एक दृष्टिबाधित बच्ची के उंगलियों के दर्द को देखकर हिमाजा ने 'रुद्र' नाम का एक ऐसा वाइस इनेबल्ड ब्रेल प्रिंटर तैयार किया है, जो बोलकर दिए गए निर्देशों को सीधे पन्नों पर ब्रेल लिपि में छाप देता है. हिमाजा की इस अद्भुत खोज को वर्ष 2026 के प्रतिष्ठित 'जेम्स डायसन अवॉर्ड' का नेशनल विनर चुना गया है.
'एक सवाल', जिसने बदल दी सोच
इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग की छात्रा हिमाजा जब अपने कॉलेज प्रोजेक्ट के सिलसिले में एक दृष्टिबाधित स्कूल में गईं, तो वहां उन्होंने एक बच्ची को पारंपरिक स्लेट और पिन से ब्रेल लिखते देखा. बार-बार कागज में छेद करने की वजह से उस बच्ची की उंगलियों के पोर सख्त और जख्मी हो चुके थे.
ब्रेल लिपि में कागज के पीछे से उल्टे अक्षर पंच करने पड़ते हैं ताकि पन्ना पलटने पर सीधे पढ़े जा सकें. इस प्रक्रिया में बच्चों को काफी मानसिक और शारीरिक मशक्कत करनी पड़ती है.
हिमाजा ने पहले 6 बटन वाला एक मैनुअल प्रिंटर बनाया. लेकिन जब वे उस बच्ची के पास दोबारा गईं, तो उसने मासूमियत से पूछा, 'अक्का (दीदी), हमें बटन दबाने के लिए इतनी ताकत क्यों लगानी पड़े? क्या हम सिर्फ बोलकर नहीं लिख सकते?' उस एक सवाल ने हिमाजा के पूरे प्रोजेक्ट का रुख बदल दिया और यहीं से जन्म हुआ 'RUDHRA' का.
कैसे काम करता है 'RUDHRA'?
यह प्रिंटर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और वॉयस रिकॉग्निशन (Alexa) तकनीक पर काम करता है. इसमें छात्र अपनी आवाज में जो भी बोलेंगे, अलेक्सा उस आवाज को तुरंत टेक्स्ट में बदल देती है. इसके बाद 'रास्पबेरी पाई' चिप उस टेक्स्ट को ब्रेल पैटर्न में कन्वर्ट करती है. यह मशीन सॉलेनोइड्स और गणितीय गणनाओं के जरिए कागज पर बिल्कुल सटीक दूरी पर ब्रेल के बिंदु (डॉट्स) उभार देती है. अब दृष्टिबाधित छात्रों को हाथ से पिन चुभाने की जरूरत नहीं है, मशीन खुद-ब-खुद पूरा पन्ना ब्रेल में प्रिंट कर देती है.
मिला जेम्स डायसन अवार्ड
जेम्स डायसन फाउंडेशन ने हिमाजा को इंडिया नेशनल विनर चुना है. उन्हें करीब 6 लाख रुपये की प्राइज मनी मिलेगी और अब वे अंतर्राष्ट्रीय राउंड में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगी, जहां सर जेम्स डायसन खुद फाइनल विनर चुनेंगे. फिलहाल इस प्रोटोटाइप की लागत ₹1.5 लाख के करीब है, लेकिन हिमाजा इसे री-डिजाइन करके ₹50,000 से ₹60,000 के बीच लाने की कोशिश कर रही हैं.
हिमाजा का विजन है कि RUDHRA प्रिंटर हर स्कूल और क्लासरूम में एक पर्सनल कंप्यूटर की तरह रखा जाए, ताकि दृष्टिबाधित छात्र परीक्षाओं के दौरान किसी 'राइटर' पर निर्भर रहे बिना खुद अपने नोट्स और किताबें प्रिंट कर सकें. कुचिपुड़ी डांसर और गिटार वादक हिमाजा कहती हैं कि इन बच्चों को हमारी हमदर्दी नहीं, बल्कि ऐसे समाधानों की जरूरत है जो इनकी रोजमर्रा की जिंदगी को आसान बना सकें.
हिमाजा की यह सोच साबित करती है कि जब तकनीक में संवेदना जुड़ जाती है, तो ऐसे आविष्कार होते हैं जो देश और दुनिया की तस्वीर बदल देते हैं.