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एक फोन कॉल, चार वीडियो और धोखेबाजी... ऐसे खुला करोड़ों के किडनी रैकेट का काला राज, पढ़ें इनसाइड स्टोरी

कानपुर में एक फोन कॉल से बड़े किडनी रैकेट का राज फाश हो गया. जहां 60 से ज्यादा गैरकानूनी किडनी ट्रांसप्लांट किए गए. इसके बाद आरोपी डॉक्टर और दलाल गिरफ्तार किए गए हैं. इस खुलासे ने सबको हैरान कर दिया है. जानिए इस खतरनाक ऑर्गन ट्रेड नेटवर्क की पूरी कहानी.

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कानपुर रैकेट के मामले में हर दिन नए खुलासे हो रहे हैं (फोटो-ITG)
कानपुर रैकेट के मामले में हर दिन नए खुलासे हो रहे हैं (फोटो-ITG)

कानपुर पुलिस के पास एक फोन कॉल आती है. वो कॉल शहर के अस्पताल से की गई थी. फोन करने वाला पुलिस को बताता है कि उस अस्पताल में धोखे से उसकी एक किडनी निकाल ली गई है. ये बात सुनते ही पुलिस हरकत में आ जाती है. फौरन पुलिस की एक टीम उस अस्पताल में पहुंचती है, जहां से कॉल की गई थी. पुलिस देखती है कि फोन करने वाला अस्पताल के एक बेड पर लेटा हुआ था. इसके बाद वो पुलिस को अपनी कहानी सुनाना शुरू करता है. जब उसकी कहानी खत्म होती है, तो कानपुर पुलिस के सामने एक ऐसा सच आता है, जिसे सुनकर खुद पुलिस हैरान रह जाती है.  

सबसे पहले एक-एक कर बात करते हैं चार वायरल वीडियो की-

पहला वीडियो
पहले वायरल वीडियो में जींस और टी शर्ट पहने और काला चश्मा लगाए एक शख्स बिस्तर पर लेटा है. लेकिन ये बिस्तर मामूली नहीं बल्कि नोटों का है. पूरे बेड पर नोट ही नोट बिछे हैं और बिस्तर पर लेटे-लेटे ये शख्स अपने चेहरे पर नोटों की गड्डियां फेर रहा है. एक क्लिप में उसके साथ उसका एक साथी भी नजर आता है. ऐसा वीडियो शूट करवाने के लिए किसी के दिमाग पर नोटों की गर्मी कितनी ज्यादा चढ़ी होगी, ये समझना मुश्किल नहीं.

दूसरा वीडियो
अब बात दूसरे क्लिप की. इस वीडियो में एक शख्स अस्पताल के बिस्तर पर लेटी साउथ अफ्रीकी मूल की एक महिला के शरीर पर स्टेथेस्कोप यानी आला लगा कर उसकी जांच करता हुआ दिख रहा है. वो टूटी-फूटी अंग्रेजी में महिला से बातचीत कर उसका हाल-चाल पूछता है और दर्द से रोती विदेशी महिला उसके सवालों का जवाब दे रही है. उसे देखकर कुछ लोग सोच रहे होंगे कि अगर ये शख्स वाकई एक डॉक्टर है, तो फिर उसकी अंग्रेजी इतनी कमजोर कैसे? वो बिल्कुल मामूली अंग्रेजी भी ठीक से क्यों नहीं बोल पा रहा.

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तीसरा वीडियो
अब आता है तीसरा वीडियो क्लिप. ये कानपुर के एक अस्पताल के बाहर की एक तस्वीर है. इस वीडियो में पहले एक शख्स खुद को इंट्रोड्यूज करता है, फिर से खुद से 43 लाख रुपये हड़प लिए जाने की शिकायत करता हुआ ये कहता है कि अब वो इतने ज्यादा कर्जे में आ चुका है कि उसके सामने सुसाइड कर लेने के सिवाय और कोई रास्ता ही नहीं है.

