US Israel Iran War 2026: इस वक्त पूरी दुनिया सिर्फ एक सवाल का जवाब जानना चाहती है कि आखिर अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला क्यों किया? वो भी तब जब हमले से कुछ घंटों पहले अमेरिका और ईरान के बीच जिनेवा में बातचीत चल रही थी. इस बातचीत में खुद ईरान के विदेश मंत्री भी शामिल थे. इस बातचीत के दौरान ईरान अमेरिका की कई शर्तों को मानने के लिए भी तैयार था. लेकिन जानकार कहते हैं कि असल में ट्रंप ने इजरायली प्रमुख बेंजामिन नेतन्याहू के बहकावे में आकर ये खौफनाक कदम उठाया और जंग की आग भड़का दी. इस साजिश की कहानी हैरान करने वाली है.
26 जनवरी 2026, जिनेवा
ईरान पर अमेरिकी और इजरायली हमले से सिर्फ 48 घंटे पहले जिनेवा में एक बेहद अहम मीटिंग चल रही थी. ये मीटिंग अंग्रेजी बोलने वाले ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और अमेरिका के मिडिल ईस्ट के दूत विटकॉफ और डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जेर्ड कुशनर के बीच थी. इन दोनों को खुद ट्रंप ने जिनेवा भेजा था. इस मीटिंग का मकसद था ईरान को इस बात पर राज़ी करना कि वो अपने न्यूक्लियर प्रोग्राम को जीरो कर देगा. इस बातचीत के दौरान ईरानी विदेश मंत्री ने दोनों अमेरिकी दूत के सामने सात पन्नों का एक प्रपोजल रखा.
इस प्रपोजल के जरिए ईरान अमेरिका को ये बताने की कोशिश कर रहा था कि कैसे आने वाले वक्त में अलग-अलग लेवल पर अपने परमाणु कार्यक्रम को कम करेगा. हालांकि दोनों दूत के जरिए ट्रंप ने ये साफ संदेश भिजवाया था कि जब तक ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को जीरो नहीं कर देता, बात नहीं बनेगी. 26 जनवरी की इस मीटिंग में पहला दौर इसी के साथ खत्म हो गया. दोनों दूत ने ट्रंप को जानकारी दी कि ईरान एक ही झटके में अपने परमाणु कार्यक्रम को जीरो करने पर राजी नहीं है. इसी के बाद विटकॉफ और कुशनर जिनेवा से वॉशिंगटन लौट आते हैं. अब दोनों ट्रंप को ये बताते हैं कि उन्हें नहीं लगता कि ईरान इस मुद्दे पर किसी डील के लिए तैयार होगा.
यही वो घड़ी थी, जब ट्रंप फैसला ले चुके थे कि अब ईरान से आगे कोई बातचीत नहीं होगी. इस फैसले के पीछे सबसे अहम वजह थे इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, जो बीते 11 फरवरी से ही ट्रंप को ईरान पर हमला करने की सलाह दे रहे थे. 11 फरवरी की सुबह नेतन्याहू वॉशिंगटन के ओवल ऑफिस में ट्रंप से मिलने पहुंचे थे. इस मुलाकात से कई हफ्ते पहले से ही इजरायल लगातार अमेरिका को ईरान पर हमले के लिए उकसा रहा था.
इजरायल ट्रंप को इस बात के लिए मनाने की कोशिश कर रहा था कि ईरान से बातचीत का कोई फायदा नहीं है. ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई न्यूक्लियर प्रोग्राम को जीरो करने पर कभी राजी नहीं होंगे. 11 फरवरी की इस मुलाकात के दौरान ट्रंप और नेतन्याहू के बीच करीब 3 घंटे तक मीटिंग चली. इस मीटिंग के दौरान ईरान के साथ जंग और हमले की तारीख तक को लेकर बातचीत हुई. इसी मीटिंग के अगले दिन ट्रंप ने सार्वजनिक तौर पर ये बयान दिया कि उन्हें डिप्लोमेटिक चैनल से ईरान के साथ बातचीत कर किसी नतीजे पर पहुंचने को लेकर शक है और वो ईरान के साथ बात कर करके थक चुके हैं.
