अब साफ महसूस हो रही थी.
हाईवे के किनारे नजरें किसी साफ-सुथरे ढाबे को तलाश रही थीं. तभी एक बोर्ड दिखा- 'पहलवान हिंदू ढाबा.' नाम पढ़ते ही हल्की मुस्कान आई. लगा जैसे यहां का खाना खाकर लोग सच में ‘पहलवान’ बन जाते होंगे.
हम अंदर गए और पूछा- 'क्या शाकाहारी खाना मिल जाएगा?' ढाबे के मालिक ने बिना देर किए जवाब दिया-'जी सर, बिल्कुल मिलेगा.' कुछ ही देर में हमारे सामने थाली सज गई. चावल, दाल, आलू की भुजिया, आलू-पालक की सब्जी, नींबू और प्याज. जैसे ही पहला निवाला लिया, दाल से हल्की मछली की महक आई. मैंने तुरंत पूछा- 'इसमें नॉन-वेज तो नहीं है?' मालिक ने सहजता से कहा- 'नहीं सर, इसमें बस फिश फ्राई वाला तड़का है.'
बंगाल की संस्कृत का हिस्सा है मछली
मैं शाकाहारी हूं, लेकिन उस एक महक ने बंगाल की संस्कृति का एक सच्चा पहलू सामने रख दिया. यहां मछली सिर्फ खाना नहीं, जिंदगी का हिस्सा है. मैंने खाना जारी रखा, लेकिन मन में यही बात गूंजती रही- बंगाल और मछली को अलग नहीं किया जा सकता.
खाना खत्म करते ही हम बिना वक्त गंवाए हावड़ा की ओर निकल पड़े. करीब 4 बजे हम उस इलाके में पहुंचे जहां रोड शो होना था. लेकिन वहां पहुंचते ही साफ हो गया कि मामला आसान नहीं है. 4:30 बजे रोड शो शुरू होना था और पूरे इलाके में बैरिकेडिंग हो चुकी थी.
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हमने एक पुलिस अधिकारी से अनुरोध किया-'हमें आगे जाने दीजिए, हम मीडिया से हैं.' उन्होंने धीरे से कहा कहा-'आप देर से आए हैं, अब कोई रास्ता खुला नहीं है.' हम अभी भी लगभग 4 किलोमीटर दूर थे. नक्शे में ये दूरी 20-22 मिनट की थी, लेकिन अब गाड़ी से जाना नामुमकिन था.
कुछ सेकंड के मौन के बाद मैंने अपने साथी जगन्नाथ से कहा- 'चलो, पैदल चलते हैं.' और बस, हम निकल पड़े- कंधे पर कैमरा, हाथ में माइक, और साथ में लाइव उपकरण लेकर.
'पल्टानो दरकार, चाई बीजेपी सरकार'
जैसे-जैसे हम आगे बढ़े, माहौल बदलता गया. सड़क पर भीड़ बढ़ती जा रही थी. महिलाएं, पुरुष, युवा, सब एक दिशा में बढ़ रहे थे. हर हाथ में बीजेपी का झंडा और हर जुबान पर एक ही नारा- 'जय श्री राम.' कुछ दूरी पर लोग 'पल्टानो दरकार, चाई बीजेपी सरकार' गाने पर नाच रहे थे. राजनीति यहां सिर्फ विचार नहीं थी, एक उत्सव का रूप ले चुकी थी.
भीषण गर्मी में करीब 2 किलोमीटर पैदल चलने के बाद शरीर जवाब देने लगा. पसीना कपड़ों को भिगो चुका था. गला सूख चुका था. एक छोटी सी दुकान दिखी, वहीं से पानी की बोतल ली और एक ही सांस में खत्म कर दी.
उसी के पास एक मंच पर कुछ महिलाएं ढाक बजा रही थीं. उनकी वेशभूषा काली पूजा जैसी थी. लाल-सफेद साड़ी, पारंपरिक साज-सज्जा. ढाक की गूंज, भीड़ का शोर और राजनीतिक नारों का संगम. ये सिर्फ रोड शो नहीं, बंगाल की जीती-जागती तस्वीर थी.
