2026 में भारत के टियर-1 और टियर-2 शहरों के 19-20 साल के लड़के-लड़कियां या यूं कहें की Gen Z, कॉलेज की डिग्री मिलने से पहले ही घर बैठे कमाई कर रहे हैं. माइक्रो-सास और UGC जैसे इंटरनेट मॉडल के जरिए उनके बैंक खातों में 25 से 50 हजार रुपये का पे-आउट क्रेडिट हो रहा है.
युवा लैपटॉप और स्मार्टफोन से ब्रांड्स के लिए वीडियो बना रहे हैं, छोटी समस्याओं के डिजिटल समाधान तैयार कर रहे हैं और अपनी स्किल के आधार पर भारतीय और विदेशी क्लाइंट्स के लिए काम कर रहे हैं. इसके लिए उन्हें 9-से-5 की नौकरी, पार्ट-टाइम कॉल सेंटर, बड़ी सरकारी नौकरी या भारी-भरकम पारिवारिक बिजनेस की जरूरत नहीं पड़ रही है.
बदल गया घर बैठे कमाई का तरीका
एक समय था जब कॉलेज के दौरान कमाई का मतलब होम ट्यूशन पढ़ाना या किसी लोकल दुकान पर पार्ट-टाइम नौकरी करना होता था. अब जेन जी के युवा पढ़ाई के साथ ही अपनी स्किल से कमाई कर रहे हैं और महीने का जेब खर्च निकाल रहे हैं.
यूजीसी यानी यूजर-जनरेटेड कंटेंट ने उस सोच को बदल दिया है कि इंटरनेट से कमाई के लिए इंस्टाग्राम या यूट्यूब पर लाखों फॉलोअर्स जरूरी हैं. इस मॉडल में 19-20 साल के लड़के, लड़कियां ब्रांड्स के लिए 15 से 30 सेकंड के आसान और लोगों से जुड़ने वाले वीडियो बनाते हैं. इनमें अनबॉक्सिंग, प्रोडक्ट रिव्यू और समस्या के समाधान वाली रील्स शामिल हैं.
क्रिएटर्स इन वीडियो को अपनी निजी प्रोफाइल पर पोस्ट नहीं करते, बल्कि सीधे ब्रांड्स को बेचते हैं. ब्रांड्स इनका इस्तेमाल अपने आधिकारिक पेज या फेसबुक और इंस्टाग्राम के विज्ञापनों में करते हैं. एक अच्छे यूजीसी वीडियो के लिए नए क्रिएटर्स को भी 2,000 से 5,000 रुपये आसानी से मिल जाते हैं. महीने में ऐसे 6-7 वीडियो बनाकर लड़के 25 हजार रुपये का आंकड़ा पार कर रहे हैं.
कमाई का दूसरा मॉडल माइक्रो-सास है. सास यानी सॉफ्टवेयर एज ए सर्विस का नाम सुनते ही बड़ी टेक कंपनियों का ख्याल आता है, लेकिन जेन जी के लड़के माइक्रो-सास पर काम कर रहे हैं. इसमें किसी बहुत छोटी और खास समस्या को हल करने वाला आसान टूल या सॉफ्टवेयर बनाया जाता है.
इसके उदाहरणों में इंस्टाग्राम क्रिएटर्स के लिए अपने आप कैप्शन बनाने वाला टूल, लोकल जिम के लिए आसान मेंबरशिप ट्रैकर और कॉलेज स्टूडेंट्स के लिए एआई नोट-मेकर टूल शामिल हैं. कोडिंग की बुनियादी जानकारी रखने वाले या नो-कोड प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने वाले लड़के 2-3 हफ्तों में ऐसे टूल तैयार कर लेते हैं.
जब 50-100 लोग किसी टूल के इस्तेमाल के लिए 200-300 रुपये का मासिक सब्सक्रिप्शन देते हैं, तो यह नियमित कमाई का जरिया बन जाता है. इस तरह युवा छोटी और खास जरूरतों के लिए डिजिटल टूल बनाकर उनसे कमाई कर रहे हैं.
विदेशी क्लाइंट्स के लिए कर रहे काम
स्किल पर आधारित फ्रीलांसिंग से युवा भारतीय बाजारों के साथ अमेरिका, ब्रिटेन और यूएई के क्लाइंट्स के लिए भी काम कर रहे हैं. कैनवा से पोस्टर डिजाइन करना, कैपकट से वीडियो एडिट करना और चैटजीपीटी की मदद से ईमेल कॉपीराइटिंग करना ऐसी स्किल हैं, जिन्हें सीखने में सिर्फ 15-20 दिन का समय लगता है.
विदेशी क्लाइंट्स जब इन्हें 50 या 100 डॉलर का छोटा पे-आउट भी भेजते हैं, तो भारतीय रुपये में वह रकम 4,000 से 8,000 रुपये बन जाती है. इस तरह युवाओं को अपनी स्किल के बदले डॉलर में भी पे-आउट मिल रहा है.
जेन जी के इस नजरिए से साफ है कि युवा अब सिर्फ 4 साल की डिग्री पूरी होने का इंतजार नहीं कर रहे हैं. वे पढ़ाई के साथ अपनी असली दुनिया में काम आने वाली स्किल से कमाई कर रहे हैं.
यूजीसी, माइक्रो-सास और स्किल पर आधारित फ्रीलांसिंग के जरिए 19-20 साल के लड़के कॉलेज के दिनों में ही कमाई कर रहे हैं. वीडियो बनाने, डिजिटल टूल तैयार करने और भारतीय व विदेशी क्लाइंट्स के लिए काम करने वाले ये मॉडल उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बना रहे हैं.