मानसिक रूप से बीमार एक लड़का ना जाने कहां से एक पिस्टल ले आता है. ये खबर मिलते ही पुलिस उस लड़के के घर पहुंच जाती है. चार घंटे तक पुलिसवाले उस युवक से लगातार बातचीत करते हैं. इसके बाद पुलिस उस लड़के की पिस्टल अपने कब्जे में लेने के बजाय खाली हाथ वहां से लौट जाती है. अगली सुबह वही लड़का उसी पिस्टल को लेकर एक खेत में पहुंच जाता है. सामने से पुलिस भी आ जाती है. ये सब कुछ फेसबुक पर लाइव चल रहा था. तभी पुलिस के कहने पर वो लड़का पिस्टल को जमीन पर फेंक देता है. और यहीं से शुरू होती है एक खौफनाक कहानी.
पटना से करीब 90 किलोमीटर दूर भोजपुर जिले में मौजूद है शाहपुर इलाका. सुबह का वक्त था और गांव का खेत. सामने पुलिस की तीन गाड़ियां खड़ी थी. बहुत सारे पुलिस वाले वहां मौजूद थे. कुछ गांव वाले भी थे और दूसरी तरफ एक लड़का खेत में खड़ा था. जिसके हाथ में एक तमंचा था मतलब हाथ में तमंचा लिए लड़का और हथियारों से लैस पुलिस वाले आमने-सामने थे. ये सबकुछ फेसबुक पर लाइव चल रहा था.
कुछ देर बाद फ्रेम बदल जाता है. अब आवाज भी साफ सुनाई दे रही थी. तो पहले तमंचा हाथ में लिए वो लड़का पुलिस वालों से क्या कहना चाहता था और क्या कह रहा था. ये फेसबुक लाइव में दिख रहा था. पुलिस उसे चेतावनी देती है. पुलिस के कहते ही लड़का अपना तमंचा फेंक देता है. अब तमंचा सामने पुलिस वालों से चंद कदम की दूरी पर जमीन पर पड़ा था. लड़के के तमंचा फेंकते ही अब पुलिस वाले आगे बढ़ते हैं. पर इसके बाद क्या होता है, वो जानने से पहले ये जान लीजिए कि इससे पहले क्या हुआ था?
बात 16 जून की है. कुछ पुलिस वाले एक घर में पहुंचे थे. वो घर उसी लड़के का था, जिसे हाथों में तमंचा लहराते देखा गया था. असल में उसका नाम भरत भूषण तिवारी है. 16 जून मंगलवार को जब पुलिस भरत के घर पहुंची थी, तब भी भरत के हाथ में वही तमंचा था. वो तमंचा पकड़े खड़े और बैठे पुलिस वालों से बात कर रहा था. करीब 4 घंटे तक भरत और पुलिस वालों के बीच ये बातचीत चली. और फिर पुलिस लौट गई. भरत से बिना उसका तमंचा कब्जे में लिए. ये सबकुछ भी कैमरे में रिकॉर्ड हो रहा था क्योंकि तब भी भरत का नाम वो लड़का फेसबुक पर लाइव था.
अब रात हो चुकी थी. खामोशी से पुलिस की टीम भरत के घर के चारों तरफ घेरा डाल देती है. इस उम्मीद में कि वो घर से बाहर निकले तो उसे पकड़ लें या मार दें. लेकिन भरत घर से बाहर नहीं निकलता. अब बुधवार की सुबह हो चुकी थी. भरत को पता चल चुका था कि पुलिस वाले उसके घर के इर्द गिर्द घेरा डाले हुए हैं. इसी के बाद वो अपने घर की छत पर जाता है. एक बार फिर से भरत पहले फेसबुक पर लाइव जाता है, तमंचा अब भी उसके हाथ में है. तमंचा दिखा कर वो छत पर से ही पुलिस वालों को धमकाता है और फिर गोलियां चलाता है. भरत के गोली चलाते ही पुलिस वाले पीछे हट जाते हैं.
