भारतीय नर्सों के लिए अब विदेश जाने का मतलब सिर्फ एक कॉन्ट्रैक्ट या एक देश में बस जाना भर नहीं रह गया है. दुनिया भर में बढ़ती मांग, स्पेशलाइज्ड स्किल्स और ग्लोबल लेवल पर मान्यता प्राप्त डिग्रियों के बल पर इंटरनेशनल नर्सिंग अब एक लंबा और शानदार करियर पाथ बन चुका है.
पहले जहां भारतीय नर्सें सिर्फ डिग्री पूरी करके, कुछ समय का एक्सपीरियंस लेकर और भाषा की परीक्षा पास करके विदेश चली जाती थीं, वहीं आज का ट्रेंड बिल्कुल अलग है. अब यह केवल एकतरफा पलायन नहीं, बल्कि एक ऐसा ग्लोबल करियर है जिसमें नर्सें एक से ज्यादा देशों में अपनी पहचान बना रही हैं. आइए समझते हैं दुनिया भर में आए इस नए करियर ट्रेंड के बारे में.
एक देश का कॉन्ट्रैक्ट नहीं, अब यह है 'ग्लोबल करियर'
नर्सिंग एक ऐसा पेशा है जहां हर देश के अपने नियम और लाइसेंसिंग प्रोसेस होते हैं. इसके बावजूद अगर आपके पास एक मान्यता प्राप्त योग्यता, रजिस्ट्रेशन, भाषा पर पकड़ और सही वर्क एक्सपीरियंस है, तो दुनिया के सबसे बड़े हेल्थकेयर मार्केट्स आपके लिए दरवाजे खोल देते हैं.
जर्मनी, ब्रिटेन (UK), कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका जैसे देशों में विदेश से आई नर्सों को मान्यता देने का एक तय और आसान सिस्टम है. इसका सीधा मतलब यह है कि किसी नर्स का करियर केवल उस पहले देश तक सीमित नहीं रहता जहां उसे पहला मौका मिला. एक देश में काम करने का अनुभव दूसरे देश में जाने के मुख्य जरिया बन जाता है.
बुजुर्ग होती आबादी और दुनिया भर में नर्सों की भारी किल्लत
अचानक दुनिया भर में नर्सों की मांग इतनी क्यों बढ़ गई? इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है दुनिया की आबादी का मिजाज बदलना. विकासशील और विकसित देशों में लोगों की उम्र तो बढ़ रही है, लेकिन जन्म दर घट रही है. इसका असर केवल अस्पतालों पर नहीं, बल्कि ओल्ड एज होम्स, रिहैब सेंटर्स और होम हेल्थकेयर पर भी पड़ रहा है.
2.2 अरब बुजुर्ग: संयुक्त राष्ट्र (UN) के मुताबिक, 2070 के दशक तक दुनिया में 65 साल से ऊपर के बुजुर्गों की संख्या 2.2 अरब हो जाएगी, जो कि 18 साल से कम उम्र के बच्चों से भी ज्यादा होगी.
58 लाख नर्सों की कमी: वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) की रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में करीब 58 लाख नर्सों की कमी है.
रिटायर होती पुरानी पीढ़ी: दुनिया में लगभग 19 फीसदी नर्सों की उम्र 55 साल या उससे ज्यादा है. यानी आने वाले सालों में एक तरफ बुजुर्गों की देखभाल के लिए ज्यादा स्टाफ चाहिए होगा, तो दूसरी तरफ पुरानी नर्सें रिटायर हो रही होंगी.
जर्मनी का मॉडल और 'स्पेशलाइजेशन' की मांग
जर्मनी इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि कैसे विदेशी नर्सों की भर्ती को अब और ज्यादा व्यवस्थित किया जा रहा है. वहां जाने के लिए विदेशी नर्सों को क्वालिफिकेशन रिकग्निशन प्रोसेस और जर्मन भाषा सीखनी होती है.
लेकिन अब सिर्फ विदेश जाने की चाहत काफी नहीं है, बल्कि 'स्पेशलाइजेशन' सबसे बड़ा हथियार बन चुका है. अगर आपके पास इन खास सेक्टर्स में अनुभव है, तो आपकी मांग सबसे ज्यादा होगी:
आईसीयू (ICU) और क्रिटिकल केयर
इमरजेंसी नर्सिंग और ऑपरेशन थिएटर (OT)
एनआईसीयू (NICU) और पीडियाट्रिक्स (बच्चों की देखभाल)
ऑन्कोलॉजी (कैंसर केयर)
मेंटल हेल्थ और जेरियाट्रिक केयर (बुजुर्गों की देखभाल)
पक्की नागरिकता (PR) और फैमिली रीलोकेशन का मौका
ग्लोबल नर्सिंग करियर का मतलब सिर्फ नौकरी पाना नहीं है. कई देशों के इमिग्रेशन नियमों के तहत, सही योग्यता वाली नर्सों को आगे चलकर प्रमोशन, परिवार को साथ ले जाने का मौका, परमानेंट रेजिडेंसी (PR) और आगे चलकर नागरिकता भी मिल जाती है.
इसलिए भारतीय नर्सों को अब सिर्फ विदेश जाने का सपना देखने के बजाय अपनी योग्यता को ग्लोबल स्टैंडर्ड्स के हिसाब से तैयार करना चाहिए, ताकि करियर की राह में देश बदलने पर भी उनकी मांग कभी कम न हो.