13 सालों से दिल्ली के एक पार्क उन बच्चों के लिए स्कूल बना हुआ है, जिनके माता-पिता मजदूरी, रिक्शा चलाने या दिहाड़ी काम में लगे हैं. द्वारका के बालाजी पार्क में नमिता चौधरी ने जब पढ़ाना शुरू किया था, तब उनके पास सिर्फ पांच बच्चे थे. आज इस पहल से 200 से ज्यादा बच्चे जुड़े हुए हैं. इसके साथ ही प्रौढ़ साक्षरता (एडल्ट लिट्रेसी) और सशक्तीकरण अभियानों के जरिए 100 से अधिक महिलाओं तक भी मदद पहुंचाई गई है.
यहां कोई बड़े-बड़े या आलीशान क्लासरूम नहीं हैं. लेकिन यहां पढ़ाई के साथ-साथ ड्राइंग सेशंस, स्पोकेन इंग्लिश की कक्षाएं और ऐसी गतिविधियां आयोजित होती हैं जो बच्चों को किताबों से परे जाकर उनकी प्रतिभा पहचानने में मदद करती हैं.
नमिता के लिए इस सफर की शुरुआत एक बेहद सीधे सवाल से हुई थी, वे अपने समय का उपयोग कैसे करें जिससे किसी और की जिंदगी बेहतर बन सके? नमिता कहती हैं, 'जब मैं इस दुनिया से जाऊं, तो मुझे इस बात का सुकून होना चाहिए कि मैंने कम से कम एक इंसान के चेहरे पर मुस्कान लाई और कम से कम एक बच्चे को शिक्षित किया.'
उनकी इस सोच को एक अनाथालय के उनके पुराने अनुभव ने भी आकार दिया था. दिल्ली आने के बाद उन्हें यह गहराई से महसूस हुआ कि वे अपने समय का इस्तेमाल किसी सार्थक काम में करना चाहती हैं.
पांच बच्चों से 200 से अधिक की यात्रा
शुरुआत में ये कक्षाएं निर्माण स्थलों (कन्स्ट्रक्शन साइट्स) के आसपास रहने वाले प्रवासी मजदूरों के बच्चों पर केंद्रित थीं. जैसे-जैसे इस पहल की चर्चा फैली, आसपास के परिवारों ने भी अपने बच्चों को भेजना शुरू कर दिया.
नमिता बताती हैं कि उनकी टीम को जल्द ही अहसास हुआ कि इन बच्चों को सिर्फ किताबी ज्ञान की नहीं, बल्कि उससे कहीं ज्यादा मदद की जरूरत है. कुछ बच्चे पढ़ाई में इसलिए पिछड़ रहे थे क्योंकि उन्हें कभी सही माहौल ही नहीं मिला, जबकि कई बच्चों में ड्राइंग, डांस या बातचीत की शानदार प्रतिभा थी, जिसे बस थोड़ा निखारने की जरूरत थी.
इसी सोच के साथ कक्षाओं का दायरा बढ़ाया गया.
नमिता बताती हैं, 'हमारे पास ऐसे डांसर बच्चे हैं जिन्हें हमने कभी औपचारिक तौर पर डांस नहीं सिखाया. हमने सिर्फ उनसे सही तरीके से प्रैक्टिस करने को कहा, और वे खुद ही अपनी प्रतिभा निखारकर हमारे सामने ले आए.'
अंग्रेजी बोलने पर विशेष ध्यान दिया जाता है, खासकर उन बच्चों के लिए जो हिंदी माध्यम के सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं और सार्वजनिक रूप से बोलने में झिझकते हैं.
जो कभी छात्र थे, वे अब बन चुके हैं शिक्षक
इस पूरी पहल का सबसे बड़ा और सकारात्मक असर उन पुराने छात्रों में दिखता है जो कभी यहां पढ़ने आते थे.
नमिता के अनुसार, इस मुहिम से पढ़े 100 से अधिक बच्चे स्नातक पूरा कर चुके हैं. इनमें से कई अब अच्छी नौकरियां कर रहे हैं या करियर की तैयारी में जुटे हैं. एक पूर्व छात्रा जेपी पंत अस्पताल में रिसेप्शनिस्ट के रूप में कार्यरत है, तो दूसरी टीचर ट्रेनिंग पूरी कर खुद शिक्षिका बन चुकी है. वहीं कई अन्य बच्चे प्राइवेट स्कूलों और ट्रैवल सेक्टर में काम कर रहे हैं. और सबसे खूबसूरत बात यह है कि इनमें से कुछ बच्चे वापस उसी पार्क में लौट आए हैं.
कोमल पहली बार तीसरी कक्षा की छात्रा के रूप में यहां आई थीं. उनके पिता रिक्शा चलाते हैं और मां घरेलू सहायिका के रूप में काम करती हैं. कोमल बताती हैं कि घर की पाबंदियों और झिझक के कारण वे किसी से बात तक करने में कतराती थीं. आज वही कोमल उसी पार्क में छोटे बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाती हैं.
कोमल कहती हैं, 'मैं किसी से भी बात करने में शर्माती थी, लेकिन आज मैंने बोलना और बच्चों को पढ़ाना दोनों सीख लिया है.' नमिता के लिए यही सबसे बड़ी कामयाबी है कि जिन बच्चों ने कभी मदद के लिए हाथ बढ़ाए थे, आज वे दूसरों का हाथ थाम रहे हैं.
वे कहती हैं, 'यह सिलसिला रुकना नहीं चाहिए. लोग बदलते रहेंगे, लेकिन इन बस्तियों और समुदायों तक शिक्षा पहुंचाने का प्रयास लगातार जारी रहना चाहिए.' कंपनियों, स्कूलों और ऊंची इमारतों से भरी इस दिल्ली शहर में, यह छोटा सा पार्क बच्चों को पढ़ाई, सपने देखने और खुद आगे बढ़कर दूसरों के लिए दरवाजे खोलने का एक बेहतरीन जरिया दे रहा है.