'हर-हर मोदी, घर-घर मोदी'
आखिरकार हम उस चौराहे तक पहुंचे जहां से आगे जाने की अनुमति नहीं थी. पुलिस ने साफ कहा- 'यहीं रुकिए.' हमने वहीं एक कोने में कैमरा सेट किया और इंतजार शुरू किया. चारों तरफ सुरक्षा का कड़ा घेरा था- सीआरपीएफ, रैपिड एक्शन फोर्स और कोलकाता पुलिस के जवान तैनात थे. भीड़ लगातार नारे लगा रही थी- 'हर-हर मोदी, घर-घर मोदी.'
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इसी बीच मेरी नजर एक दुकान पर पड़ी-'यादव भुजिया भंडार.' मन में एक अजीब सा ख्याल आया. क्या प्रधानमंत्री यहां रुकेंगे? क्या वो भुजिया चखेंगे? शायद इसलिए क्योंकि उस दुकान के आसपास सुरक्षा कुछ ज्यादा ही कड़ी थी. तभी अचानक हलचल तेज हो गई. सुरक्षाकर्मियों ने भीड़ को पीछे धकेलना शुरू किया. बैरिकेड्स के पास सख्ती बढ़ा दी गई. हमने कैमरा ऑन किया और सामने से आते काफिले पर नजरें जमा दीं.
कुछ ही पलों में गाड़ियां गुजरने लगीं और फिर वो पल आया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गाड़ी सामने थी. पूरा माहौल 'मोदी-मोदी' के नारों से गूंज उठा. चेहरे पर मुस्कान लिए प्रधानमंत्री लोगों का अभिवादन कर रहे थे. अचानक उनका काफिला रुका. वो गाड़ी से उतरे और पैदल चलना शुरू किया. ये मंजर अलग था.
एक झलक पाने के लिए बेताब रही जनता
सुरक्षा के घेरे के बावजूद वो समर्थकों के करीब गए. भीड़ में मौजूद कई महिलाएं उन्हें देखकर भावुक हो गईं. कुछ की आंखों से आंसू निकल आए. रोड शो के बाद हमने भीड़ में मौजूद लोगों से बात की. एक महिला ने कहा- 'हम घंटों से इंतजार कर रहे थे, बस एक झलक के लिए.'
इसी भीड़ में आदित्य नाम का एक दृष्टिहीन युवक भी था. उनकी मां उन्हें हाथ पकड़कर यहां लाई थीं. जब हमने पूछा-'आप यहां क्यों आए?' उन्होंने जवाब दिया- 'मैं बदलाव चाहता हूं. मैं प्रधानमंत्री को अपनी बात कहना चाहता था. मैं उन्हें देख नहीं सकता, लेकिन जब वो पास से गुजरे, तो मैंने एक अलग तरह की ऊर्जा महसूस की.'
उनकी मां ने उन्हें बताया था- 'एक तेजस्वी चेहरा, आंखों में चमक और आत्मविश्वास से भरा व्यक्तित्व तुम्हारी ओर आ रहा है.' उसी वर्णन और माहौल की गूंज से आदित्य ने उस पल को महसूस किया.
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रोड शो खत्म होते-होते पूरा इलाका जाम में बदल चुका था. हमारी गाड़ी हम तक नहीं पहुंच पा रही थी. हमें फिर से लंबा पैदल सफर तय करना पड़ा. रास्ते में एक जगह रुककर बंगाल की चाय पी, थोड़ी राहत मिली. फिर पानी लेकर आगे बढ़े और आखिरकार अपनी गाड़ी तक पहुंचे.
शरीर थक चुका था, लेकिन दिमाग अब भी उसी दिन की घटनाओं में उलझा था. नंदीग्राम का चुनावी तनाव, कोलाघाट का ढाबा, हावड़ा की भीड़, ढाक की आवाज, और 'मोदी-मोदी' के नारों से गूंजती सड़कों का वो अनुभव. ये सिर्फ एक रिपोर्टिंग नहीं थी, ये एक दिन में बंगाल के कई रंगों को जीने जैसा था.