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विदेश की नौकरी छोड़ IIT-IIM में क्यों लौट रहे यंग स्कॉलर्स? जानिए 'प्रोफेसर' बनने का नया ट्रेंड

IIM बैंगलोर और कोझिकोड जैसे टॉप संस्थानों में विदेशों से पीएचडी और रिसर्च करके लौटे युवा प्रोफेसरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. विदेशों में पढ़ाई और रिसर्च करने वाले भारतीय स्कॉलर्स अब भारत के मैनेजमेंट संस्थानों में अपना करियर बना रहे हैं. जानिए क्या हैं इसके पीछे के सामाजिक, आर्थिक और अकादमिक कारण.

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अमेरिका में 10 साल रहने के बाद एक शख्स भारत लौट गया है. (Photo: Pexels)
अमेरिका में 10 साल रहने के बाद एक शख्स भारत लौट गया है. (Photo: Pexels)

शिल्पा सतीश के लिए भारत लौटना सिर्फ अपने घर वापस आने जैसा नहीं था. ये एक ऐसा फैसला था, जिसमें वे अपने बच्चे को उसी माहौल और शिक्षा व्यवस्था में बड़ा करना चाहती थीं जिसने उनके खुद के अकादमिक सफर को गढ़ा था. IIM कोझिकोड में असिस्टेंट प्रोफेसर शिल्पा कहती हैं, 'मुझे अपने इस फैसले पर कोई पछतावा नहीं है.' वे चाहती थीं कि उनका बच्चा केरल में मीनाचिल नदी के किनारे, परिवार के प्यार और आपसी सहयोग के बीच पले-बढ़े. इसके साथ ही, पेशेवर रूप से वे भारत की सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली में अपना योगदान देना चाहती थीं.

शिल्पा ने यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ फ्लोरिडा से समाजशास्त्र में पीएचडी की है और उनका ज्यादातर शोध केरल के सामाजिक और पारिस्थितिक परिदृश्य पर आधारित है. उनके लिए भारत लौटने का मतलब ग्लोबल करियर से पीछे हटना नहीं था, बल्कि अपनी रिसर्च को उस धरातल पर आगे बढ़ाना था जिसे वे बेहद करीब से समझती हैं. हालांकि, वे यह भी मानती हैं कि भारतीय संस्थानों में नौकरशाही और सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था की अपनी चुनौतियां हैं.
शिल्पा की तरह ही विदेशों में पढ़ाई करने वाले कई युवा भारतीय स्कॉलर्स अब स्वदेश लौटकर अकादमिक करियर बना रहे हैं.

IIM बैंगलोर में युवाओं का दबदबा

IIM बैंगलोर इसका सबसे सटीक उदाहरण है. 100 से अधिक फैकल्टी वाला यह आईआईएम ज्यादा यंग फैकल्टी के साथअलग ही नजर आता है. यहां कुल 150 फैकल्टी में से लगभग 30% प्रोफेसर 35 वर्ष से कम उम्र के हैं, जबकि कुछ साल पहले यह आंकड़ा 10 से भी कम था. इनमें से कई ऐसे शोधकर्ता हैं जिन्होंने विदेश में अपनी पढ़ाई पूरी की और अंतरराष्ट्रीय अवसरों के ऊपर भारत को चुना.

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आईआईएम बैंगलोर में फैकल्टी और ऑर्गनाइजेशनल बिहेवियर के डीन प्रोफेसर सौरव मुखर्जी बताते हैं कि यह बदलाव पुराने आईआईएम के विकास को दर्शाता है. पहले ये संस्थान मुख्य रूप से पढ़ाई कराने पर केंद्रित थे, लेकिन अब वैश्विक रैंकिंग में सुधार के लिए इनका ध्यान उच्च गुणवत्ता वाले रिसर्च पेपर्स प्रकाशित करने पर केंद्रित हो गया है.

प्रोफेसर मुखर्जी कहते हैं, 'इस बदलाव ने युवा फैकल्टी के महत्व को बढ़ा दिया है. आप अचानक किसी ऐसे वरिष्ठ प्रोफेसर से टॉप-क्वालिटी रिसर्च पेपर्स की उम्मीद नहीं कर सकते जो सालों से प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभाल रहे हों.'

इस बदलाव का फायदा संस्थान को भी मिला है. एफटी (FT) 2025 मास्टर्स इन मैनेजमेंट रैंकिंग में आईआईएम बैंगलोर सात पायदान चढ़कर 21वें स्थान पर पहुंच गया है, जिसका श्रेय बेहतर रिसर्च और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते जुड़ाव को जाता है.

अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क और रिसर्च का फायदा

विदेश में पढ़े प्रोफेसरों के आने से भारतीय संस्थानों को अंतरराष्ट्रीय शोध नेटवर्क, वैश्विक कार्यप्रणालियों का अनुभव और मजबूत रिसर्च पेपर्स का फायदा मिलता है. हालांकि, प्रोफेसर मुखर्जी स्पष्ट करते हैं कि सिर्फ विदेशी डिग्री होना चयन का एकमात्र पैमाना नहीं है. प्राथमिकता उन युवाओं को दी जाती है जो रिसर्च ओर‍िएंटेड हैं और संस्थान के रिसर्च एजेंडे को आगे बढ़ा सकते हैं.

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ब्रेन ड्रेन से 'ब्रेन सर्कुलेशन' का सफर

विदेश से पढ़े स्कॉलर्स का भारत लौटना एक नया ट्रेंड है, हालांकि इसे सीधे तौर पर दशकों से चले आ रहे 'ब्रेन ड्रेन' का पूरी तरह खत्म होना नहीं कहा जा सकता. आईआईएम-बी में इकोनॉमिक्स एरिया की प्रोफेसर अनुभा अग्रवाल का कहना है कि भारत में रिसर्च का माहौल पहले से काफी बेहतर हुआ है, भले ही हम फंडिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में पश्चिमी देशों से थोड़े पीछे हों. पश्चिमी देशों ने दशकों से रिसर्च और इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश किया है, जबकि भारत में बजट का बड़ा हिस्सा सिर्फ पढ़ाई कराने वाले तंत्र पर खर्च हुआ.

हालांकि, अब आईआईएम-बी जैसे संस्थानों में युवा फैकल्टी को काफी अकादमिक स्वतंत्रता, कम टीचिंग लोड, रिसर्च ग्रांट और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भाग लेने के लिए फंडिंग दी जा रही है.

विदेशी वीजा नीतियां और अनिश्चितता भी एक वजह

MDI गुड़गांव में असिस्टेंट प्रोफेसर केदार नाथ ठाकुर इस बदलाव का एक और पहलू उजागर करते हैं. वे बताते हैं कि भारत लौटने के पीछे सिर्फ यहां का आकर्षण ही नहीं, बल्कि बाहरी परिस्थितियां भी जिम्मेदार हैं. 2025 में अमेरिका में रिसर्च फंडिंग में कटौती और वीजा संबंधी अनिश्चितताओं ने कई भारतीय पोस्ट-डॉक्स और पीएचडी छात्रों को वहां करियर बनाने को लेकर असमंजस में डाल दिया था. ऐसे में कई स्कॉलर्स ने भारत लौटने का विकल्प चुना.

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इसके अलावा, भारत का तेजी से बढ़ता उपभोक्ता बाजार, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर (जैसे यूपीआई), गीग इकोनॉमी और एआई (AI) का दायरा शोधकर्ताओं के लिए नए और व्यावहारिक विषय पेश करता है.

टीच‍िंग में भारतीय संदर्भ को समझने की चुनौती

युवा फैकल्टी के आने से जहां रिसर्च को बढ़ावा मिलता है, वहीं उनके सामने एक व्यावहारिक चुनौती भी आती है, वो है'भारतीय संदर्भ को समझना'. प्रोफेसर सौरव मुखर्जी बताते हैं कि आईआईएम की कमाई का एक बड़ा हिस्सा एग्जीक्यूटिव एजुकेशन (वरिष्ठ अधिकारियों के लिए कोर्स) से आता है.

इन अधिकारियों को सिर्फ थ्योरी नहीं पढ़ाई जा सकती, उन्हें भारतीय बाजार और परिस्थितियों के अनुसार व्यावहारिक समझ की जरूरत होती है. विदेश से पीएचडी करके आए युवा प्रोफेसरों में कई बार इस स्थानीय समझ की कमी होती है, जिसे दूर करने के लिए संस्थान विशेष ट्रेनिंग सेंटर चला रहे हैं.

वैश्विक पटल पर भारतीय ज्ञान की पहचान

आईआईएम कोझिकोड के डीन सेबेस्टियन एम.पी. कहते हैं कि वैश्विक जुड़ाव का मतलब पश्चिमी सोच की नकल करना नहीं है. उनका लक्ष्य 'भारतीय विचारों को वैश्विक बनाना' (Globalising Indian Thought) है. डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, वित्तीय समावेशन, स्टार्टअप्स और स्वास्थ्य सेवा जैसे क्षेत्रों में भारत की सफलताएं अब दुनिया के लिए शोध का विषय बन रही हैं.

आख‍िर में कहा जाए तो युवा प्रोफेसरों को भारत खींचने में केवल सैलरी ही नहीं, बल्कि परिसर का माहौल, परिजनों के पास रहने की सुविधा, सांस्कृतिक जुड़ाव और रिसर्च की आजादी जैसे कई पहलू बड़ी भूमिका निभा रहे हैं. भविष्य में भारतीय बी-स्कूल्स की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे इन प्रतिभावान शोधकर्ताओं को अपने साथ बनाए रखने में कितने सफल होते हैं.

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