आठवां वेतन आयोग (8th Pay Commission) अभी लागू नहीं किया गया है. इसे लेकर कर्मचारी यूनियनों की डिमांड लगातार आ रही हैं. सरकार वेतन, पेंशन, भत्तों में संशोधन से जुड़े मुद्दों को लेकर कर्मचारी संगठनों समेत अन्य हितधारकों के साथ बैठकें कर रही है. ये सभी नए वेतन आयोग की सिफारिश रिपोर्ट की तैयारी का हिस्सा हैं.
तमाम मांगों के बीच कर्मचारियों की सैलरी में सबसे अहम रोल निभाने वाले फिटमेंट फैक्टर में बढ़ोतरी करते हुए इसे 3.83 करने की डिमांड सबसे बड़ी है. लेकिन रिपोर्ट्स की मानें तो सरकार इसे पूरी तरह मानने से हिचकिचा रही हैं. आइए जानते हैं कि Fitment Factor क्यों अहम है और इससे सैलरी-पेंशन पर क्या असर पड़ता है?
कब होगा लागू, कब बढ़कर मिलेगी सैलरी?
आठवें वेतन आयोग कब लागू होगा और कर्मचारियों को बढ़ी हुई सैलरी कब से मिलेगी? इस पर बात करें, तो तमाम मुद्दों को लेकर जारी चर्चाओं के बाद एक बार रिपोर्ट तैयार हो जाने पर, आठवां वेतन आयोग इसे मंत्रियों के समूह को भेजेगा. इससे मंजूरी मिलने के बाद ये लागू होगा और कर्मचारियों को बकाया सहित संशोधित वेतन मिलेगा. ऐसी उम्मीद जताई जा रही है कि केंद्रीय कर्मचारियों को 1 जनवरी, 2026 से एरियर दिया जाएगा.

फिटमेंट फैक्टर बढ़ाने की डिमांड
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, आठवें वेतन आयोग से कर्मचारी संगठनों द्वारा की जाने वाले कई मांगों से फिटमेंट फैक्टर की डिमांड सबसे बड़ी है. इसे 3.83 करने की मांग की जा रही है और यूनियनें इसे जरूरी बता रही हैं, जिससे कि महंगाई के कारण सालों से वेतन के वास्तविक मूल्य में हुई कमी को बहाल किया जा सके.
बता दें कि वेतन आयोग के तहत बेसिक पे में संशोधन के लिए फिटमेंट फैक्टर का इस्तेमाल किया जाता है और ये Fitment Factor जितना अधिक होगा, वेतन, पेंशन और अन्य भत्तों में उतनी ही अधिक बढ़ोतरी होगी.
क्या सरकार बढ़ाएगी फिटमेंट?
रिपोर्ट में यूनियन प्रतिनिधियों के हवाले से कहा गया है कि Fitment Factor Hike उन मांगों में से एक है, जिन्हें सरकार पूरी तरह से स्वीकार करने में हिचकिचा सकती है. उनका कहना है कि सरकार की जिम्मेदारियां सरकारी कर्मचारियों तक ही सीमित नहीं हैं, वेतन में किसी भी तरह का बड़ा इजाफा न सिर्फ केंद्र सरकार के खजाने पर, बल्कि व्यापक अर्थव्यवस्था पर भी असर डालता है.
यूनियन प्रतिनिधि के मुताबिक, हालांकि कर्मचारी संघ स्वाभाविक रूप से सबसे अधिक वेतन संशोधन के लिए दबाव डालते हैं, लेकिन सरकार को विभिन्न विभागों, पेंशन और राज्य सरकारों पर पड़ने वाले वित्तीय प्रभाव के बारे में भी सोचना होता है, जो आमतौर पर प्रत्येक वेतन आयोग के बाद केंद्र को फॉलो करते हैं. उन्होंने सरकार की परेशानियों के बारे में बताते हुए ये भी कहा कि 'संतुलन होना चाहिए', सरकार पूरी मांग को स्वीकार करने के बजाय अंततः कुछ राहत भरे समाधान पर सहमत हो सकती है.

इसे लेकर कहां उठी क्या मांग?
रिपोर्ट्स की मानें, तो 8th Pay Commission के अधिकारियों के साथ हुई बैठकों में वेतन और पेंशन बढ़ोतरी के लिए अलग-अलग फिटमेंट फैक्टर सुझाए गए हैं. केंद्रीय कर्मचारियों की प्रमुख संस्था, नेशनल काउंसिल जेसीएम ने 3.833 के फिटमेंट फैक्टर और न्यूनतम बेसिक पे 69,000 रुपये किए जाने की मांग की है. अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी संघ (AIDEF) ने भी इतने ही फिटमेंट फैक्टर की डिमांड रखी है. जबकि भारतीय रेलवे के संघ IRTSA ने स्तर 2-5 से 17-18 के कर्मचारियों के लिए 2.92 से 4.38 तक के अलग-अलग फिटमेंट फैक्टर का सुझाव दिया है. इन सुझावों पर 8वां वेतन आयोग फिटमेंट फैक्टर तय करते समय विचार कर सकता है.
क्या होता है Fitment Factor?
फिटमेंट फैक्टर एक ऐसा आंकड़ा होता है, जिसका यूज केंद्रीय वेतन आयोग द्वारा किसी कर्मचारी के पूर्व-संशोधित मूल वेतन (या पेंशन) को नए, संशोधित मूल वेतन संरचना में बदलने के लिए करता है. इसमें किसी भी तरह का परिवर्तन सीधे सैलरी, पेंशन और संबंधित बकाया राशि को प्रभावित करता है. इसका फॉर्मूला 'नया मूल वेतन: वर्तमान मूल वेतन x FF' होता है.
फिलहाल 7th Pay Commission के तहत केंद्रीय कर्मचारियों के लिए 2.57 लागू है, जिसके चलते न्यूनतम मूल वेतन 6वें वेतन आयोग के 7,000 रुपये से बढ़कर 18,000 हुआ था. अब इसे बढ़ाकर 3.83 किया जाता है, तो फिलहाल 18,000 रुपये का न्यूनतम बेसिक-पे (₹18000 x 3.83 = ₹68,940) हो जाएगा. यानी सैलरी में बंपर बढ़ोतरी देखने को मिलेगी.

सरकार निकाल सकती है बीच का रास्ता!
यूनियन प्रतिनिधि ने संकेत दिया कि ऐसा हो सकता है कि सरकार सभी मांगों को पूरी तरह मानने के बजाय कोई बीच का रास्ता अपनाए. महंगाई के दबाव से जुड़ी कुछ डिमांड पर अधिक विचार किया जा सकता है, जबकि राजकोषीय रूप से अधिक कठोर सुझावों पर नरमी दिख सकती है.
तमाम अर्थशास्त्रियों ने भी बार-बार यह चेतावनी दी है कि वेतन और पेंशन में बहुत बड़े संशोधन से व्यय में तेजी बढ़ोतरी हो सकती है और अर्थव्यवस्था पर महंगाई का दबाव बढ़ सकता है. हालांकि, बैठकों का दौर जारी है और अगली जरूरी मीटिंग 22 और 23 जून को लखनऊ में निर्धारित है, जहां उत्तर प्रदेश के सरकारी संगठनों, संस्थानों, यूनियनों और कर्मचारी संघों के साथ इसे लेकर चर्चा होगी.