चौथा वीडियो
और अब इसी कड़ी में बात चौथे और सबसे अहम वीडियो क्लिप की. वो वीडियो भी कानपुर के एक अस्पताल का ही है. अस्पताल के बिस्तर पर एक मरीज लेटा दिखाई देता है, लोग उससे सवाल जवाब कर रहे हैं, लेकिन मरीज ने कंबल से अपना चेहरा छुपा रखा है. वो अपनी पहचान नहीं बताना चाहता और ना ही उससे पूछे जा रहे सवालों का जवाब देने में उसे कोई खास दिलचस्पी है.

असल में जिन वीडियोज़ की बात हम कर रहे हैं, वो सारी की सारी कानपुर के उस खतरनाक किडनी रैकेट का दर्दनाक बाइप्रोडक्ट है, जिनके सामने आने के बाद पूरे मेडिकल महकमे से लेकर यूपी का शासन-प्रशासन तक हिल गया है. एक ऐसा किडनी रैकेट, इल्जाम है जिसने अब तक करीब 60 से ज्यादा लोगों का गैर कानूनी तरीके से किडनी ट्रांसप्लांट कर दिया. करोड़ों के वारे-न्यारे कर लिए और अनगिनत लोगों को जीते-जी मौत के मुंह में धकेल दिया. इनमें किसी की किडनी लेने के चक्कर में जान ही चली गई, तो कोई कितनी देने या बेचने के चक्कर में मौत के करीब पहुंच गया. पूरी उम्र के लिए बीमार हो गया और दवाओं के भरोसे जिंदा रहने पर मजबूर हो गया.

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करीब हफ्ते भर पहले कानपुर से सामने आए इस किडनी रैकेट का खुलासा होने के बाद अब तक इस सिलसिले में जहां शहर के कई नामचीन डॉक्टरों के साथ-साथ कुल 8 लोगों को पुलिस ने धर दबोचा है, वहीं इसके तार सिर्फ कानपुर ही नहीं बल्कि दिल्ली और यूपी के दर्जनों अस्पतालों तक फैले हुए दिखाई दे रहे हैं. लेकिन महज एक फोन कॉल से सामने आए इस किडनी रैकेट का खुलासा कब और कैसे हुआ और अब तक इस मामले में कौन-कौन से तथ्य पुलिस के हाथ लगे, ये जानकर आप चौंक जाएंगे. तो आइए इसकी शुरुआत शुरू से ही करते हैं.

सोमवार, 30 मार्च को कानपुर पुलिस को एक फोन आता है. फोन करने वाला शख्स पुलिस को बताता है कि उसकी किडनी धोखे से निकाल ली गई है. उसे उसकी एक किडनी के बदले 6 लाख रुपये देने का वादा किया गया था, लेकिन अब तक उसे सिर्फ 3 लाख रुपये ही मिले हैं. ये मामला ट्रांसप्लांट संबंधी नियमों के गंभीर उल्लंघन का तो था ही, साथ ही ऐसे मामले में कई लोगों की जिंदगी भी खतरे में पड़ सकती थी. 

लिहाजा, कानपुर पुलिस फौरन उस अस्पताल का रुख करती है जहां से लड़के ने उसे फोन किया था. फोन करने वाले लड़के का नाम आयुष है, जो मूल रूप से बिहार का रहने वाला है. लेकिन पता चलता है कि वो मेरठ की रहने वाली एक महिला को किडनी बेचने के चक्कर में कानपुर के इस अस्पताल के बिस्तर पर आ पहुंचा है और किडनी निकाल लिए जाने के बाद उसे अपने साथ हुए धोखे का अहसास हुआ है. अब पुलिस आयुष से बातचीत करती है. लेकिन अपनी पहचान छुपाता हुआ आयुष अपने साथ हुई ज्यादती की कहानी पुलिस को बताता है.

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कानून के मुताबिक किडनी या ऐसे किसी भी अंग का डोनेशन सिर्फ पारिवारिक सदस्यों के बीच ही हो सकता है और अपवाद के कुछ मामलों में अलग से सरकार से इजाजत लेने की भी दरकार होती है. लेकिन के आयुष ने अपना किडनी पारुल नाम की एक ऐसी महिला को दिया था जिसे वो जानता था तक नहीं था, सिवाय इतने के कि वो दीदी मेरठ की रहने वाली है और उन्हें किडनी की सख्त जरूरत थी. 

