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क्या कंपनियों को खल रही है कर्मचारियों की कमी? फूटने लगा है AI का बुलबुला

पिछले कुछ समय से बड़ी-बड़ी टेक कंपनियों में मंदी और छंटनी का दौर देखने को मिल रहा है जिसकी सबसे बड़ी वजह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) है. पहले ऐसा बोला जा रहा था कि एआई इंसानों की जगह ले लेगा जिससे लागत कम होगी और मुनाफा कई गुना बढ़ जाएगा. इस चक्कर में टेक कंपनियों ने बिना सोचे-समझे लाखों कर्मचारियों की छंटनी कर दी. लेकिन अब साल 2026 में पासा पलटता दिख रहा है. ऐसा लग रहा है मानों अब कंपनियों को ये छंटनी खलने लगी है.

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AI more expensive than humans
AI more expensive than humans

हाल के समय में जो शब्द टेक कंपनियों में सबसे ज्यादा यूज हुआ है वह है छंटनी और एआई. वैश्विक टेक जगत में पिछले कुछ समय में छंटनी शब्द किसी खौफनाक साये की तरह मंडरा रहा था जिसके पीछे सबसे बड़ी वजह थी एआई. जिसने कंपनियों को यह भरोसा दिलाया था कि इंसान अब आउटडेटेड हो चुके हैं.  

बोर्डरूम्स में बड़े-बड़े दावे किए गए कि एआई इंसानों की जगह लेगा, इसके यूज से ऑपरेशनल लागत आधी हो जाएगी और मुनाफे का ग्राफ आसमान छूने लगेगा. इसी अंधी दौड़ में आकर टेक दिग्गजों ने बिना सोचे-समझे अपनी सबसे बड़ी ताकत यानी लाखों अनुभवी कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया. लेकिन कहते हैं न वक्त का पहिया जरूर घूमता है. समय एक जैसा नहीं होता है और वैसा ही हुआ. 

जिस एआई को लागत घटाने का मसीहा समझा गया था, आज वही कंपनियों की तिजोरी खाली करने वाला सबसे महंगा सौदा साबित हो रहा है. आलम यह है कि अंधा-धुंध छंटनी करने वाली कंपनियों को अब काम की सुस्ती, भारी-भरकम बिजली-टोकन के बिलों और सबसे बढ़कर अनुभवी इंसानी दिमाग की कमी बुरी तरह खलने लगी है. तकनीक के इस नए दौर में अब एक गंभीर सवाल उठ खड़ा हुआ है. क्या एआई का बुलबुला फूटने की कगार पर है और क्या कंपनियों ने एक बड़ी गलती कर दी है? 

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बता दें कि कंपनियों के सामने अब एक कड़वी हकीकत आई है और वह ये है कि AI, इंसानी श्रम से कहीं ज्यादा महंगा साबित हो रहा है. कंपनियों को भारी वित्तीय नुकसान का सामना करना पड़ रहा है और अब उन्हें निकाले गए अनुभवी कर्मचारियों की कमी खलने लगी है. 

AI बन रहा है महंगा सौदा 

कंपनियों ने जिस AI को लागत कम करने और फाइनेंशियल बोझ पर काबू पाने का एक तरीका समझा था वह आज के दौर में पैसा खाने वाली मशीन के रूप में सामने आ रही है. एआई मॉडल्स को चलाने के लिए बड़े डेटा सेंटर्स, हजारों महंगे GPU चिप्स और भारी-भरकम बिजली की जरूरत होती है.

इस कड़ी में उबर के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर (COO) एंड्रयू मैकडोनाल्ड ने खुलासा किया है कि उनकी कंपनी ने साल 2026 के लिए तय किया गया पूरा एआई बजट साल के शुरुआती चार महीनों में ही फूंक दिया. कंपनी को समझ नहीं आ रहा है कि एआई पर हो रहे इस भारी खर्च के बदले उन्हें क्या फायदा मिल रहा है. 

वहीं, माइक्रोसॉफ्ट बढ़ती लागत को देखते हुए अपने इंजीनियर्स के लिए Claude Code का लाइसेंस और एक्सेस कम करना शुरू कर दिया है ताकि वे अपने ऑपरेशनल खर्च को नियंत्रित कर सकें. रिपोर्ट्स के मुताबिक, एआई के बढ़ते इस्तेमाल की वजह से एक समय पर एक क्लाइंट का एआई बिल एक महीने में $500 मिलियन (करीब 4200 करोड़ रुपये) तक पहुंच गया था यानी सिर्फ मॉडल्स को लाइव रखने के लिए रोजाना लगभग 17 मिलियन डॉलर जल रहे थे. 

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छंटनी का भारी नुकसान और कर्मचारियों की कमी

कंपनियों ने एआई के भरोसे जिन वाइट-कॉलर और एंट्री-लेवल कर्मचारियों को नौकरी से निकाला था, अब उनकी कमी सबसे ज्यादा खल रही है. एआई उतनी तेजी से काम नहीं कर पाया है जितनी कंपनियों को उम्मीद थी. एआई की ओर से जेनरेट किए गए कोड, कंटेंट या डेटा को ठीक करने और उसे री-चेक करने के लिए अब कंपनियों के पास पर्याप्त अनुभवी वर्कफोर्स ही नहीं बची है. जो टेक प्रोफेशनल पहले कह रहे थे कि इंसानों की जरूरत खत्म हो जाएगी, अब वे मान रहे हैं कि इंसानी स्किल्स, क्रिटिकल थिंकिंग और टीमवर्क की जगह कोई तकनीक नहीं ले सकती. 

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