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95 साल बाद बड़ा मुकाम, इंजन बदलने का झंझट खत्म! ये 5,068 KM रेल नेटवर्क 100% इलेक्ट्रिफाइड

भारतीय रेलवे के इलेक्ट्रिफिकेशन कैम्पेन को बड़ी कामयाबी मिली है. दक्षिण भारत के एक बड़े रेल नेटवर्क का अब पूरा हिस्सा इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन पर आ गया है. इसके साथ ही हजारों किलोमीटर लंबे नेटवर्क पर ट्रेनों के संचालन का तरीका बदल गया है.इस मुकाम तक पहुंचने में रेलवे को करीब 95 साल का लंबा सफर तय करना पड़ा है.

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सदर्न रेलवे ने 95 साल के सफर के बाद अपने पूरे ब्रॉड गेज नेटवर्क पर 100% इलेक्ट्रिफिकेशन हासिल किया. (File Photo: X/@RailMinIndia)
सदर्न रेलवे ने 95 साल के सफर के बाद अपने पूरे ब्रॉड गेज नेटवर्क पर 100% इलेक्ट्रिफिकेशन हासिल किया. (File Photo: X/@RailMinIndia)

भारतीय रेलवे ने अपने नेटवर्क को ज्यादा मॉडर्न और एनर्जी-एफिशिएंट बनाने की दिशा में एक और बड़ा पड़ाव हासिल किया है. दक्षिण भारत के अहम रेल नेटवर्क सदर्न रेलवे का पूरा ब्रॉड गेज नेटवर्क अब बिजली से चलने वाली ट्रेनों के लिए तैयार हो गया है. इसका मतलब ये हुआ कि 5,068 रूट-किलोमीटर के पूरे सदर्न रेलवे नेटवर्क का 100% इलेक्ट्रिफिकेशन पूरा हो गया है. यह उपलब्धि 95 साल लंबे उस सफर के बाद मिली है, जो 1931 में शुरू हुआ था.

सदर्न रेलवे का 100% इलेक्ट्रिफिकेशन तमिलनाडु के 71 किलोमीटर लंबे पट्टुकोट्टई-कारैकुडी (Pattukottai-Karaikudi) रेल सेक्शन के पूरा होने के साथ हासिल हुआ. इस सेक्शन का इंस्पेक्शन 9 सितंबर 2026 को पूरा किया गया था. सदर्न रेलवे के प्रिंसिपल चीफ इलेक्ट्रिकल इंजीनियर श्री गणेश ने यह इंस्पेक्शन किया था. इस सेक्शन के पूरा होने के साथ सदर्न रेलवे के पूरे 5,068 रूट-किलोमीटर ब्रॉड गेज नेटवर्क पर इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन (Electric Traction) की सुविधा उपलब्ध हो गई है.

1931 में शुरू हुआ था सफर

सदर्न रेलवे में इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन का सफर करीब 95 साल पहले शुरू हुआ था. 11 मई 1931 को मद्रास रीजन में पहली बार इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन शुरू किया गया था. इसके बाद समय के साथ रेलवे नेटवर्क के अलग-अलग हिस्सों का फेजवाइज इलेक्ट्रिफिकेशन किया गया. धीरे-धीरे डीजल ट्रैक्शन पर निर्भरता कम होती गई और इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन का दायरा बढ़ता गया. अब 2026 में पूरा नेटवर्क इस इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन के तहत आ गया है.

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इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन का मतलब ट्रेन को खींचने के लिए बिजली का उपयोग करने से है. ट्रैक के इलेक्ट्रिफिकेशन से ट्रेन को डीजल लोकोमोटिव की बजाय बिजली से चलने वाला इंजन खींचता है.

इंजन बदलने की जरूरत नहीं

पूरे नेटवर्क के इलेक्ट्रिफिकेशन का एक बड़ा फायदा ट्रेन ऑपरेशन में मिलेगा. पहले अगर किसी रूट का अगला हिस्सा इलेक्ट्रिफाइड नहीं होता था, तो ट्रेन को आगे चलाने के लिए ट्रैक्शन बदलना पड़ सकता था. इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव को ओवरहेड इलेक्ट्रिक वायर (OHE) से बिजली मिलती है. अगर आगे का सेक्शन इलेक्ट्रिफाइड न हो, तो ट्रेन को डीजल लोकोमोटिव से चलाने की जरूरत पड़ सकती थी. अब सदर्न रेलवे के पूरे ब्रॉड गेज नेटवर्क पर इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन उपलब्ध होने से ऐसी जरूरत खत्म हो जाएगी.

ट्रेन ऑपरेशन हो गया आसान

ट्रैक्शन बदलने में अतिरिक्त समय लगता है. इसके अलावा लोकोमोटिव और क्रू के स्तर पर भी अतिरिक्त समन्वय करना पड़ता है. पूरे नेटवर्क के इलेक्ट्रिफाइड होने से ट्रेनों का ऑपरेशन ज्यादा आसान बन जाएगा. इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकेगा और ऑपरेशन से जुड़ी बाधाएं खत्म होंगी. इससे ट्रेनों की एफिशिएंसी बढ़ाने में मदद मिलेगी.

अब तेल पर निर्भरता हुई खत्म

रेलवे के लिए इलेक्ट्रिफिकेशन सिर्फ ट्रेन संचालन को आसान बनाने तक सीमित नहीं है. इसका एक बड़ा उद्देश्य जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuel) पर निर्भरता कम करना भी है. रेल मंत्रालय ने 11 सितंबर 2026 को इस उपलब्धि को सस्टेनेबल रेल जर्नी की दिशा में एक बड़ी छलांग बताया. पूरे नेटवर्क पर इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन उपलब्ध होने से डीजल पर निर्भरता घटेगी और रेलवे के मॉडर्नाइजेशन के प्रयासों को भी मजबूती मिलेगी.

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