
साढ़े पांच करोड़ पेंडिग केस का बोझा या दबाव क्या होता है? इसकी ताजा मिसाल देश की एक अदालत से सामने आई है. 85 साल का एक बुजुर्ग जो अपने पैरों पर ठीक से चल भी नहीं सकता. कमर से ऊपर खुद को उठा भी नहीं सकता. 34 साल पुराने एक मुकदमें के सिलसिले में उसे अदालत में पेश किया जाता है. और फिर जो होता है, वो सचमुच हैरान करने वाला है.
कहते हैं कि कानून के हाथ में बहुत लंबे हैं. आदमी मर जाता है, मगर केस नहीं मरता. पर कानून के उसी लंबे हाथ को कब्र में पांव लटकाए एक बुजुर्ग तक पहुंचने में इतना वक्त लग गया कि अब खुद कानून को लगता है कि इसे सज़ा देना शायद खुद कानून को सजा देना है. लिहाजा, उसे पकड़ा, कोर्ट तक लाए, सजा सुनाई, जेल भेजा और फिर छोड़ दिया.
कानून के लंबे हाथ को फिलहाल किनारे रखते हैं. आदमी मर जाता है पर केस नहीं. ये लाइन इस बुजुर्ग के ज़रिए एक सवाल बनकर उछल रहा है. एक ऐसा सवाल जो सिस्टम के लिए है. कोर्ट और इंसाफ के लिए है. कानून के ऐसे लंबे हाथ का क्या फायदा? जो किसी के गिरेबान तक तब और उस उम्र में पहुंचे जब ना उसे अपना केस याद हो ना जुर्म और यहां तक की अपना नाम पता.
कानून के ऐसे लंबे हाथ का क्या फायदा जो किसी को तब सजा दे जब वो खुद मौत का इंतजार कर रहा हो. कानून के ऐसे लंबे हाथ का क्या फायदा जो उस मुल्जिम या मुजरिम को खुद उसके पैरों पर बिना किसी सहारे चलाकर कोर्ट की दहलीज तक ला सके. कानून के ऐसे लंबे हाथ का क्या फायदा जो तब सजा दे जब सजा पाने वाले को इस बात का अहसास ही ना हो कि पुलिस क्या होती है? अदालत क्या होती है या जेल और घर में क्या फर्क होता है? पर सचमुच कानून का हाथ बहुत लंबा होता है. आदमी मर जाता है पर केस नहीं.
हड्डियों के ढांचे में तब्दील हो चुके उस बुजुर्ग का नाम दीप राय है. उम्र बताना जरुरी है. क्योंकि दीप राय के इसी उम्र से आपको कानून के लंबे हाथ की असलियत समझ में आएगी. दीप राय इस वक्त 85 साल के हैं.
बिहार के वैशाली जिले में मौजूद ये हाजीपुर की एक अदालत है. रोजाना की तरह अदालत में भीड़ थी. पर तभी लोगों की नज़र एक ऐसी तस्वीर पर पड़ती है कि वो उसे देखने से खुद को रोक नहीं पाते. दो लोग दीप राय को सहारा देकर कोर्ट के अंदर लाते हैं. पर दीप राय शायद 5 कदम भी एक बार में नहीं चल पा रहे. थककर बैठ जाते हैं. फिर उठते हैं, फिर सहारा मिलता है, फिर कुछ कदम चल पड़ते हैं. दीप राय के आगे आगे दो तीन पुलिसवाले चल रहे हैं. यानि कायदे से इस वक्त दीप राय पुलिस कस्टड़ी में अदालत में पेश किए जा रहे हैं.
कायदे से होना तो ये चाहिए कि इन्हीं पुलिसवालों को दीप राय को शिकंजे में लेकर कोर्ट तक ले जाना चाहिए. पर क्या कीजिएगा पुलिसवालों को भी लगा कि जो शख्स पूरी तरह खड़ा भी नहीं हो पा रहा है, जो कमर तक झुक कर चल रहा है, उसे पकड़ कर 100, 200 कदम भी कैसे ले जाया जाएं. इसीलिए पुलिसवाले आगे आगे चल दिए और दीप राय के रिश्तेदार खुद ही उन्हें पकड़कर पुलिसवालों का काम कर रहे हैं.
उम्र का बोझ इतना कि जब दीप राय थककर बैठते हैं तो घुटने में उनका सिर आ जाता है. खैर, किसी तरह बड़ी मशक्कत के बाद दीप राय अब कोर्ट के अंदर पहुंच जाते हैं. जाहिर है कोर्टरूम की तस्वीरें होती नहीं क्योंकि अंदर कैमरा जाता नहीं. तो अब अंदर की कहानी वैसे ही सुना देते हैं.

असल में दीप राय पर हत्या की कोशिश का एक मुकदमा चल रहा है. इल्जाम है कि उन्होंने अपने 8 साथियों के साथ मिलकर अपने पड़ोसी के घर के बाहर शीशे बिछाए और फिर गोलियां चलाई. पर आपको एक बात तो बतानाा भूल ही गया ये सब कुछ 34 साल पहले हुआ था. साल था 1992. बेशक कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं पर इतने लंबे भी नहीं कि बुढ़ापे में आने वाली मौत को डंडा दिख कर रोक लें. अब 92 का मामला था 34 लंबे साल हो चुके थे. तो हुआ ये कि 9 आरोपियों में से चार मर गए. पर जाहिर है केस थोड़े ही मरेगा. तो केस चलता रहा और उन्हीं में से एक दीप राय भी थे.
