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मां तो मां होती है! न बोल सकती है न सुन सकती है, बेटे ने पढ़ाया तो 10वीं में ले आईं 82% मार्क्स

22 साल के लंबे अंतराल के बाद 45 की उम्र में किताबें उठाकर 10वीं की परीक्षा में 82% अंक हासिल करना कोई आम उपलब्धि नहीं है. सुनने और बोलने में असमर्थ कश्मीरी विस्थापित रेनू हंस ने सिद्ध कर दिया कि अगर इरादे मजबूत हों, तो परिस्थितियां कभी रुकावट नहीं बन सकतीं. इस पूरी यात्रा में उनके 12वीं में पढ़ने वाले बेटे नमन ने उनका सहारा बनकर मां के सरकारी नौकरी के सपने को नई उड़ान दी है.

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कश्मीरी पंडित रेनू हंस ने 22 साल बाद पढ़ाई कर दिखाया कमाल (Photo: aajtak.in)
कश्मीरी पंडित रेनू हंस ने 22 साल बाद पढ़ाई कर दिखाया कमाल (Photo: aajtak.in)

उम्र 45 साल, सुनने और बोलने में असमर्थ… लेकिन हौसला ऐसा कि 22 साल के लंबे अंतराल के बाद दोबारा पढ़ाई शुरू की और अपनी मेहनत के दम पर 500 में से 406 अंक (82%) हासिल किए. यह कहानी है कश्मीरी पंडित रेनू हंस की, जिन्होंने अपनी परिस्थितियों को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया.

जम्मू के कश्मीरी विस्थापित शिविर में रहने वाली रेनू हंस ने 'जम्मू-कश्मीर स्टेट ओपन स्कूलिंग' (JKSOS) के माध्यम से अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू की. इतने लंबे अंतराल के बाद दोबारा शिक्षा से जुड़ना उनके लिए आसान नहीं था, लेकिन परिवार के सहयोग और खास तौर पर उनके बेटे नमन कौल के प्रोत्साहन ने उन्हें आगे बढ़ने का हौसला दिया. आइए जानते हैं उनकी सक्सेस स्टोरी

आर्थिक तंगी के बीच नहीं टूटी हिम्मत

रेनू के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी बेहद खास है क्योंकि वे सुन और बोल नहीं सकतीं. उनके पति बबलू कौल भी मूक-बधिर हैं और सिलाई का काम (टेलर मास्टर) करते हैं. परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद सामान्य है, लेकिन इसी संघर्ष के बीच रेनू ने अपने अधूरे सपने को पूरा करने की ठानी.

मां का गुरु बना 12वीं में पढ़ने वाला बेटा

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रेनू के बेटे नमन कौल खुद 12वीं कक्षा में पढ़ रहे हैं. उन्होंने अपनी मां को लगातार पढ़ाई के लिए प्रेरित किया. नमन अब अपनी मां को कंप्यूटर सिखाने के साथ-साथ उन्हें आगे 12वीं की पढ़ाई के लिए भी तैयार कर रहे हैं.

रेनू का सपना यहीं रुकने वाला नहीं है. वे आगे की पढ़ाई पूरी कर सरकारी नौकरी हासिल करना चाहती हैं ताकि अपने पैरों पर खड़ी हो सकें. नमन बताते हैं कि मां का सरकारी नौकरी का सपना इसलिए भी है क्योंकि उनके साथ के कई लोग सरकारी सेवा में हैं. उनमें लिखने की अच्छी प्रतिभा है और वे घर का सारा काम भी बखूबी संभालती हैं.

रेनू हंस के बेटे नमन कौल बताते हैं कि हम परिवार में तीन ही लोग हैं, माता, पिता और मैं. मेरे माता-पिता दोनों न सुन सकते हैं और न बोल सकते हैं, जो मेरे लिए एक बड़ी जिम्मेदारी और चुनौती थी. मैं ही उनका इकलौता सहारा था. मैं समय निकालकर मां को पढ़ाता था. हालांकि इसमें उनके स्कूल के शिक्षकों की भी अहम भूमिका रही, लेकिन हमने लक्ष्य तय किया था और मैंने मां से कहा था कि आप यह कर सकती हैं.

विस्थापित शिविर के संघर्षों से निकली सफलता की राह

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आर्थिक तंगी का जिक्र करते हुए नमन बताते हैं कि वे जगती/शिवाड़ विस्थापित शिविर में रहते हैं. पिता की सिलाई की कमाई और सरकार से मिलने वाली रिलीफ सहायता पर ही उनका गुजारा चलता है.

रेनू की यह सफलता सिर्फ 82% अंक हासिल करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन तमाम लोगों के लिए एक मिसाल है जो उम्र या विपरीत परिस्थितियों के कारण अपने सपनों को अधूरा छोड़ देते हैं. 22 साल बाद दोबारा किताब उठाकर रेनू हंस ने साबित कर दिया कि नई शुरुआत की कोई उम्र नहीं होती. आज पूरे कश्मीरी पंडित समाज के साथ हर कोई उनके इस जज्बे को सलाम कर रहा है.

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