जाहिर है आयुष ने अपनी किडनी औने-पौने कीमत पर उन दलालों को बेच दी थी, जो अलग-अलग अस्पतालों में छुप कर सालों से गरीब और बेबस लोगों की किडनी का सौदा कर रहे थे. आयुष भी उन्हीं में से एक था. असल में बिहार का आयुष देहरादून के एक कॉलेज से एमबीए की पढ़ाई कर रहा है, लेकिन उसके पिता की मौत हो चुकी है. ऐसे में उसके ऊपर पढ़ाई के साथ-साथ अपने परिवार और खास कर मां की भी जिम्मेदारी है. उसके पास फीस भरने तक के पैसे नहीं थे.

इसी बीच वो किसी दलाल के संपर्क में आता है और अपनी किडनी का सौदा कर लेता है, लेकिन कहानी में असल ट्विस्ट तब आता है, जब उसे किडनी देकर भी धोखा हाथ लगता है. शुरुआत में उसने किडनी की कीमत 6 लाख रुपये बताई थी, लेकिन अब पता चला है कि उसका सौदा 9 लाख रुपये में हुआ था, जबकि उसे सिर्फ साढ़े 6 लाख रुपये मिले, जबकि मेरठ की पारुल नाम की जिस महिला को उसकी किडनी दी गई, उससे दलालों ने पूरे 90 लाख रुपये झटके थे.

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अब कानपुर पुलिस ने उस पूरे रैकेट का पीछा करना शुरू कर दिया, जो किडनी के कारोबार में जुटा था. पता चला कि आयुष की किडनी का ऑपरेशन भी किसी क्वालिफाइड डॉक्टर ने नहीं, बल्कि एक हथौड़ा छाप ओटी टेक्निशियन ने किया था, जिसके पास कोई मेडिकल डिग्री तक नहीं है. उसका नाम है मुदस्सर अली. दिल्ली का रहने वाला अली अब तक फरार है, लेकिन पुलिस की तफ्तीश में अब तक इस केस से जुड़े 8 लोग शिकंजे में आ चुके हैं. 

इनमें कई नामी डॉक्टर भी शामिल हैं. इनमें कानपुर के आहुजा अस्पताल की मालिक दंपत्ति डॉ सुरजीत आहूजा और उनकी पत्नी डॉ प्रीति आहूजा, मेड लाइफ अस्पताल के मालिक डॉ राजेश कुमार और डॉ राम प्रकाश, प्रिया हॉस्पिटल के मालिक डॉ. नरेंद्र सिंह, दो ओटी टेक्निशियन और इस रैकेट का किंगपिन और सबसे बड़ा दलाल शिवम अग्रवाल उर्फ शिवम काड़ा शामिल है.

किडनी रैकेट की पूरी मोडस ऑपरेंडी
अब आइए आपको इस किडनी रैकेट की पूरी मोडस ऑपरेंडी को सिलसिलेवार तरीके से समझाते हैं. दिल्ली से लेकर मेरठ और मेरठ से लेकर कानपुर जैसे अलग-अलग शहरों के अस्पतालों में काम करने वाले एंबुलेंस ड्राइवर, ओटी टेक्निशियन, एडमिन मैनेजर सरीखे कर्मियों ने किडनी ट्रांसप्लांट के इस धंधे के लिए एक पूरा का पूरा रैकेट बना रखा था. इस रैकेट से जुड़े लोग सबसे पहले वैसे लोगों की तलाश करते, जिनकी किडनी खराब हो चुकी थी और जिन्हें डॉक्टरों ने ट्रांसप्लांट का सुझाव दे रखा था. 