इस पर एक रिपोर्टर ने ट्रंप से पूछा कि क्या वो ईरान में सत्ता पलटना चाहते हैं? ट्रंप का जवाब था कि इससे बेहतर और कुछ हो नहीं सकता. दरअसल, इजरायल लगातार ट्रंप से ईरान पर हमले की इजाजत मांग रहा था. पर जिनेवा में जब ट्रंप को अपनी मर्जी के हिसाब से जवाब नहीं मिला, तब उन्होंने तय किया कि वो सिर्फ इजरायल को ईरान पर हमले की ही इजाजत नहीं देंगे, बल्कि ईरान के टॉप लीडरशिप को खत्म करने के लिए इस हमले में इजरायल के पार्टनर भी बनेंगे. नेतान्याहू को और क्या चाहिए था?
अब बस हमले की तारीख तय होनी थी. व्हाइट हाउस में इसको लेकर एक हाई लेवल मीटिंग हुई. इस मीटिंग में वाइस प्रेसिडेंट जेडी वेंस, यूएस सेक्रेटरी मार्को रुबियो, सीआईए डायरेक्टर जॉन रैक्लिफ, चेयरमैन ऑफ द ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ जनरल डैन केन शामिल थे. जनरल केन की सलाह थी कि यूएस फोर्स को ईरान पर सिर्फ लिमिटेड हमले करने चाहिए, ताकि ईरान को डरा कर उससे समझौता किया जा सके. या फिर सीधे ईरान की सरकार को गिराने के लिए बड़ा हमला किया जाना चाहिए.
मगर जनरल डैन के मुताबिक बड़े हमले में बड़ी तादाद में अमेरिकी फोर्सेस के मारे जाने का खतरा है. वाइस प्रेसिडेंट वेंस की मीटिंग में राय थी कि ईरान पर हमला बड़ा और जल्दी होना चाहिए. रूबियो ने इस मीटिंग में ही ये चेतावनी दे दी थी कि ईरान पर चाहे पहले इजरायल हमला करे या अमेरिका, दोनों ही सूरत में ईरान अमेरिका पर पलटवार करेगा. जिनमें खाड़ी के देशों में अमेरिकी सैन्य बेस और अमेरिकी दूतावास शामिल है. लेकिन ट्रंप मन बना चुके थे क्योंकि नेतन्याहू महीनों से ट्रंप के दिमाग में ये भर चुके थे कि ईरान पिछले साल जून के हमले के बाद भी तेजी से अपने परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहा है.
अमेरिकी मीडिया के मुताबिक, ईरान पर ट्रंप के हमले के फैसले के पीछे नेतन्याहू के अलावा एक और वजह थी. हाल के वक्त में ट्रंप की लोकप्रियता घट रही थी. इसी साल नवंबर में अमेरिका में मध्यावधि चुनाव हैं. ट्रंप अपने सलाहकारों से जानना चाहते थे कि अगर वो ईरान पर पूरी तरह से हमला करते हैं, तो क्या अमेरिकी जनता उन्हें एक ताकतवर लीडर के तौर पर मान्यता देगी? हालांकि सूत्रों के मुताबिक सलाहकारों ने उन्हें ऐसा कोई आश्वासन नहीं दिया. पर अब ट्रंप पीछे हटने को तैयार नहीं थे.
हालांकि इसी बीच ट्रंप की कोर टीम ने एक और प्रपोजल रखा था. ये प्रपोजल ये था कि ईरान की सबसे ताकतवर फोर्स इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी आईआरजीसी में फूट डाल कर ये कोशिश की जाए कि उनका एक गुट ईरान के अंदर तख्ता पलट करे और अगली सत्ता उनके अपने किसी खास को सौंप दी जाए. इससे मैसेज ये जाएगा कि ईरान के अंदर ही ईरानी लोगों या ईरानी सेना ने खामेनेई का तख्ता पलट दिया.
लेकिन ये तरीका काम न आया. अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने ट्रंप को जो ब्रिफिंग दी, उसके हिसाब से आईआरजीसी को तोड़ना या उसके एक धड़े को बगावत के लिए मजबूर करना नामुमकिन है. क्योंकि ये वो फोर्स है, जिसे खुद खामेनेई ने जन्म दिया था और बड़ा भी किया. आईआरजीसी खामनेई के खिलाफ गद्दारी नहीं कर सकती थी.
नेतन्याहू ट्रंप को लगातार ये भी समझाने की कोशिश कर रहे थे कि जब तक अयातुल्ला खामेनेई ईरान की सत्ता पर काबिज रहेंगे, ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम रुकने वाला नहीं. असल में नेतन्याहू खामेनेई को भी मारना चाहते थे. पिछले साल जून में जब अमेरिका और इजरायल के साथ ईरान की 12 दिन की जंग हुई थी, तब पहली बार नेतन्याहू ने ट्रंप को खामेनेई को मारने की इजाजत मांगी थी. हालांकि तब खुद ट्रंप इसके लिए तैयार नहीं थे.
