लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी का सिर्फ एक प्रीमियम समय पर जमा न करना कई बार लाखों रुपये के डेथ क्लेम पर भारी पड़ सकता है. महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (MSCDRC) के एक हालिया फैसले ने यह स्पष्ट किया है कि यदि पॉलिसी लैप्स हो चुकी है, तो केवल रिवाइवल (Revival) का कोटेशन जारी होना यह साबित नहीं करता कि बीमा कवर फिर से एक्टिव (Active) हो गया है. ऐसे में पॉलिसीधारकों के लिए समय पर प्रीमियम जमा करना और पॉलिसी का स्टेटस नियमित रूप से जांचना बेहद जरूरी है.
रिपोर्ट के मुताबिक, एक पॉलिसीधारक की मृत्यु उस समय हुई, जब बीमा कंपनी की ओर से पॉलिसी रिवाइवल का कोटेशन अभी भी वैध था. हालांकि, महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने माना कि रिवाइवल कोटेशन का वैध होना, पॉलिसी के एक्टिव होने के बराबर नहीं है. इसी आधार पर आयोग ने करीब 70 लाख रुपये का डेथ क्लेम खारिज करने के HDFC Life Insurance के फैसले को सही ठहराया. हालांकि, मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए आयोग ने कंपनी को पहले वर्ष में जमा किए गए लगभग 7 लाख रुपये के प्रीमियम पॉलिसीधारक को लौटाने का निर्देश दिया.
ग्रेस पीरियड खत्म होने के बाद क्या होता है?
इंश्योरेंस पॉलिसी में प्रीमियम की तय तारीख निकलने के बाद आमतौर पर एक ग्रेस पीरियड (Grace Period) मिलता है. इस अवधि में प्रीमियम जमा करने पर पॉलिसी की शर्तों के अनुसार इंश्योरेंस कवरेज जारी रह सकती है. लेकिन यदि ग्रेस पीरियड समाप्त होने तक प्रीमियत का भुगतान नहीं किया जाता, तो पॉलिसी लैप्स हो सकती है. हालांकि, हर पॉलिसी का परिणाम एक जैसा नहीं होता. कुछ पारंपरिक (Traditional) जीवन बीमा पॉलिसियां न्यूनतम प्रीमियम जमा होने के बाद Paid-up स्थिति में चली जाती हैं, जहां कम लाभ के साथ पॉलिसी जारी रहती है. लेकिन टर्म इंश्योरेंस जैसी Pure Protection Policies में यदि पॉलिसी लैप्स हो जाए तो डेथ क्लेम का अधिकार समाप्त हो सकता है.
रिवाइवल और एक्टिव पॉलिसी में क्या अंतर?
लैप्स हो चुकी पॉलिसी को बाद में Revival प्रक्रिया के जरिए दोबारा चालू कराया जा सकता है. इसके लिए बकाया प्रीमियम, ब्याज, अतिरिक्त शुल्क और कई मामलों में मेडिकल जांच या स्वास्थ्य संबंधी डिक्लरेशन भी देनी पड़ सकती हैं. इंश्योरेंस मार्केट के एक्सपर्ट्स का कहना है कि इंश्योरेंस कंपनी की ओर से भेजा गया रिवाइवल रिमाइंडर, भुगतान की राशि या अंतिम तारीख यह साबित नहीं करती कि इंश्योरेंस कवर पहले से सक्रिय है. पॉलिसीधारकों को हमेशा कंपनी से लिखित रूप में यह पुष्टि करनी चाहिए कि उनकी पॉलिसी In-force यानी लागू है या नहीं.
पहले जमा किए गए प्रीमियम का क्या होगा?
पॉलिसी लैप्स होने का मतलब यह नहीं कि पहले जमा किए गए सभी प्रीमियम स्वतः वापस मिल जाएंगे. यह पूरी तरह पॉलिसी के प्रकार, जमा किए गए प्रीमियम की संख्या और पॉलिसी की शर्तों पर निर्भर करता है. विशेष रूप से टर्म इंश्योरेंस में सामान्य तौर पर कोई सरेंडर वैल्यू नहीं बनती. इसलिए इस मामले में पहले वर्ष का प्रीमियम लौटाने का आदेश एक विशेष परिस्थिति में दिया गया फैसला माना जा रहा है, न कि सामान्य नियम.
प्रीमियम भरने से चूक गए तो फिर क्या करें?
यदि किसी कारण से प्रीमियम जमा नहीं हो पाया है, तो सबसे पहले अपनी पॉलिसी का मौजूदा स्टेटस जांचें. यह देखें कि ग्रेस पीरियड अभी चल रहा है या समाप्त हो चुका है. यदि ग्रेस पीरियड जारी है तो तुरंत प्रीमियम जमा करें. अगर पॉलिसी लैप्स हो चुकी है तो बीमा कंपनी से रिवाइवल की प्रक्रिया और आवश्यक दस्तावेजों की जानकारी लें. रिवाइवल पूरा होने के बाद उसकी लिखित पुष्टि अवश्य प्राप्त करें.
पॉलिसीधारकों के लिए जरूरी सलाह
एक्सपर्ट्स का कहना है कि केवल ऑटो-डेबिट सुविधा पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है. बैंक खाते में पर्याप्त बैलेंस न होना, कार्ड की वैधता समाप्त होना, बैंक अकाउंट बदल जाना या तकनीकी कारणों से भुगतान विफल हो सकता है. इसलिए मोबाइल नंबर, ईमेल आईडी और बैंक डिटेल्स हमेशा अपडेट रखें. साथ ही अपने नॉमिनी को पॉलिसी नंबर, इंश्योरेंस कंपनी का नाम, दस्तावेजों की जानकारी और प्रीमियम भुगतान की तारीख की जानकारी भी दें. कोर्ट के इस फैसले से यह स्पष्ट है कि लाइफ इंश्योरेंस में रिवाइवल की संभावना और सक्रिय बीमा कवर दोनों अलग-अलग बातें हैं. समय पर प्रीमियम जमा करना और पॉलिसी का स्टेटस नियमित रूप से जांचना ही बड़े डेथ क्लेम को सुरक्षित रखने का सबसे प्रभावी तरीका है.