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लेकिन चूंकि ट्रांसप्लांट के लिए डोनर इतने आसानी से नहीं मिलते, तो ये धंधेबाज किसी क्लाइंट के मिलते ही वैसे जरूरतमंद लोगों की तलाश में लग जाते, जिन्हें पैसों की सख्त दरकार होती. फिर ये दोनों पक्षों को अंधेरे में रख कर पूरी डील फाइनल करते. इनमें एक तरफ तो रिसिपिएंट यानी किडनी के खरीददारों से लाखों से लेकर करोड़ों रुपये तक वसूले जाते, वहीं दूसरी तरफ किडनी डोनर यानी किडनी बेचने वाले को फक़त कुछ लाख रुपये थमा दिए जाते. 

इस पूरे मामले में सीक्रेसी बनाए रखने के लिए ऑपरेशन के फौरन बाद उन्हें पोस्ट ऑपरेटिव केयर के लिए दूसरे अस्पतालों में शिफ्ट कर दिया जाता, ताकि कोई उन मरीजों तक आसानी से पहुंच ना सके. कानपुर में आहुजा अस्पताल, मेड लाइफ अस्पताल और प्रिया अस्पताल के साथ-साथ पुलिस को कई और ऐसे अस्पतालों का पता चला है, जहां से धंधा चोरी छुपे सालों से चल रहा था. इस केस के सामने आने के बाद पुलिस ने डॉ. सुरजीत और प्रीति आहुजा के आहुजा अस्पताल पर दबिश दी, जहां पुलिस की दबिश के बाद किडनी चोरी के तमाम साजो-सामान जस के तस बिखरे पड़े थे.
 
इस रैकेट का दायरा कितना बड़ा था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ये विदेशों से भी ग्राहकों को फांसने में पीछे नहीं हटते थे, भारत भर में किडनी के जरूरतमंड लोग तो खैर इनके रडार पर थे ही. इस रैकेट के किंगपिन शिवम अग्रवाल ने पुलिस को बताया है कि अकेले कानपुर के आहूजा अस्पताल में हाल के दिनों में 6 से 7 ऐसे किडनी ट्रांसप्लांट के गैरकानूनी ऑपरेशन किए जा चुके हैं, जबकि पूरे कानपुर शहर की बात करें, तो ये तादाद 50-60 तक पहुंच जाती है.

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एमबीए स्टूडेंट आयुष की किडनी की चोरी की कहानी असल में इस किडनी रैकेट का सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा भर है. आयुष की केस स्टडी का सिरा पकड़ कर जब पुलिस इस मामले की जांच में आगे बढ़ी, तो उसके सामने ऐसे-ऐसे खुलासे होने लगे, जिसके बारे में खुद वर्दीवालों ने कभी नहीं सोचा था. पैसों की खनक के आगे कानपुर से लेकर दिल्ली के कई बड़े अस्पतालों के नामी डॉक्टरों ने एक तरह से अपना पूरा का पूरा डॉक्टरी का पेशा ही किडनी के धंधेबाजों के पास गिरवी रख दिया था. वो धंधेबाज, जिनमें ज्यादातर की हैसियत एक ओटी टेक्निशियन या वार्ड ब्वॉय से ज्यादा की नहीं थी. 

कुछ तो ऐसे थे जो महज एंबुलेंस के मामूली ड्राइवर थे. लेकिन सितम देखिए कि ऐसे ही लोग कानपुर के आहुजा अस्पताल से लेकर दूसरी कई जगहों में ना सिर्फ सीधे ऑपरेशन थिएटर तक पहुंच जाते थे, बल्कि खुद ही अपने हाथों से किडनी तक का ऑपरेशन कर डालते थे, यानी वो कॉम्पलिकेडेट सर्जरी जिसमें महारत हासिल करने में किसी यूरोलॉजिस्ट या किडनी ट्रांसप्लांट सर्जन को सालों का वक्त लग जाता है.

अब जरा सोचिए जो मरीज लाखों करोड़ों रुपये खर्च कर इन अस्पतालों में ट्रांसप्लांट की उम्मीद लिए पहुंचता था, ये डॉक्टर और हथौड़ा छाप लोग उनकी जिंदगी से कैसा खतरनाक खिलवाड़ करते थे. इस किडनी रैकेट के सबसे बड़े धंधेबाज यानी किंगपिन शिवम अग्रवाल एक वीडियो में वो खुद ही डॉक्टर बनने का नाटक करता हुआ एक विदेशी मरीज की जांच कर रहा है और दर्द की शिकायत पर उसे इंजेक्शन लगाने का झांसा दे रहा है. 