तो कोर्टरूम के अंदर 34 साल बाद वकील, दलील सबकुछ हुआ फिर अदालत ने अपना फैसला सुनाया. 51 की उम्र में आरोपी बने दीप राय को 34 साल बाद 85 की उम्र में दोषी करार दिया गया. उनके साथ के बाकी चार लोगों को भी अदालत ने दोषी माना. सभी को 10-10 साल की सजा सुनाई गई. अब जाहिर है सजा काटने के लिए जेल ही जाना था.
अदालत ने जैसे ही दीप राय को गुनहगार ठहराया कोर्टरूम से दीप राय फिर सहारे के सहारे वापस बाहर आए. दीप राय के केस का फैसला आते ही अब मीडिया दीप राय के सामने थी. माइक उनके मुंह पर था और दीप राय कुछ इस अंदाज में मीडिआ के सामने बैठे थे. तभी एक सवाल गूंजा क्या हुआ आज, जज साहब क्या फैसला सुनाए? कोई जानकारी है? कोई जानकारी मिला है?
जाहिर है दीप राय कुछ समझते बूझते तभी तो जवाब देते. मीडिया वाले भी समझ गए तो सब निकल लिए. इसके बाद अब कोर्ट से इसी आलम में उन्हें इस जेल तक पहुंचाया गया है. खबर तो ये भी है कि खुद जेल स्टाफ ने जब दीप राय की शक्ल में अपने नए कैदी को देखा तो वो भी हैरान कम परेशान ज्यादा नजर आए. हैरान इसलिेए थे कि इसने इस उम्र में क्या कर डाला और परेशान ये सोच कर कि इसकी देखभाल कैसे करेंगे?
पर शायद दीप राय और उनके बुढापे को देखकर खुद कोर्ट को लगा कि जो ठीक से खड़ा नहीं हो पा रहा है, जो सहारे के बिना चल नहीं सकता, जिसके मुंह तक कोई निवाला ना पहुंचाए तो वो खा नहीं सकता. ऐसे में जेल में वो रहेगा कैसे?
लिहाजा, अदालत ने दीप राय की सजा 10 साल की बजाय 3 साल कर दिया. कानून में 3 साल की सजा का एक अलग मजा है. 3 साल की सजा पाने वाला कोई भी मुजरिम आसानी से जमानत पर बाहर आ सकता है. लिहाजा दीप राय को तीन साल की सजा देकर अदालत ने एक साथ दो काम कर दिया. जेल वालों की परेशानी दूर कर दी. और जमानत पर दीप राय को बाहर निकाल कर आखिरी घड़ी में उसकी देखभाल के लिए उसे उसके परिवार को सौंप दिया.
हाजीपुर जेल से एक मोटरसाइकिल बाहर निकलती है. हालांकि बाइक पर तीन लोगों का बैठना ट्रैफिक नियम का उल्लघंन है. लेकिन यहां ये एक मजबूरी है. क्योंकि जेल से घर काफी दूर है. लिहाजा, एक रिश्तेदार बाइक चला रहा है. बीच में दीप राय बैठे हैं और पीछे दूसरा रिश्तेदार उन्हें पकड़कर बैठा है.
जेल से दीप राय अब अपने घर आ चुके हैं. चारपाई पर लेटे हैं. परिवार की लोग उनकी सेवा में लगे हैं. कोई उन्हें खाना खिलाता है. कोई पानी देता है. 85 साल पहले दीप राय जब पैदा हुए होंगे, तब शायद उन्होंने उस वक्त भी वायरल या वायरल बुखार तक के बारे में नहीं सुना होगा. अब उम्र के इस पड़ाव पर मीडिया उन्हीं दीप राय से उनके वायरल होने की बात पूछ रही है. सचमुच ये वाली अजीब बातचीत है.
अब दीप राय के बाद मीडिया का रुख उस घर की तरफ था जिस घर के लोगों पर 34 साल पहले दीप राय और उनके साथी या रिश्तेदारों ने गोलियां चलाई थी. उनसे भी पूछा गया। कि कोर्ट के इस फैसले पर वो क्या कहते हैं? क्या उन्हें कानून के लंबे हाथ ने इंसाफ दिलाया?
तीन गोली खाने वाले राम सिंह को क्या इंसाफ मिला? 34 साल पहले गोली चलाने वाले दीप राय के साथ क्या उसी कानून ने इंसाफ किया? कायदे से इस केस में पीड़ित और अभियुक्त दोनों के साथ नाइंसाफी हुई. पर फिर भी कहने सुनने में अच्छा लगता है कि कानून के हाथ बहुत लंबे है. भले ही आदमी मर जाए. केस नहीं मरता.
(वैशाली से विकास कुमार का इनपुट)