पुलिस वालों के पीछे हटते ही अब भरत अपनी बाइक पर घर से निकलता है. और लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर खेतों के बीच बने उस टेंपररी आशियाने के करीब पहुंचता है, जहां कुछ बाढ़ पीड़ित परिवारों को लाकर रखा गया था. पुलिस पहले से ही भरत की ताक में थी. जैसे ही वो उस जगह पर पहुंचता है, पुलिस उसे सामने खड़ी मिलती है. इसके बाद फिर से भरत फेसबुक पर लाइव जाता है. लगभग पांच मिनट तक पुलिस और भरत के बीच बातचीत होती है. सबकुछ लाइव जा रहा था. पांच मिनट बाद आखिरकार भरत अपनी कुछ शर्तें मानने के पुलिस के आश्वासन के बाद तमंचा जमीन पर फेंक देता है. और इसी के साथ भरत फेसबुक लाइव भी बंद कर देता है. यानी अब कैमरे पर कुछ रिकॉर्ड नहीं हो रहा था. अब इसके आगे की कहानी बताते हैं.
तमंचा फेंकने और फेसबुक लाइव बंद होते ही अचानक गोलियां चलने की आवाज आती है. शायद 3 या 4 गोली चली थी. और ये सारी गोलियां भरत के पैरों पर पेट के निचले हिस्से पर लगी. गोली उन पुलिस वालों ने तब चलाई, जब भरत तमंचा फेंकने के बाद निहत्था हो चुका था. और शायद सरेंडर करने जा रहा था. ज्यादा खून बह जाने की वजह से भरत की हालत नाजुक थी. लिहाजा स्थानीय अस्पताल और डॉक्टर ने उसे पटना ले जाने की सलाह दी.
अब भरत को 90 किलोमीटर दूर पटना के एक अस्पताल में लाया जाता है. लेकिन ज्यादा खून बह जाने की वजह से भरत की मौत हो चुकी थी. पुलिस एनकाउंटर में भरत की मौत की खबर जैसे ही इलाके में फैली, लोगों को गुस्सा आ गया. गुस्से की वजह ये थी कि भरत मानसिक रूप से बीमार एक नौजवान था. और ये बात पूरा इलाका जानता था. ऊपर से सबकुछ फेसबुक पर लाइव चल रहा था. लोगों ने भरत को पिस्टल फेंकते हुए भी देखा था.
फिर उनका सवाल था कि एक निहत्थे और मानसिक रूप से बीमार नौजवान को एनकाउंटर के नाम पर क्यों मारा गया? लिहाजा, स्थानीय लोगों ने भरत की लाश नेशनल हाईवे पर रख कर एसडीएम और एसपी के खिलाफ नारे लगाने लगे.
अब आखिर भरत की पूरी कहानी क्या है? मानसिक रूप से कमजोर एक नौजवान का पुलिस ने एनकाउंटर क्यों किया? और खुद भरत के पास तमंचा कहां से आया? तो पूरी कहानी कुछ यूं है. भरत के पिता बिहार पुलिस में नौकरी कर चुके हैं. खुद भरत ने बीएससी किया है. लेकिन काफी कोशिश के बावजूद उसे नौकरी नहीं मिली. फिर अचानक उसने सबकुछ छोड़ कर खुद को समाजसेवा में झोंकने का फैसला किया. दस साल पहले उसने इसकी शुरुआत अपने ही पिंडदान से की.
असल में भरत से किसी की दिक्कत और परेशानी देखी नहीं जाती थी. ऐसे मजबूर लोगों की वो आवाज बनने की कोशिश कर रहा था. भरत अब गरीब और बेसहारा लोगों की मदद करने लगा था. हाल ही में बिहार के कई इलाकों में बाढ़ आई थी. बहुत से बाढ़ पीड़ित परिवारों को अलग-अलग जगहों पर शिफ्ट किया गया था. ऐसे ही कुछ परिवार भरत के घर से करीब डेढ़-दो किलोमीटर की दूरी पर अपने टेंपररी आशियाने में रह रहे थे. लेकिन इस जगह की हालत खराब थी. लोग गड्ढों में रहने को मजबूर थे. और वहां भी पानी था.
इस परेशानी को लेकर भरत लगातार आवाज उठा रहा था. इस सिलसिले में वो एसडीएम से भी मिला था. भरत के भाई चंदन का इल्जाम है कि बस इसी वजह से एसडीएम भरत से नाराज थे.
