नौकरी जाने का डर सिर्फ उन कर्मचारियों को नहीं सताता, जिन्हें कंपनी से बाहर का रास्ता दिखाया जाता है. कई बार छंटनी का डर उन कर्मचारियों पर भी दिखाई देता है, जो छंटनी के एक लहर से बच जाते हैं. मन में बस एक ही सवाल चलता है कि अगली बार किसकी बारी होगी. टेक सेक्टर में इन दिनों कुछ ऐसा ही माहौल देखने को मिल रहा है.
Amazon, Meta, Oracle और Uber जैसी बड़ी कंपनियों में अलग-अलग समय पर कर्मचारियों की संख्या घटाई गई है. लेकिन इसके लिए खास बात यह है कि कई कंपनियों में छंटनी एकसाथ पूरी नहीं हुई बल्कि अलग-अलग चरणों में हुई है. ऐसे में सवाल उठता है कि कंपनियां एक बार में ही छंटनी पूरी करने के बजाय बार-बार कर्मचारियों की संख्या क्यों घटाती हैं?
Big Tech कंपनियों में बार-बार क्यों हो रही है छंटनी?
बार-बार होने वाली छंटनी का मतलब हमेशा यह नहीं होता कि कंपनी किसी नए वित्तीय संकट से गुजर रही है. कई बार कंपनियां बड़े स्तर पर लागत घटाने या संगठन में बदलाव की योजना बनाती हैं, लेकिन इसे अलग-अलग विभागों और लोकेशन पर चरणों में लागू करती हैं.
Deloitte USI में HR से जुड़ी सृष्टि नरजरी के मुताबिक, कुछ कंपनियां एक बड़ी रिस्ट्रक्चरिंग योजना का ऐलान करती हैं, लेकिन उसे अलग-अलग चरणों में लागू करती हैं. वहीं, कुछ मामलों में अलग-अलग बिजनेस यूनिट अपनी जरूरतों और प्राथमिकताओं के हिसाब से कर्मचारियों की संख्या घटाती हैं. ऐसा तब भी हो सकता है, जब किसी प्रोडक्ट की मांग कम हो जाए या दो टीमों में एक जैसी जिम्मेदारियां मौजूद हों.
Amazon, Meta और Oracle में कितने कर्मचारियों की गई नौकरी?
Amazon में छंटनी के अलग-अलग दौर इसका उदाहरण हैं. कंपनी ने अक्टूबर 2025 में करीब 14 हजार कर्मचारियों की कटौती की थी. इसके बाद जनवरी 2026 में 16 हजार कॉरपोरेट नौकरियों में कटौती का ऐलान किया गया. रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी की छंटनी उस रिस्ट्रक्चरिंग प्रक्रिया का हिस्सा थी, जो कई महीने पहले शुरू हुई थी. कुछ टीमों में बदलाव अक्टूबर में पूरे हुए, जबकि कुछ में जनवरी तक काम जारी रहा. इसके बाद कंपनी ने अक्टूबर में करीब 1,000 और कर्मचारियों को कटौती की और पिछले हफ्ते 250 तक नौकरियों में कटौती की जानकारी सामने आई.
वहीं, अगर Meta की बात करें, तो अप्रैल-मई में करीब 8,000 नौकरियां खत्म करने की योजना का ऐलान किया था. यह उसके ग्लोबल वर्कफोर्स का लगभग 10 फीसदी था. Oracle ने मई 2026 तक के 12 महीनों में दुनियाभर में करीब 21 हजार कर्मचारियों की कटौती की.
इसके अलावा Uber ने सितंबर में करीब 3,300 नौकरियां घटाने की योजना घोषित की. Workday ने भी सितंबर में करीब 500 कर्मचारियों की कटौती की, जो 2026 में उसकी दूसरी छंटनी थी. रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, 1 जनवरी से 23 सितंबर 2026 के बीच टेक्नोलॉजी, फाइनेंस, रिटेल और मैन्युफैक्चरिंग समेत अलग-अलग सेक्टर में करीब 1.76 लाख नौकरियों में कटौती दर्ज की गई.
बिजनेस बढ़ने पर भी कंपनियां कर्मचारियों को क्यों निकालती हैं?
आमतौर पर माना जाता है कि कंपनी का कारोबार अच्छा चल रहा है तो कर्मचारियों की नौकरी भी सुरक्षित रहेगी. लेकिन कंपनियों के वित्तीय प्रदर्शन और उनकी हायरिंग नीतियों के बीच सीधा संबंध हमेशा नहीं होता. कई बार रेवेन्यू बढ़ने के बावजूद कंपनियां अपना मुनाफा बढ़ाने, उत्पादकता सुधारने या भविष्य की योजनाओं में निवेश करने के लिए कर्मचारियों की संख्या में कमी करती है.
एक ग्लोबल FMCG कंपनी में सीनियर मैनेजर संजयोग डोवराह के मुताबिक, तिमाही नतीजे बताते हैं कि कंपनी ने कारोबार में कैसा प्रदर्शन किया है, जबकि कर्मचारियों से जुड़े फैसले इस बात पर निर्भर करते हैं कि नेतृत्व भविष्य में पूंजी, स्किल और संसाधनों को कहां लगाना चाहता है.
हालांकि, कर्मचारियों की संख्या घटाने से कंपनी अपने आप ज्यादा प्रभावी नहीं बन जाती. बार-बार होने वाली रिस्ट्रक्चरिंग से कर्मचारियों का भरोसा और वर्कप्लेस कल्चर प्रभावित हो सकता है. जो कर्मचारी कंपनी में बने रहते हैं, उन्हें भी कई बार पहले से ज्यादा जिम्मेदारियां उठानी पड़ती हैं.
