सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म रेडिट पर एक अभ्यर्थी के छोटे से वीडियो और कैप्शन पर नई बहस छिड़ गई है. इसमें अभ्यर्थी बता रहा है कि साल 2017 से 2026 तक लगातार 10 बार नीट-यूजी (NEET UG) की परीक्षा दे रहा है. इसके बावजूद जब एमबीबीएस की सीट नहीं मिली, तो छात्र ने आखिरकार अपनी हार स्वीकार कर ली.
हैरत की बात यह है कि इस पोस्ट पर उसे इंटरनेट पर सहानुभूति से ज्यादा 'गुस्सा' और 'आलोचना' का सामना करना पड़ रहा है. यही नहीं लोग एजुकेशन सिस्टम पर 'तीखे सवाल' भी करने लगे. लोगों ने पूछा कि आखिर 11वीं और 12वीं के सिलेबस को 10 सालों तक रटते रहना किसकी नादानी है, छात्र की, उसके परिवार की या देश के लचर कॉम्पिटिटिव एग्जाम सिस्टम की? आइए समझते हैं रेडिट पर आए छिड़ी बहस को, जिसने भारत के 'ड्रॉप कल्चर' पर गंभीर सवाल उठाए हैं.
'यह गर्व की बात नहीं, परिवार पर बोझ है'
सोशल मीडिया पर एक यूजर ने साफ लिखा कि 10 साल तक एक ही परीक्षा में उलझे रहना कोई शेखी बघारने या गर्व करने वाली बात नहीं है. यह छात्र और उसके परिवार के लिए पैसों का भारी नुकसान और मानसिक प्रताड़ना है. वहीं एक अन्य यूजर ने अपने जूनियर्स और रिश्तेदारों को सलाह देते हुए लिखा कि हमेशा पहला मौका 12वीं के साथ दें. फिर दूसरा मौका 1 साल की कड़ी मेहनत या कोचिंग के साथ ड्रॉप लें. आखिर में तीसरा मौका सिर्फ तब सोचें अगर आपके माता-पिता पहले से डॉक्टर हैं और बैकअप मजबूत है. इसके अलावा 3-4 साल बर्बाद करने का कोई मतलब नहीं है.
'सिस्टम में ही खोट है'- एक डॉक्टर का तीखा वार
विदेश से एमबीबीएस (MBBS) करके भारत में एफएमजीई (FMGE) क्रैक कर चुके एक डॉक्टर ने इस पूरी बहस पर गहरा सवाल उठाया. उन्होंने लिखा कि 10 बार नीट देना अभ्यर्थी से ज्यादा हमारे सिस्टम की नाकामी को दर्शाता है. किसी 17-18 साल के बच्चे का पूरा भविष्य सिर्फ एक परीक्षा से तय कर देना कहां का न्याय है? नीट कोई बराबरी का मैदान नहीं है. यहां जिसके पास पैसा, कोचिंग, समय और माता-पिता का सपोर्ट है, वह 10 बार परीक्षा दे सकता है. लेकिन एक गरीब छात्र, जो उतना ही काबिल है, 1-2 अटेम्प्ट से ज्यादा अफोर्ड नहीं कर सकता.
डॉक्टर ने कोचिंग सेंटरों के 'मायाजाल' पर हमला करते हुए कहा कि एक क्लास में 50 छात्र भारी फीस देकर बैठते हैं, लेकिन सीटें तो सीमित हैं! कोचिंग वाले छात्रों को यह झूठा सपना बेचते रहते हैं कि 'बस थोड़ी और मेहनत करो, हो जाएगा', और इसी चक्कर में युवा अपनी पूरी जवानी 11वीं-12वीं की किताबों में ही गुजार देते हैं.
'एमबीबीएस मिल भी जाता, तो आगे क्या करते?'
एक अन्य यूजर ने 10 अटेम्प्ट लेने वाले छात्र की व्यावहारिक समझ पर सवाल उठाते हुए लिखा कि अगर 10वें अटेम्प्ट में उसे एमबीबीएस की सीट मिल भी जाती, तो आगे क्या होता? 5.5 साल का एमबीबीएस, फिर 3 साल का पीजी और फिर 5-6 साल का क्लिनिकल अनुभव... यानी अच्छी कमाई के लिए 40 की उम्र पार हो जाती. जो छात्र 10 अटेम्प्ट में भी नीट-यूजी में 450-500 नंबर नहीं ला पा रहा, वो नीट-पीजी कैसे निकालेगा जो इससे कहीं ज्यादा कठिन है?
वैसे सुप्रीम कोर्ट और नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने नीट से अपर एज लिमिट और अटेम्प्ट्स की सीमा भले ही हटा दी हो, लेकिन रेडिट पर छिड़ी यह बहस हर छात्र को आईना दिखाती है. क्या अपनी जिंदगी के सबसे कीमती 8-10 साल केवल एक एंट्रेंस एग्जाम के चक्रव्यूह में गंवा देना कोई बुद्धिमानी है. करियर में 'मूव ऑन' करना और समय रहते बैकअप प्लान (Plan B) चुनना ही असली सफलता है.