कमाल ये है कि जिस भरत का खुद पुलिस ने एनकाउंटर किया, उस भरत के बारे में वही पुलिस खुद ही ये दावा भी कर रही है कि वो मानसिक रूप से कमजोर है और उसे दिमागी इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराना जरूरी है. यहां तक कि पुलिस ये भी कहती है कि उसे इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है. ये देखिए ये 16 जून को भोजपुर के एसपी दफ्तर से जारी प्रेस रिलीज है. प्रेस रिलीज से साफ होता है कि जिसे खुद पुलिस ने मानसिक रूप से बीमार माना, उसी का एनकाउंटर कर दिया.
अब इसी पुलिस का कमाल देखिए पुलिस को पता है कि भरत की मानसिक हालत ठीक नहीं थी. इसी 16 जून को पुलिस भरत के घर पर भरत के साथ 4 घंटे तक रहती है. उन 4 घंटों में लगातार भरत हाथ में तमंचा लिए रहता है. लेकिन इस पुलिस से इतना नहीं हो पाता कि वो किसी तरह उससे तमंचा वापस ले ले. वो भरत के पास तमंचा छोड़ कर ही लौट जाती है. अगर पुलिस 16 जून को ही भरत का तमंचा अपने कब्जे में ले लेती, तो शायद इस एनकाउंटर की नौबत ही नहीं आती. अब एनकाउंटर के बाद जब लोग गुस्से में हैं, तब पुलिस जांच और कार्रवाई की बात कर रही है.
भोजपुर पुलिस का एक और कमाल देखिए. एनकाउंटर के फौरन बाद उन्होंने एक दूसरी प्रेस रिलीज जारी की. जिसमें लिखा कि भरत ने पुलिस वालों के करीब आने पर उन पर गोलियां चलाई. जिसके जवाब में पुलिस ने भी भरत के पैरों पर गोलियां चलाई. हालांकि इस प्रेस रिलीज को कुछ देर बाद ही भोजपुर पुलिस ने डिलीट भी कर दिया. जानते हैं क्यों? क्योंकि शायद पुलिस को अहसास हुआ कि सबकुछ फेसबुक पर लाइव चल रहा था और भरत ने फेसबुक लाइव के दौरान ही अपना तमंचा जमीन पर फेंक दिया था. और इस दौरान उसने एक बार भी गोली नहीं चलाई.
वो तो शुक्र है कि सारी तस्वीरें फेसबुक लाइव के जरिए कैमरे में कैद थी. वरना भरत के एनकाउंटर को लेकर भोजपुर पुलिस न जाने क्या-क्या कहानियां गढ़ती. हालांकि कचोटने वाला सवाल ये कि ये जानते हुए भी कि भरत मानसिक रूप से बीमार है तो फिर उसका एनकाउंटर क्यों किया? क्या भोजपुर के आला पुलिस अफसर, बिहार के डीजीपी और मुख्यमंत्री इसका जवाब देंगे?
भरत तिवारी की मौत के बाद उनके पिता काशीनाथ तिवारी ने पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. बेटे को खोने का दर्द उनकी आंखों में साफ दिखाई दे रहा था. उन्होंने कहा कि भरत किसी भी आपराधिक मामले में शामिल नहीं था और उसके खिलाफ न तो कोई एफआईआर दर्ज थी और न ही किसी अदालत में उसके खिलाफ कोई चार्जशीट दाखिल हुई थी. उनके मुताबिक, भरत समाज के मुद्दों को लेकर आवाज उठाता था और लोगों की मदद करने की कोशिश करता था.
काशीनाथ तिवारी का आरोप है कि मुठभेड़ से पहले उनके बेटे ने पुलिस के सामने हथियार नीचे रख दिया था और आत्मसमर्पण कर दिया था. उनका कहना है कि जब भरत ने पिस्टल फेंक दी थी और वह पुलिस की गिरफ्त में आने को तैयार था, तब उसे गोली मारने की जरूरत क्यों पड़ी? उन्होंने कहा कि भरत कोई कुख्यात अपराधी नहीं था, फिर भी उसके साथ ऐसा व्यवहार किया गया. बेटे का जिक्र करते हुए वह भावुक हो गए और कहा कि जिस युवक को पहले मानसिक रूप से अस्वस्थ बताया गया, उसी को बाद में गोलियों से छलनी कर दिया गया.