मामला दिसंबर 2025 का बताया जाता है. अरेबिका नाम की एक साउथ अफ्रीकी महिला अरेबिका से किडनी ट्रांसप्लांट के नाम पर इन धंधेबाज़ों ने करीब दो से ढाई करोड़ रुपये हड़प लिए. इस मामले की जांच कर रही पुलिस फिलहाल अरेबिका की तलाश में जुटने के साथ-साथ बाकी के विदेशी मरीजों का भी पता लगा रही है, जिन्होंने यहां किडनी ट्रांसप्लांट करवाए हैं. पुलिस को इस केस में फिलहाल डॉक्टर रोहित, मुदस्सर अली और अफजल नाम के एक आदमी की भी तलाश है.

अब मनजिंदर सिंह के मामले को समझिए. कानपुर के आहुजा अस्पताल के सामने सुसाइड वीडियो बनाने वाले मनजिंदर मूल रूम से पंजाब के तरनतारन के रहने वाले हैं, जिनकी शिकायत है कि आहुजा अस्पताल से जुड़े कुछ लोगों ने उन्हें किडनी ट्रांसप्लांट करवाने का झांसा देकर उनसे 43 लाख रुपये ठग लिए. ऐसे में वो कभी भी सुसाइड कर सकते हैं.

इस मामले की जांच कर रही पुलिस ने पाया कि इस रैकेट से जुड़े लोग अक्सर टेलीग्राम एप पर लोगों से बातचीत किया करते थे, ताकि खुद को पुलिस की नजरों से बचा कर रख सकें. इस रैकेट के लोगों ने साउथ अफ्रीका से लेकर नेपाल तक के ग्राहकों को फांसा और उनसे करोड़ों रुपये के वारे-न्यारे कर लिए... फिलहाल पुलिस ने कानपुर के तीन अस्पताल पर तो दबिश डाली ही है और कई अस्पताल रडार पर हैं. इसी तरह पुलिस का कहना है कि इस केस के तार यूपी के बाहर भी फैले भी हैं, जिनकी पड़ताल की जा रही है.

डीसीपी सैयद कासिम आबिदी के मुताबिक, ट्रांसप्लांटेशन ऑफ ह्यूमन ऑर्गन एंड टिश्यूज एक्ट 1994 के तहत किडनी बेचना गैर‑कानूनी है. किडनी, लीवर जैसे मानव अंगों का व्यापार या रुपयों के बदले अंगदान अपराध है. दो ही तरह लोग ऑर्गन डोनेट कर सकते हैं. पहला परिवार के सदस्य जैसे पति‑पत्नी, बच्चे, माता‑पिता, भाई‑बहन वगैरह और दूसरा वो लोग जो रिश्तेदार तो नहीं है, लेकिन किसी से इमनोशनली जुड़े हैं, लेकिन ऐसे लोगों से अंगदान लेने से पहले राज्य स्तर की मेडिकल कमेटी से इजाजत लेनी होती है, ताकि अंगदान के नाम पर धंधा ना हो.

अब सवाल ये है कि आखिर अंगों का काला कारोबार क्यों होता है? तो जवाब है कि भारत में हज़ारों मरीज़ डायलिसिस पर हैं, लेकिन लीगल डोनर बहुत कम हैं. भारत में डोनेशन की दर लगभग 0.5 से 1 प्रति 10 लाख लोगों के आसपास है, जबकि विकसित देशों में ये 20–30 के आसपास है. ऐसे में गरीब मजदूर या बेरोज़गार लोगों को कुछ लाख रुपये का लालच देकर उनकी किडनी निकाल ली जाती है, जबकि उन्हें अक्सर धोखे और जोर जबरदस्ती का शिकार बनना पड़ता है.

(कानपुर से रंजय सिंह के साथ सिमर चावला का रिपोर्ट)

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