सरकारी नौकरियों के लिए हर साल लाखों लोग आवेदन करते हैं. कई बार तो एक पद के लिए हजारों फॉर्म भर दिए जाते हैं. इसकी बड़ी वजह यह है कि देश में सरकारी नौकरी को सुरक्षित और आरामदायक माना जाता है. आम सोच यह है कि एक बार सरकारी नौकरी मिल गई तो जिंदगी सेट हो जाती है. न नौकरी जाने का डर, न ज्यादा दबाव. कोरोना काल में जब निजी कंपनियों में लोगों की नौकरी गई या वेतन कम हुआ, तब यह धारणा और मजबूत हो गई कि सरकारी नौकरी सबसे सुरक्षित है. हालांकि यह पूरी तरह सच नहीं है.
सरकार के पास सही से काम न करने, भ्रष्ट या काम में लापरवाही करने वाले अधिकारियों को हटाने का अधिकार होता है. हाल के वर्षों में केंद्र सरकार ने कई बड़े अधिकारियों को समय से पहले रिटायर किया है. रेल और दूरसंचार मंत्री अश्विनी वैष्णव ने भी पद संभालने के बाद कामचोरी और भ्रष्टाचार में शामिल कई अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की. उन्होंने दूरसंचार विभाग के 10 वरिष्ठ अधिकारियों को जबरन सेवानिवृत्त किया था.
क्या सरकारी नौकरी में कम होता है काम का प्रेशर
आज के समय में कई लोगों को लगता है कि प्राइवेट नौकरी की तुलना में सरकारी नौकरी में दबाव कम होता है. कर्मचारियों को तय समय पर वेतन मिलता है, छुट्टियां लेने में ज्यादा परेशानी नहीं होती और महंगाई भत्ता जैसे कई लाभ भी मिलते रहते हैं. रिटायरमेंट के बाद पेंशन की सुविधा भी मिलती है, जिससे बुढ़ापे में आर्थिक सहारा रहता है. लेकिन नियमों के अनुसार सरकार जरूरत पड़ने पर किसी कर्मचारी को समय से पहले रिटायर कर सकती है. सेंट्रल सिविल सर्विसेज (पेंशन) नियम 1972 के तहत, अगर कोई अधिकारी 30 साल की सेवा पूरी कर चुका हो या 50 साल की उम्र पार कर चुका हो, तो जनहित में उसे समयपूर्व रिटायर किया जा सकता है. इसका मकसद प्रशासनिक कामकाज को बेहतर बनाना और विभाग की कार्यकुशलता बढ़ाना होता है.
हर सरकारी विभाग तैयार करता है गोपनीय रिपोर्ट
कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के अनुसार, सक्षम अधिकारी एफआर 56(जे) और अन्य संबंधित नियमों के तहत यह फैसला ले सकते हैं. हालांकि, जिस कर्मचारी को समय से पहले रिटायर किया जाता है, उसे अपना पक्ष रखने का मौका भी दिया जाता है. वह आदेश जारी होने के तीन हफ्ते के भीतर प्रतिनिधित्व कर सकता है. हर सरकारी विभाग अपने अधिकारियों की गोपनीय रिपोर्ट तैयार करता है.
अगर किसी अधिकारी पर भ्रष्टाचार, अक्षमता या अनियमितता के आरोप सही पाए जाते हैं, तो उसे नोटिस देकर और तीन महीने का वेतन-भत्ता देकर रिटायर किया जा सकता है. इसी तरह की कार्रवाई के तहत दूरसंचार विभाग के अधिकारियों को हटाया गया. इससे पहले सरकारी दूरसंचार कंपनी भारत संचार निगम लिमिटेड (BSNL) के एक वरिष्ठ अधिकारी को बैठक में लापरवाही के कारण स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति दी गई थी. रेलवे विभाग में भी कई अधिकारियों को समय से पहले रिटायर किया गया है.
सस्पेंड और बर्खास्त में काफी फर्क
सरकारी नौकरी पूरी तरह सुरक्षित जरूर मानी जाती है, लेकिन अगर कोई अधिकारी अपने काम में लापरवाही या भ्रष्टाचार करता है, तो सरकार उसके खिलाफ सख्त कदम उठा सकती है. सरकारी नौकरी में अक्सर सुनने को मिलता है कि किसी कर्मचारी को सस्पेंड (निलंबित) कर दिया गया या बर्खास्त (डिसमिस) कर दिया गया. लेकिन बहुत से लोग इन दोनों शब्दों का सही मतलब और इनके बीच का अंतर नहीं समझ पाते. दरअसल, जब कोई सरकारी कर्मचारी नियमों का उल्लंघन करता है या उस पर किसी तरह का आरोप लगता है, तो विभाग उसके खिलाफ कार्रवाई करता है. यह कार्रवाई दो तरह की हो सकती है—निलंबन या बर्खास्तगी.
इन दोनों स्थितियों में कर्मचारी की नौकरी, सैलरी और भविष्य पर अलग-अलग असर पड़ता है. इसलिए यह जानना जरूरी है कि सस्पेंड और बर्खास्त होने का मतलब क्या है और इनका कर्मचारी पर क्या प्रभाव पड़ता है. सरकारी नौकरी में अक्सर सुनने को मिलता है कि किसी कर्मचारी को सस्पेंड कर दिया गया या बर्खास्त कर दिया गया. लेकिन बहुत लोग इन दोनों के बीच का फर्क ठीक से नहीं समझ पाते. आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं.
सस्पेंड (निलंबित) होने का मतलब क्या है?
जब किसी सरकारी कर्मचारी पर नियम तोड़ने या गलत काम करने का आरोप लगता है, तो जांच पूरी होने तक उसे निलंबित (Suspend) किया जा सकता है.
दोनों में मुख्य अंतर
| सस्पेंड (निलंबन) | बर्खास्त (Dismiss) |
| अस्थायी कार्रवाई | स्थायी कार्रवाई |
| जांच पूरी होने तक काम से हटाया जाता है | नौकरी पूरी तरह खत्म |
| आधी सैलरी मिलती है | कोई सैलरी नहीं मिलती |
| वापस नौकरी मिलने की संभावना | दोबारा नौकरी नहीं मिलती |
सस्पेंड होने पर क्या होता है?
बर्खास्त (Dismiss) होने का मतलब क्या है?
जब जांच में कर्मचारी दोषी साबित हो जाता है, तो विभाग उसे बर्खास्त (Dismiss) कर सकता है.
बर्खास्त होने पर क्या होता है?
कर्मचारी की नौकरी पूरी तरह खत्म हो जाती है.
उसे कोई सैलरी या भत्ता नहीं मिलता.
वह दोबारा उसी विभाग में नौकरी पर वापस नहीं आ सकता.
आमतौर पर वह दूसरी सरकारी नौकरी के लिए भी आवेदन नहीं कर सकता.
कुछ मामलों में उस पर चुनाव लड़ने या सरकारी पद लेने पर भी रोक लग सकती है. यानी बर्खास्त होना स्थायी और गंभीर कार्रवाई है.