उधर, पटना के पीएमसीएच में पोस्टमार्टम के बाद भरत तिवारी का शव परिजनों को सौंप दिया गया. लेकिन इस घटना के बाद भोजपुर जिले और आसपास के इलाकों में पुलिस के खिलाफ लोगों का गुस्सा खुलकर सामने आ रहा है. स्थानीय लोगों और परिजनों के बीच इस बात को लेकर नाराजगी है कि पूरे घटनाक्रम में कई ऐसे पहलू हैं, जिनके जवाब अब तक सामने नहीं आए हैं.
इस एनकाउंटर के बाद कई सवाल चर्चा के केंद्र में हैं। आखिर भरत तिवारी किस वजह से व्यवस्था से नाराज था और वह किन मुद्दों को लेकर लगातार आवाज उठा रहा था? क्या उसकी नाराजगी के पीछे कोई निजी कारण था या फिर वह सामाजिक समस्याओं को लेकर संघर्ष कर रहा था? सबसे बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि जब उसके खिलाफ कोई आपराधिक इतिहास नहीं था, तब उसे गिरफ्तार करने की बजाय गोली चलाने की नौबत क्यों आई?
इसके अलावा यह सवाल भी उठ रहे हैं कि बिहार में पुलिस आम तौर पर मुठभेड़ों में पैरों में गोली मारने की बात कहती रही है, लेकिन इस मामले में भरत को कई गोलियां लगने की बात सामने आई. ऐसे में अगर उसने वास्तव में हथियार छोड़कर आत्मसमर्पण कर दिया था, तो फिर वह पुलिस के लिए कितना बड़ा खतरा था? इन सवालों के जवाब फिलहाल जांच और पुलिस के आधिकारिक पक्ष पर टिके हुए हैं, लेकिन घटना ने कानून व्यवस्था और पुलिस कार्रवाई के तौर-तरीकों को लेकर नई बहस छेड़ दी है.
उधर, भरत तिवारी एनकाउंटर को लेकर विपक्ष के साथ-साथ अब सत्ता पक्ष के नेताओं की ओर से भी सवाल उठने लगे हैं. भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे ने इस घटना पर चिंता जताते हुए पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की मांग की है. उन्होंने इसे बेहद दुखद और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चिंताजनक घटना करार दिया है.
सोशल मीडिया पर जारी अपने बयान में अश्विनी चौबे ने कहा कि यदि भरत तिवारी ने वास्तव में हथियार छोड़कर आत्मसमर्पण कर दिया था, तो उसके बाद गोली चलाए जाने की जरूरत क्यों पड़ी? उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति के सरेंडर के बाद कानून के दायरे में रहते हुए उसे हिरासत में लिया जाना चाहिए था, न कि उसकी जान ले ली जानी चाहिए थी.
पूर्व केंद्रीय मंत्री ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से इस मामले में हस्तक्षेप करने और पूरे घटनाक्रम की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की. साथ ही उन्होंने कहा कि यदि जांच में किसी पुलिस अधिकारी या कर्मी की भूमिका संदिग्ध पाई जाती है, तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए.
अश्विनी चौबे ने बिहार सरकार से भी जवाबदेही तय करने की मांग की. उन्होंने उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से अपील करते हुए कहा कि अगर जांच में पुलिसकर्मियों की गलती सामने आती है, तो उनके खिलाफ कार्रवाई कर सुशासन का संदेश दिया जाना चाहिए.
उन्होंने यह भी कहा कि युवाओं को अपराध और भटकाव से दूर रखने की जिम्मेदारी सरकार और प्रशासन की होती है. ऐसे मामलों में कानून के बजाय गोली का इस्तेमाल होने से न्याय व्यवस्था और पुलिस कार्रवाई की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं. यही वजह है कि भरत तिवारी एनकाउंटर अब सिर्फ एक पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि राजनीतिक और प्रशासनिक बहस का विषय बनता जा रहा है.
(भोजपुर से सोनू कुमार सिंह)