इत्तेफाक से इसी दौरान दिसंबर के आखिरी हफ्ते में ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शन शुरू हो चुके थे. ईरानी आवाम डॉलर के मुकाबले गिरते ईरानी करंसी और महंगाई को लेकर सड़कों पर उतर आई थी. ईरान के कई शहरों में आंदोलन तेजी पकड़ चुका था. सरकार और खामेनेई दोनों ही जनता के निशाने पर थे. कई जगहों पर प्रदर्शनकारियों को काबू करने के लिए ईरानी फोर्स ने ताकत का इस्तेमाल किया. दर्जनों लोगों की मौत हुई.
ईरान के अंदर खामेनेई के खिलाफ ईरानी आवाम के इस तरह सड़कों पर आने ने फिर से नेतन्याहू और ट्रंप को एक मौका दिया. आंदोलन को कुचलने के नाम पर ट्रंप ने ईरानी हुकूमत को धमकी दे डाली कि वो जरूरत पड़ने पर ईरानी जनता की मदद के लिए आगे आ सकता है. इस मौके का फायदा उठाने के लिए नेतन्याहू ने फिर से ट्रंप को ईरान पर हमले के लिए उकसाना शुरू कर दिया. मगर ये मौका धीरे-धीरे इसलिए हाथ से निकल गया क्योंकि सरकार विरोधी प्रदर्शन आहिस्ता आहिस्ता कम होता गया. जैसा नेतान्याहू या ट्रंप को उम्मीद थी कि शायद ईरानी आवाम के दबाव में सरकार पलट जाएगी, ऐसा हुआ नहीं.
नेतन्याहू के बहकावे और अपने कुछ करीबी सलाहकारों की सलाह को अनदेखी कर ट्रंप ने इजरायल के साथ मिल कर 28 फरवरी को ईरान पर हमला कर दिया. नतीजा वही हुआ, जो जनरल डैन केन ने कहा था. ईरान ने पलटवार करते हुए सऊदी अरब, यूएई, कतर, कुवैत, बहरीन, जॉर्डन, इराक यानी जहां-जहां खाड़ी के देशों में अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं, उन्हें अपनी मिसाइलों और ड्रोन से निशाना बनाया. अब तक 6 अमेरिकी सैनिकों के मारे जाने की खबर है.
खुद ट्रंप ने जंग शुरू करने के तीसरे दिन ये कहा है कि ये जंग अभी शायद 3-4 हफ्ते और चले. हो सकता है उससे भी लंबी चले. उन्होंने ये भी माना कि इस जंग में और भी अमेरिकियों की जान जा सकती है. हालांकि ट्रंप का कहना था कि अभी हालात जमीन पर सैनिक भेजने की नहीं है, लेकिन जरूरत पड़ी तो सैनिक भी भेजेंगे. अगर ऐसा हुआ तो अफगानिस्तान और इराक के बाद ये पहली बार होगा. हालांकि ये वही ट्रंप हैं, जिन्होंने राष्ट्रपति बनते ही अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना को वापस बुलाने का हुक्म दिया था.
ये वही ट्रंप हैं जिन्होंने राष्ट्रपति चुनाव के दौरान कैंपेनिंग में बार-बार ये कहा था कि अब अमेरिका किसी देश में अपनी सेना नहीं भेजेगा. ना जंग का कोई नया मैदान खोलेगा. क्योंकि इससे अरबों डॉलर खर्च आता है. लेकिन अपने दूसरे कार्यकाल में जब से ट्रंप आए हैं, 8 देशों पर अब तक हमला कर चुके हैं. पिछले साल जून को जोड़ लें, तो ईरान पर दो बार. इसके अलावा इराक, सीरिया, यमन, सोमालिया, नाईजीरिया, लैटिन अमेरिका में नौकाओं पर हमले और वेनेजुएला.
कमाल ये कि ये वही ट्रंप हैं, जो चीख-चीख कर अपने लिए नोबल पीस प्राइज मांगते नहीं थकते. इस दम पर कि उन्होंने 8 देशों के बीच जंग रुकवाई. पर दूसरा पहलू ये है कि 8 देशों पर हमले भी किए. अमेरिका के इतिहास में ट्रंप पहले ऐसे प्रेसिडेंट हैं, जिन्होंने सिर्फ साल भर के अंदर 8 देशों पर हमले किए.
(आजतक ब्यूरो)