पहले की जेनरेशन्स के लिए नौकरी में प्रमोशन सिर्फ पद बढ़ने का नाम नहीं था, बल्कि ज्यादा जिम्मेदारियां संभालना भी करियर ग्रोथ का हिस्सा माना जाता था. बॉस का भरोसा और कंधों पर बढ़ती जिम्मेदारियां अक्सर उपलब्धि की तरह देखी जाती है. लेकिन Gen-Z ने यहां भी गेम बदल दिया है.
वह मेहनत करना चाहता है और अपने काम का क्रेडिट भी लेना चाहता है, लेकिन उसके साथ बढ़ने वाला वर्कलोड और प्रेशर हमेशा एक्सेप्ट करना जरूरी नहीं समझता. आसान शब्दों में कहें तो Gen-Z को काम से नहीं, बल्कि ‘टू मच प्रेशर’ और लगातार बढ़ती जिम्मेदारियों से डर लगता है.
क्यूंकि फ्री विल और अपनी शर्तों पर काम करते हुए जहां यह जेनरेशन ज्यादा बेहतर परफॉर्म करती है, वहीं प्रमोशन के साथ आने वाली बड़ी जिम्मेदारियां उसे प्रमोशन मिलने से पहले ही दबाव महसूस करा देती है.
ऐसा ही एक एग्जाम्पल चीन से सामने आया है. यहां कई युवा कर्मचारी अब प्रमोशन ठुकरा रहे हैं, जिसे “Conscious Unbossing” कहा जा रहा है. उनका मानना है कि प्रमोशन के साथ जिम्मेदारियां, काम के घंटे और प्रेशर बढ़ जाता है. इसलिए वे करियर में ऊपर जाने के बजाय वर्क-लाइफ बैलेंस, पर्सनल ग्रोथ और बेहतर सैलरी को प्राथमिकता दे रहे हैं.
सोशल मीडिया पर लोग बॉस को प्रमोशन के लिए मना करने की स्क्रिप्ट्स भी शेयर कर रहे हैं. आसान शब्दों में, इसका मतलब है मैनेजर या बॉस बनने की रेस से जानबूझकर पीछे हटना.
2025 में एक रिसर्च आई थी, Robert Walters की तरफ से. इसमें बताया गया है कि 54% Gen-Z professionals ने कहा कि वे अपने करियर में मैनेजर नहीं बनना चाहते. वहीं, 71% लोग दूसरों को मैनेज करने के बजाय अपने करियर में आगे बढ़ना और अपनी स्किल्स पर फोकस करना पसंद करते हैं.
रिसर्च में 65% Gen-Z ने middle-management को ज्यादा तनाव और कम फायदे वाली नौकरी बताया. हालांकि, 89% employers अब भी मानते हैं कि किसी भी कंपनी के लिए middle managers जरूरी हैं. इन आंकड़ों से साफ है कि Gen-Z के लिए करियर में आगे बढ़ने का मतलब सिर्फ बॉस बनना नहीं है. वे अच्छी कमाई के साथ कम प्रेशर, फ्रीडम और बेहतर वर्क लाइफ बैलेंस को भी अहमियत दे रहे हैं.
पैसे से ज्यादा वर्क लाइफ बैलेंस
Gen-Z काम करना चाहती लेकिन उस काम के दौरान वो खुद को पूरी तरह भूल जाना या समर्पित नहीं करना चाहती, जो कि शायद वर्क लाइफ में हमेशा से एक प्रचलन रहा है. जेन-जी अपने लाइफ में हमेशा वर्क लाइफ बैलेंस को प्रायरटाइज करते है. काम करना है लेकिन अपनी सैनिटी और मेंटल हेल्थ को दांव पर लगाकर काम नहीं करना.
सिर्फ बड़ा पद और बेहतर टाइटल ही जेन-जी के लिए सक्सेस का स्केल नहीं है. कई जेन-जी कर्मचारी यह सोच रहे हैं कि अगर प्रमोशन के साथ उन्हें ज्यादा काम, टीम मैनेज करने की जिम्मेदारी और लगातार अवेलएबल रहने का प्रेशल मिलेगा, तो क्या इसके बदले मिलने वाली सैलरी और कंवीनीयंस क्या उनके लिए इनफ होगी? और अगर नहीं होगी तो जेन-जी वो रोल निभाए ही क्यों?
‘No’ कहना भी Career Choice है
यह ट्रेंड सिर्फ काम से बचने की कोशिश नहीं है. इसके पीछे करियर को लेकर बदलती सोच भी है. Gen-Z अपने लिए यह खुद डिसाइड करना चाहता है कि उसे किस तरह का काम, कितना प्रेशर और कितनी जिम्मेदारी लाइफ के किस स्टेज पर एक्सेप्ट करनी है.
जहां पुरानी जेनरेशन्स में प्रमोशन को सक्सेस की सीढ़ी माना जाता था, वहीं Gen-Z के लिए मेंटल हेल्थ,वर्क स्पेस में फ्लैक्सिबिलिटी और वर्क लाइफ बैलेंस भी उतने ही जरूरी हो गए हैं. यानी अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि ‘अगला प्रमोशन कब मिलेगा?’ बल्कि यह भी है कि ‘क्या मुझे वाकई वह प्रमोशन चाहिए?’ जेन-जी की भाषा में बोले ते- 'डू आय रियली नीड टू टेक अप दिस रोल'?