AI के कारण बदल रही हैं नौकरियों की जरूरतें
इसके अलावा कंपनियां एआई के बढ़ते यूज की वजह से भी कर्मचारियों की कमी कर रही है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन ने कंपनियों के काम करने के तरीके के साथ-साथ हायरिंग की जरूरतों को भी प्रभावित किया है. कंपनियां अब यह दोबारा देख रही हैं कि उन्हें किन पदों और स्किल वाले कर्मचारियों की जरूरत है.
हालांकि, हर छंटनी की वजह AI नहीं है. अशोका यूनिवर्सिटी में इकोनॉमिक्स के असिस्टेंट प्रोफेसर रोनित मुखर्जी के मुताबिक, AI अपनाने वाली कंपनियों में कुछ मौजूदा पदों पर भर्ती घट सकती है और जरूरी स्किल का स्वरूप बदल सकता है. दूसरी ओर, AI की मदद से नए प्रोडक्ट और बिजनेस बढ़ने पर नई नौकरियां भी पैदा हो सकती हैं. इसका कुल असर इस बात पर निर्भर करेगा कि पुरानी नौकरियों के खत्म होने के मुकाबले नए काम कितने पैदा होते हैं.
रिपोर्ट में कहा गया है कि क्लेरिकल, कस्टमर सपोर्ट और कोडिंग से जुड़े कुछ काम ऑटोमेशन के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो सकते हैं. हालांकि, भविष्य में रोजगार पर AI का कुल असर इस बात से तय होगा कि कंपनियां नए काम और रोजगार के कितने अवसर तैयार करती हैं.
भारत के IT प्रोफेशनल्स के लिए क्यों बढ़ सकती है मुश्किल?
इस बदलाव का असर भारत के टेक्नोलॉजी सेक्टर पर भी पड़ सकता है. खासकर उन अनुभवी कर्मचारियों के लिए मुश्किल बढ़ सकती है, जिनकी स्किल किसी खास टेक्नोलॉजी, क्लाइंट या कंपनी से जुड़ी हुई है. Indeed के आंकड़ों के मुताबिक, जून 2026 तक के तीन महीनों में सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट से जुड़ी जॉब पोस्टिंग में 12.3 फीसदी की गिरावट आई.
वहीं, IT सर्विस कंपनियों से उम्मीद है कि वे वित्त वर्ष 2026-27 में अपनी बेंच स्ट्रेंथ को घटाकर 8 से 10 फीसदी तक ला सकती हैं. पहले यह स्तर आमतौर पर 20 से 30 फीसदी के आसपास रहता था. बेंच पर वे कर्मचारी होते हैं, जिन्हें फिलहाल किसी प्रोजेक्ट या क्लाइंट असाइनमेंट पर नहीं लगाया गया है.
रोनित मुखर्जी के मुताबिक, नौकरी छूटने का असर नई नौकरी मिलने के बाद भी बना रह सकता है. इसे लेबर मार्केट स्कारिंग कहा जाता है. इसका मतलब है कि नौकरी जाने के बाद व्यक्ति को नई नौकरी खोजने में ज्यादा समय लग सकता है, दोबारा नौकरी मिलने पर पहले से कम सैलरी मिल सकती है और करियर की प्रगति भी प्रभावित हो सकती है.
क्या छंटनी के बजाय कर्मचारियों को दूसरी भूमिका दी जा सकती है?
कंपनियों के सामने एक विकल्प कर्मचारियों को नई स्किल सिखाकर दूसरी भूमिका में भेजने यानी री-डिप्लॉयमेंट का भी है. संजयोग डोवराह के मुताबिक, किसी पद की जरूरत खत्म होने का मतलब यह नहीं है कि उस पद पर काम करने वाले कर्मचारी की प्रतिभा भी बेकार हो गई. अगर कंपनी में दूसरी जगह जरूरत है तो ट्रेनिंग देकर कर्मचारियों को वहां काम दिया जा सकता है. रिपोर्ट में Zoho का उदाहरण दिया गया है.
कंपनी ने अक्टूबर में कर्मचारियों की छंटनी करने के बजाय सालाना सैलरी बढ़ोतरी रोकने और कर्मचारियों को नए प्रोडक्ट तथा ग्राहकों की जरूरतों के मुताबिक ट्रेनिंग देने का फैसला किया था. हालांकि, यह तरीका हर कंपनी के लिए काम करें, ऐसा जरूरी नहीं है.
रोनित मुखर्जी का कहना है कि ट्रेनिंग का संबंध वास्तविक नौकरी के अवसरों और उभरती स्किल की जरूरतों से होना चाहिए. सिर्फ ट्रेनिंग देने से रोजगार की समस्या हल नहीं होगी. टेक कंपनियों में बार-बार हो रही छंटनी के बीच कर्मचारियों की अनिश्चितता भी बनी हुई है.
अनुभवी प्रोफेशनल्स को नई नौकरी खोजने में अधिक समय लग सकता है और कम सैलरी पर काम करना पड़ सकता है. वहीं, एंट्री-लेवल नौकरियों के कम होने से नए युवाओं के लिए अवसर सीमित हो सकते हैं. आगे रोजगार पर इसका कितना असर पड़ेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनियां, कर्मचारी और नीति निर्माता इस बदलाव से कैसे निपटते हैं.